धर्म, पितृसत्ता और हिंदू कोड बिल
बी. आर. आंबेडकर के सामाजिक और राजनीतिक चिंतन में धर्म और पितृसत्ता (patriarchy) का आपसी संबंध एक केंद्रीय विषय रहा है। आंबेडकर का मानना था कि भारत में लैंगिक असमानता को केवल सामाजिक या सांस्कृतिक समस्या के रूप में नहीं समझा जा सकता; यह असमानता धार्मिक सिद्धांतों, प्रथागत कानूनों और संस्थागत पितृसत्ता में गहराई से निहित है। हिंदू कोड बिल के माध्यम से आंबेडकर ने पहली बार इन संरचनाओं को संवैधानिक और कानूनी स्तर पर चुनौती देने का प्रयास किया।
धर्म और पितृसत्ता पर आंबेडकर का हस्तक्षेप स्त्रियों की “उन्नति” से जुड़े नैतिक उपदेशों से आगे बढ़कर अधिकार-आधारित और कानूनी सुधार की दिशा में एक निर्णायक कदम था।
धर्म और पितृसत्ता की आधारभूमि
आंबेडकर के अनुसार भारत में पितृसत्ता को वैधता प्रदान करने में धर्म की निर्णायक भूमिका रही है। विशेष रूप से हिंदू धर्म में धार्मिक ग्रंथों, परंपराओं और कर्मकांडों ने पुरुष वर्चस्व और स्त्री अधीनता को स्वाभाविक और नैतिक रूप में प्रस्तुत किया। धर्म यहाँ केवल पितृसत्ता का प्रतिबिंब नहीं था, बल्कि उसका उत्पादक और संरक्षक भी था।
हिंदू सामाजिक व्यवस्था में स्त्रियों की स्थिति पवित्रता, शील, आज्ञाकारिता और पारिवारिक कर्तव्य जैसी अवधारणाओं के माध्यम से नियंत्रित की जाती रही। विवाह, उत्तराधिकार, यौन नैतिकता और घरेलू भूमिका—इन सभी क्षेत्रों में धार्मिक मान्यताओं ने स्त्रियों की आर्थिक निर्भरता और सामाजिक अधीनता को बनाए रखा। आंबेडकर का मत था कि जब तक ये धार्मिक रूप से समर्थित संरचनाएँ बनी रहेंगी, तब तक स्त्री समानता केवल एक आदर्श बनी रहेगी।
उनके लिए पितृसत्ता धर्म की आकस्मिक विकृति नहीं, बल्कि उसकी सामाजिक संरचना का अभिन्न अंग थी।
स्त्री, जाति और यौन नियंत्रण
आंबेडकर की पितृसत्ता संबंधी आलोचना उनकी जाति-सम्बंधी समझ से गहराई से जुड़ी हुई है। उनका तर्क था कि स्त्रियों की यौनिकता पर नियंत्रण जाति व्यवस्था को बनाए रखने का केंद्रीय तंत्र है। अंतर्विवाह, बाल विवाह, विधवा पुनर्विवाह पर प्रतिबंध और जाति-उल्लंघन पर कठोर दंड—ये सभी उपाय जातीय शुद्धता की रक्षा के साधन थे।
इस व्यवस्था में स्त्रियाँ एक विरोधाभासी स्थिति में रखी गईं—एक ओर देवी या माँ के रूप में महिमामंडित, दूसरी ओर वास्तविक जीवन में कठोर नियंत्रण और अधीनता का शिकार। आंबेडकर ने विशेष रूप से इस तथ्य पर ज़ोर दिया कि निम्न जातियों की स्त्रियाँ दोहरे उत्पीड़न का सामना करती हैं—एक स्त्री होने के कारण और दूसरा सामाजिक रूप से वंचित समूह से होने के कारण।
इस विश्लेषण ने स्त्री मुक्ति को केवल लैंगिक प्रश्न न मानकर जाति-विरोधी संघर्ष से जोड़ दिया।
सामाजिक मुक्ति के साधन के रूप में कानून
आंबेडकर इस धारणा को अस्वीकार करते थे कि सामाजिक सुधार केवल मानसिकता बदलने से संभव है। उनके अनुसार गहरी असमानताओं वाले समाज में कानून सामाजिक परिवर्तन का एक शक्तिशाली उपकरण है। अन्यायपूर्ण परंपराओं को तोड़ने के लिए कानूनी हस्तक्षेप अनिवार्य है।
स्वतंत्रता के निकट आते भारत में आंबेडकर ने देखा कि व्यक्तिगत कानून—विशेषकर परिवार, संपत्ति और उत्तराधिकार से जुड़े नियम—स्त्रियों की असमानता को बनाए रखने में निर्णायक भूमिका निभाते हैं। यदि इन क्षेत्रों में सुधार नहीं किया गया, तो संविधान द्वारा प्रदत्त समानता केवल औपचारिक रह जाएगी।
इसी समझ ने उन्हें हिंदू कोड बिल के निर्माण और समर्थन की ओर प्रेरित किया।
हिंदू कोड बिल : उद्देश्य और प्रावधान
हिंदू कोड बिल आंबेडकर की लैंगिक न्याय की सबसे महत्वाकांक्षी परियोजना थी। इसका उद्देश्य हिंदू व्यक्तिगत कानून को संहिताबद्ध कर उसे संवैधानिक समानता और व्यक्तिगत अधिकारों के अनुरूप बनाना था। इस बिल के प्रमुख प्रावधान थे:
- उत्तराधिकार में स्त्री–पुरुष समानता
- स्त्रियों को संपत्ति के अधिकार
- विवाह-विच्छेद और पुनर्विवाह की कानूनी मान्यता
- बहुविवाह का उन्मूलन
- स्त्रियों के लिए दत्तक ग्रहण के अधिकार
इन प्रावधानों के माध्यम से आंबेडकर परिवार को पितृसत्तात्मक सत्ता के केंद्र से हटाकर न्याय और समानता पर आधारित सामाजिक इकाई के रूप में पुनर्परिभाषित करना चाहते थे। उनका मानना था कि यदि घरेलू जीवन में निरंकुशता बनी रहे, तो लोकतंत्र समाज में कभी वास्तविक रूप नहीं ले सकता।
विरोध और सुधार की सीमाएँ
हिंदू कोड बिल को तीव्र विरोध का सामना करना पड़ा। रूढ़िवादी धार्मिक समूहों और कई राजनीतिक नेताओं ने इसे परंपरा और हिंदू पहचान पर हमला बताया। उनका तर्क था कि धार्मिक मामलों में राज्य को हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।
आंबेडकर ने इस तर्क को दृढ़ता से खारिज किया। उनके अनुसार, यदि परंपरा स्त्रियों के अधिकारों का हनन करती है, तो उसका संरक्षण लोकतंत्र के विरुद्ध है। इस विरोध ने भारतीय समाज में मौजूद गहरी पितृसत्तात्मक सहमति को उजागर कर दिया।
जब बिल को स्थगित और कमजोर किया गया, तो आंबेडकर ने 1951 में केंद्रीय मंत्रिमंडल से इस्तीफ़ा दे दिया। उनके लिए यह स्त्रियों से किए गए संवैधानिक वादों के साथ विश्वासघात था।
धर्म, पितृसत्ता और संवैधानिक नैतिकता
हिंदू कोड बिल पर आंबेडकर का संघर्ष उनके संवैधानिक नैतिकता के सिद्धांत को प्रतिबिंबित करता है। वे मानते थे कि धार्मिक स्वतंत्रता का उपयोग असमानता और अन्याय को正 ठहराने के लिए नहीं किया जा सकता। संवैधानिक लोकतंत्र में धर्म को समानता, गरिमा और व्यक्तिगत अधिकारों के अधीन होना चाहिए।
आंबेडकर के अनुसार, स्त्री मुक्ति के बिना कोई भी धार्मिक या सामाजिक सुधार अधूरा है। जो समाज परिवार और धर्म के भीतर स्त्रियों को समानता नहीं देता, वह स्वयं को लोकतांत्रिक कहने का नैतिक अधिकार खो देता है।
निष्कर्ष : लोकतंत्र की अनिवार्य शर्त के रूप में लैंगिक न्याय
धर्म और पितृसत्ता पर आंबेडकर की आलोचना तथा हिंदू कोड बिल में उनकी भूमिका आधुनिक भारत के इतिहास की सबसे प्रगतिशील पहलों में से एक है। उन्होंने यह स्पष्ट किया कि किस प्रकार धार्मिक सत्ता और पितृसत्तात्मक मानदंड एक-दूसरे को मज़बूत कर स्त्रियों से स्वायत्तता और गरिमा छीनते हैं।
हिंदू कोड बिल केवल कानूनी सुधार नहीं था, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों पर आधारित सामाजिक संबंधों के पुनर्निर्माण का प्रयास था। यद्यपि आंबेडकर अपने जीवनकाल में इस परियोजना को पूर्ण रूप से साकार होते नहीं देख पाए, फिर भी बाद में हुए हिंदू व्यक्तिगत कानून सुधार उनकी दूरदृष्टि और संघर्ष की स्थायी विरासत हैं।
आंबेडकर का चिंतन हमें यह स्मरण कराता है कि लैंगिक न्याय के बिना लोकतंत्र अधूरा है, और धर्म तभी नैतिक वैधता प्राप्त कर सकता है जब वह समानता और मानव गरिमा के मूल्यों के साथ खड़ा हो।
संदर्भ (References)
- आंबेडकर, बी. आर., हिंदू स्त्रियों का उत्थान और पतन (The Rise and Fall of Hindu Women)
- आंबेडकर, बी. आर., हिंदू कोड बिल पर भाषण
- आंबेडकर, बी. आर., संविधान सभा में भाषण
- ओमवेट, गेल, आंबेडकर: एक प्रबुद्ध भारत की ओर
- एग्नेस, फ्लाविया, कानून और लैंगिक असमानता
- तेलतुम्बड़े, आनंद, रिपब्लिक ऑफ़ कास्ट