चयन सिद्धांत और हित सिद्धांत : अधिकारों की दो प्रमुख व्याख्याएँ
आधुनिक राजनीतिक और विधिक सिद्धांत में अधिकार (Rights) की अवधारणा अत्यंत केंद्रीय है। लोकतंत्र, संविधानवाद, मानवाधिकार और स्वतंत्रता की पूरी संरचना अधिकारों पर आधारित है। किंतु अधिकार क्या हैं और उनका नैतिक आधार क्या है—इस प्रश्न पर विद्वानों में गंभीर मतभेद पाया जाता है।

इन्हीं मतभेदों को सबसे स्पष्ट रूप में चयन सिद्धांत (Choice Theory) और हित सिद्धांत (Interest Theory) के बीच की बहस में देखा जा सकता है। पहला सिद्धांत अधिकारों को व्यक्ति की स्वायत्तता और चयन की क्षमता (autonomy and choice) से जोड़ता है, जबकि दूसरा सिद्धांत अधिकारों को महत्वपूर्ण मानवीय हितों (important human interests) की रक्षा का साधन मानता है। यह बहस Debates in Political Theory (DU MA Political Science) का एक अनिवार्य विषय है।
वैचारिक पृष्ठभूमि: अधिकारों की समस्या
सामान्य रूप से अधिकारों को ऐसे नैतिक या कानूनी दावे (claims) के रूप में समझा जाता है जिन्हें व्यक्ति राज्य या अन्य व्यक्तियों के विरुद्ध प्रस्तुत कर सकता है। लेकिन अधिकारों का औचित्य (justification) किस आधार पर है—व्यक्ति की इच्छा या उसके कल्याण—यही मूल विवाद का प्रश्न है। इस बहस के माध्यम से यह समझने की कोशिश की जाती है कि क्या अधिकार मूलतः व्यक्ति को नियंत्रण (control) देने के लिए हैं या उसे नुकसान से बचाने के लिए।
चयन सिद्धांत (Choice Theory): मूल अवधारणा
चयन सिद्धांत (Choice Theory) को कभी-कभी इच्छा सिद्धांत (Will Theory) भी कहा जाता है। इस सिद्धांत के अनुसार किसी व्यक्ति का अधिकार होना इस बात का संकेत है कि उसे दूसरों के कर्तव्यों पर नियंत्रण (normative control) प्राप्त है।
अर्थात् अधिकार रखने वाला व्यक्ति यह तय कर सकता है कि उसका अधिकार लागू किया जाए, छोड़ा जाए (waive), या किसी अन्य को स्थानांतरित (transfer) किया जाए। इस दृष्टि से अधिकार व्यक्ति की स्वायत्तता (autonomy) और नैतिक एजेंसी (moral agency) का विस्तार हैं।
चयन सिद्धांत के प्रमुख विचारक: H. L. A. Hart
H. L. A. Hart चयन सिद्धांत के प्रमुख समर्थक माने जाते हैं। उनके अनुसार अधिकारों का मूल उद्देश्य व्यक्ति को चयन की शक्ति (power of choice) प्रदान करना है। यदि किसी व्यक्ति के पास अधिकार का प्रयोग या त्याग करने की स्वतंत्रता नहीं है, तो वह अधिकार वास्तविक अर्थों में अधिकार नहीं कहलाएगा।
हार्ट का तर्क विशेष रूप से संविदात्मक अधिकारों (contractual rights) में स्पष्ट दिखाई देता है, जहाँ व्यक्ति सहमति, अनुबंध और दायित्वों के नियंत्रण में सक्रिय भूमिका निभाता है।
चयन सिद्धांत की विशेषताएँ और मजबूती
चयन सिद्धांत अधिकार और स्वतंत्रता के बीच गहरे संबंध को स्पष्ट करता है। यह सिद्धांत उदार राजनीतिक दर्शन (liberal political philosophy) के अनुरूप है, जो व्यक्ति की स्वतंत्र इच्छा और आत्मनिर्णय को सर्वोच्च मानता है। इसके अतिरिक्त, यह सिद्धांत यह भी स्पष्ट करता है कि अधिकार व्यक्ति को निष्क्रिय लाभार्थी नहीं, बल्कि सक्रिय निर्णयकर्ता बनाते हैं।
चयन सिद्धांत की आलोचना
चयन सिद्धांत की सबसे बड़ी आलोचना यह है कि यह उन व्यक्तियों के अधिकारों को स्पष्ट नहीं कर पाता जो चयन करने में सक्षम नहीं हैं। उदाहरण के लिए बच्चे, मानसिक रूप से विकलांग व्यक्ति, या भविष्य की पीढ़ियाँ। यदि अधिकार के लिए चयन की क्षमता आवश्यक है, तो इन वर्गों को अधिकारों से वंचित करना पड़ेगा, जो नैतिक रूप से अस्वीकार्य है। इसलिए आलोचक कहते हैं कि चयन सिद्धांत अत्यधिक संकीर्ण (restrictive) है।
हित सिद्धांत (Interest Theory): मूल अवधारणा
हित सिद्धांत (Interest Theory) अधिकारों की एक वैकल्पिक व्याख्या प्रस्तुत करता है। इसके अनुसार किसी व्यक्ति के पास तब अधिकार होता है जब उसका कोई महत्वपूर्ण हित (interest) इतना मूल्यवान हो कि वह दूसरों पर कर्तव्य (duty) आरोपित कर सके। इस सिद्धांत में अधिकारों का उद्देश्य व्यक्ति को नियंत्रण देना नहीं, बल्कि उसके मूलभूत हितों की रक्षा करना है—जैसे जीवन, स्वास्थ्य, सुरक्षा और गरिमा।
हित सिद्धांत के प्रमुख विचारक: Joseph Raz
Joseph Raz हित सिद्धांत के सबसे प्रमुख समर्थक हैं। उनका प्रसिद्ध कथन है कि “अधिकार हितों पर आधारित होते हैं”। रैज़ के अनुसार किसी व्यक्ति के हित यदि पर्याप्त रूप से महत्वपूर्ण हों, तो वे दूसरों पर नैतिक दायित्व उत्पन्न करते हैं। हित सिद्धांत का बड़ा लाभ यह है कि यह उन व्यक्तियों के अधिकारों को भी मान्यता देता है जो स्वयं चयन करने में सक्षम नहीं हैं।
हित सिद्धांत की मजबूती
हित सिद्धांत अधिकारों की अधिक समावेशी (inclusive) व्याख्या प्रस्तुत करता है। यह आधुनिक मानवाधिकार सिद्धांत के अधिक अनुकूल है, जहाँ बच्चों, महिलाओं, विकलांगों और कमजोर वर्गों के अधिकारों पर विशेष बल दिया जाता है। सामाजिक-आर्थिक अधिकारों (जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य) को भी हित सिद्धांत बेहतर ढंग से समझा सकता है।
हित सिद्धांत की आलोचना
हित सिद्धांत की आलोचना यह है कि यह अधिकारों की अवधारणा को बहुत व्यापक बना देता है। यदि हर महत्वपूर्ण हित अधिकार बन जाए, तो अधिकारों की विशिष्टता (distinctiveness) कम हो जाती है। इसके अलावा, यह सिद्धांत व्यक्ति की स्वायत्तता और सहमति की भूमिका को कमज़ोर कर देता है और व्यक्ति को केवल लाभ पाने वाला मान लेता है।
तुलनात्मक विश्लेषण: चयन बनाम हित सिद्धांत
चयन और हित सिद्धांत के बीच मूल अंतर यह है कि पहला अधिकारों को नियंत्रण और स्वायत्तता से जोड़ता है, जबकि दूसरा उन्हें संरक्षण और कल्याण से। चयन सिद्धांत नागरिक और राजनीतिक अधिकारों को बेहतर ढंग से समझाता है, जबकि हित सिद्धांत मानवाधिकारों और सामाजिक न्याय के लिए अधिक उपयुक्त है। कई विद्वानों का मानना है कि दोनों सिद्धांत एक-दूसरे के पूरक हो सकते हैं।
समकालीन प्रासंगिकता (Contemporary Relevance)
आज बच्चों के अधिकार, विकलांग व्यक्तियों के अधिकार, और सामाजिक-आर्थिक अधिकारों पर होने वाली बहसें मुख्यतः हित सिद्धांत पर आधारित हैं, जबकि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और अनुबंध की स्वतंत्रता जैसे अधिकार चयन सिद्धांत के अधिक निकट हैं।
निष्कर्ष (Conclusion)
चयन सिद्धांत और हित सिद्धांत अधिकारों की दो भिन्न लेकिन महत्वपूर्ण व्याख्याएँ प्रस्तुत करते हैं। जहाँ चयन सिद्धांत व्यक्ति की स्वायत्तता को केंद्र में रखता है, वहीं हित सिद्धांत मानव कल्याण की रक्षा पर ज़ोर देता है। दोनों के अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि अधिकारों की कोई एकमात्र संपूर्ण व्याख्या संभव नहीं है, बल्कि न्यायपूर्ण समाज के लिए दोनों दृष्टिकोणों की समझ आवश्यक है।
FAQs
Q1. चयन सिद्धांत का मुख्य आधार क्या है?
व्यक्ति की स्वायत्तता और चयन की क्षमता।
Q2. हित सिद्धांत का प्रमुख समर्थक कौन है?
Joseph Raz.
Q3. चयन सिद्धांत की मुख्य समस्या क्या है?
यह बच्चों और विकलांगों के अधिकारों को ठीक से नहीं समझा पाता।
Q4. हित सिद्धांत किस पर ज़ोर देता है?
महत्वपूर्ण मानवीय हितों की रक्षा पर।
Q5. मानवाधिकारों के लिए कौन-सा सिद्धांत अधिक उपयुक्त है?
हित सिद्धांत।