निर्वाचन प्रणालियों का वर्गीकरण
निर्वाचन प्रणाली वह संस्थागत व्यवस्था है जिसके माध्यम से नागरिकों द्वारा दिए गए मतों को राजनीतिक प्रतिनिधित्व में परिवर्तित किया जाता है। यह लोकतांत्रिक प्रक्रिया का एक केंद्रीय तत्व है, क्योंकि यही तय करती है कि मतदाता की इच्छा किस प्रकार विधायिका में परिलक्षित होगी। इसलिए निर्वाचन प्रणाली केवल एक तकनीकी व्यवस्था नहीं, बल्कि न्याय, प्रतिनिधित्व, स्थिरता और वैधता से जुड़े मानक मूल्यों को भी प्रतिबिंबित करती है।
निर्वाचन प्रणालियों का वर्गीकरण हमें यह समझने में सहायता करता है कि विभिन्न लोकतंत्र राजनीतिक प्रतिस्पर्धा को किस प्रकार संगठित करते हैं और मतदाता तथा प्रतिनिधि के बीच संबंध को कैसे परिभाषित करते हैं।
निर्वाचन प्रणाली: अर्थ और दायरा
निर्वाचन प्रणाली से आशय उन नियमों और प्रक्रियाओं से है जो यह निर्धारित करती हैं कि—
- मत कैसे डाले जाएँगे
- मतों की गणना कैसे होगी
- सीटों का आवंटन किस प्रकार किया जाएगा
यह जन-इच्छा और राजनीतिक सत्ता के बीच एक सेतु का कार्य करती है। तुलनात्मक राजनीति के विद्वानों के अनुसार, निर्वाचन प्रणाली न केवल चुनावी परिणामों को प्रभावित करती है, बल्कि राजनीतिक व्यवहार, जैसे दलों की रणनीति, मतदाता सहभागिता और सरकार गठन की प्रकृति को भी आकार देती है।
निर्वाचन प्रणालियों के वर्गीकरण का आधार
निर्वाचन प्रणालियों का वर्गीकरण सामान्यतः निम्न आधारों पर किया जाता है—
- मतों को सीटों में बदलने का सूत्र
- निर्वाचन क्षेत्रों का आकार और संरचना
- मतों और सीटों के बीच अनुपातिकता
- मतदाता के विकल्प की प्रकृति
इन आधारों पर निर्वाचन प्रणालियों को मुख्यतः बहुमतवादी (Majoritarian), अनुपातिक प्रतिनिधित्व (Proportional Representation) और मिश्रित या संकर (Mixed/Hybrid) प्रणालियों में विभाजित किया जाता है।
बहुमतवादी निर्वाचन प्रणालियाँ
बहुमतवादी प्रणालियाँ इस सिद्धांत पर आधारित होती हैं कि सबसे अधिक मत प्राप्त करने वाला उम्मीदवार विजयी होगा, भले ही उसे पूर्ण बहुमत न मिला हो। ये प्रणालियाँ प्रायः स्थिर सरकार और स्पष्ट जनादेश को प्राथमिकता देती हैं।
प्रथम-पास्ट-द-पोस्ट (FPTP) प्रणाली
इस प्रणाली में—
- प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र से एक प्रतिनिधि चुना जाता है
- सर्वाधिक मत प्राप्त करने वाला उम्मीदवार निर्वाचित होता है
- अन्य उम्मीदवारों को मिले मत प्रतिनिधित्व में परिवर्तित नहीं होते
FPTP प्रणाली बड़े राजनीतिक दलों को लाभ पहुँचाती है और प्रायः द्विदलीय या द्विध्रुवीय पार्टी प्रणाली को बढ़ावा देती है। परंतु इसकी आलोचना इस आधार पर होती है कि यह मतों और सीटों के बीच असमानता पैदा करती है।
पूर्ण बहुमत प्रणाली
कुछ बहुमतवादी प्रणालियों में उम्मीदवार को 50 प्रतिशत से अधिक मत प्राप्त करना आवश्यक होता है। यदि पहले चरण में कोई भी उम्मीदवार यह बहुमत प्राप्त नहीं कर पाता, तो दूसरे चरण (रन-ऑफ चुनाव) का आयोजन किया जाता है।
यह प्रणाली प्रतिनिधि की वैधता को बढ़ाती है, लेकिन चुनाव प्रक्रिया को अधिक जटिल और महँगा भी बना देती है।
अनुपातिक प्रतिनिधित्व (PR) प्रणालियाँ
अनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणालियों का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि सीटों का वितरण मतों के अनुपात में हो। इनका मुख्य सिद्धांत है—न्यायसंगत और समावेशी प्रतिनिधित्व।
पार्टी सूची प्रणाली
इस प्रणाली में—
- राजनीतिक दल उम्मीदवारों की सूची प्रस्तुत करते हैं
- मतदाता दल को मत देते हैं
- दल को प्राप्त मत प्रतिशत के अनुसार सीटें आवंटित की जाती हैं
यह प्रणाली बंद सूची या खुली सूची के रूप में लागू हो सकती है। यह बहुदलीय व्यवस्था को प्रोत्साहित करती है और अल्पसंख्यक समूहों के प्रतिनिधित्व को बढ़ाती है।
एकल स्थानांतरणीय मत (STV)
इस प्रणाली में मतदाता उम्मीदवारों को अपनी प्राथमिकता के क्रम में चुनते हैं। आवश्यकता अनुसार मतों का स्थानांतरण किया जाता है, जब तक सभी सीटें भर न जाएँ।
STV प्रणाली मतों की बर्बादी को कम करती है और मतदाता को अधिक विकल्प देती है, किंतु इसकी प्रशासनिक जटिलता इसे कठिन बना देती है।
मिश्रित या संकर निर्वाचन प्रणालियाँ
मिश्रित प्रणालियाँ बहुमतवादी और अनुपातिक प्रतिनिधित्व दोनों के तत्वों को मिलाकर अपनाती हैं। इनका उद्देश्य शासन की स्थिरता और प्रतिनिधित्व की निष्पक्षता के बीच संतुलन स्थापित करना है।
समानांतर प्रणाली
इसमें—
- कुछ प्रतिनिधि बहुमतवादी प्रणाली से चुने जाते हैं
- कुछ अनुपातिक प्रतिनिधित्व के माध्यम से
- दोनों व्यवस्थाएँ स्वतंत्र रूप से कार्य करती हैं
मिश्रित-सदस्य अनुपातिक प्रणाली (MMP)
इस प्रणाली में यह सुनिश्चित किया जाता है कि संसद की कुल संरचना मतों के अनुपात को प्रतिबिंबित करे। यदि बहुमतवादी चुनाव में असमानता हो जाती है, तो अनुपातिक सीटों के माध्यम से उसे संतुलित किया जाता है।
वैकल्पिक वर्गीकरण
निर्वाचन प्रणालियों को अन्य आधारों पर भी वर्गीकृत किया जा सकता है—
- निर्वाचन क्षेत्र का आकार (एक-सदस्यीय / बहु-सदस्यीय)
- मतपत्र की प्रकृति (साधारण / प्राथमिकता आधारित)
- प्रतिनिधित्व की न्यूनतम सीमा (थ्रेशहोल्ड)
इन सभी का प्रभाव राजनीतिक प्रतिस्पर्धा और मतदाता व्यवहार पर पड़ता है।
निर्वाचन प्रणालियाँ और लोकतांत्रिक परिणाम
निर्वाचन प्रणाली का चयन लोकतंत्र की प्रकृति को गहराई से प्रभावित करता है—
- बहुमतवादी प्रणालियाँ स्थिरता देती हैं, पर अल्पसंख्यकों को हाशिये पर रख सकती हैं
- अनुपातिक प्रणालियाँ प्रतिनिधित्व बढ़ाती हैं, पर सरकार गठन को जटिल बना सकती हैं
- मिश्रित प्रणालियाँ संतुलन का प्रयास करती हैं, लेकिन प्रक्रिया को जटिल बनाती हैं
विद्वानों का मानना है कि निर्वाचन प्रणाली दीर्घकाल में दलीय व्यवस्था को भी आकार देती है।
तुलनात्मक दृष्टिकोण
कोई भी निर्वाचन प्रणाली सार्वभौमिक रूप से सर्वोत्तम नहीं है। प्रत्येक प्रणाली किसी देश के—
- ऐतिहासिक अनुभव
- सामाजिक संरचना
- राजनीतिक प्राथमिकताओं
को प्रतिबिंबित करती है। इसी कारण अनेक लोकतंत्र समय-समय पर निर्वाचन सुधारों पर विचार करते रहते हैं।
निष्कर्ष
निर्वाचन प्रणालियों का वर्गीकरण लोकतांत्रिक राजनीति को समझने का एक बुनियादी ढाँचा प्रदान करता है। निर्वाचन प्रणालियाँ केवल तकनीकी व्यवस्थाएँ नहीं, बल्कि लोकतंत्र की गुणवत्ता को निर्धारित करने वाले संस्थागत उपकरण हैं।
यह समझना आवश्यक है कि कोई भी निर्वाचन प्रणाली तभी प्रभावी होती है जब वह प्रतिनिधित्व, उत्तरदायित्व, वैधता और शासन-क्षमता के बीच संतुलन स्थापित कर सके।
इस दृष्टि से निर्वाचन प्रणालियों का अध्ययन लोकतांत्रिक सुधारों और राजनीतिक विश्लेषण के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
संदर्भ (References)
- Duverger, Maurice. Political Parties
- Lijphart, Arend. Patterns of Democracy
- Norris, Pippa. Electoral Engineering
- Heywood, Andrew. Politics
- Farrell, David. Electoral Systems: A Comparative Introduction