राष्ट्र, राष्ट्रवाद और समावेशी नागरिकता
बी. आर. आंबेडकर के राजनीतिक चिंतन में राष्ट्र और राष्ट्रवाद का प्रश्न अत्यंत केंद्रीय रहा है, किंतु उनका दृष्टिकोण भारत के प्रचलित राष्ट्रवादी विमर्श से मूलतः भिन्न था। आंबेडकर के लिए राष्ट्र कोई सांस्कृतिक, धार्मिक या भावनात्मक रूप से पहले से मौजूद इकाई नहीं था, और न ही राष्ट्रवाद अपने आप में कोई नैतिक आदर्श। उनके अनुसार राष्ट्र और राष्ट्रवाद दोनों को सामाजिक न्याय, समानता और नागरिकता के मानदंडों पर परखा जाना चाहिए।
आंबेडकर का स्पष्ट मत था कि जिस समाज में बहुसंख्यक आबादी सामाजिक बहिष्कार, असमानता और अपमानजनक जीवन स्थितियों का सामना कर रही हो, वहाँ राष्ट्र निर्माण का दावा खोखला है। उन्होंने बार-बार इस धारणा को चुनौती दी कि राजनीतिक एकता अपने आप सामाजिक एकता को जन्म देती है। उनके अनुसार, सामाजिक न्याय के बिना राष्ट्रवाद मुक्ति का नहीं, बल्कि वर्चस्व का औज़ार बन जाता है।
राष्ट्र की अवधारणा : सांस्कृतिक एकता नहीं, सामाजिक आधार
आंबेडकर ने राष्ट्र की उस रोमांटिक और सांस्कृतिक व्याख्या को अस्वीकार किया जिसमें भारत को साझा परंपरा, धर्म या सभ्यता के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। उनके अनुसार राष्ट्र केवल साझा इतिहास या भावनात्मक लगाव का परिणाम नहीं होता, बल्कि वह समानता, पारस्परिक सम्मान और सामाजिक सहयोग पर आधारित एक सामाजिक संरचना होता है।
आंबेडकर का तर्क था कि जाति-व्यवस्था से विभाजित भारतीय समाज में वास्तविक राष्ट्रत्व का अभाव है। जाति समाज को अलग-अलग, असमान और एक-दूसरे से कटे हुए समूहों में बाँट देती है। यह न केवल सामाजिक एकता को नष्ट करती है, बल्कि भाईचारे की भावना को भी असंभव बना देती है। इसी कारण उन्होंने जाति को “राष्ट्र-विरोधी” बताया।
उनके अनुसार राष्ट्र कोई स्वाभाविक या ऐतिहासिक रूप से दिया गया तथ्य नहीं, बल्कि सचेत सामाजिक निर्माण की प्रक्रिया है। जब तक जाति का विनाश नहीं होता और सामाजिक समानता स्थापित नहीं होती, तब तक राष्ट्र की अवधारणा केवल एक राजनीतिक नारा बनी रहती है।
राष्ट्रवाद की आलोचना
आंबेडकर राष्ट्रवाद के विरोधी नहीं थे, लेकिन वे अंध और बहिष्करणकारी राष्ट्रवाद के तीखे आलोचक थे। वे ऐसे राष्ट्रवाद से सावधान करते हैं जो समाज के भीतर मौजूद अन्यायों को अनदेखा कर केवल त्याग, एकता और बलिदान की माँग करता है। उनके अनुसार, ऐसा राष्ट्रवाद प्रायः प्रभुत्वशाली वर्गों के हितों की रक्षा करता है और हाशिए पर पड़े समुदायों की आवाज़ को दबा देता है।
आंबेडकर ने यह स्पष्ट किया कि भारतीय राष्ट्रवाद ने अक्सर औपनिवेशिक शासन से मुक्ति को प्राथमिकता दी, लेकिन दलितों, स्त्रियों और अल्पसंख्यकों की सामाजिक गुलामी को गंभीरता से नहीं लिया। उनके लिए ऐसा राष्ट्रवाद अधूरा और नैतिक रूप से कमजोर था।
वे बहुसंख्यकवादी राष्ट्रवाद के भी आलोचक थे, जो राष्ट्र को किसी एक धर्म या संस्कृति से जोड़ता है। आंबेडकर के अनुसार, ऐसा राष्ट्रवाद लोकतंत्र को कमजोर करता है क्योंकि वह संख्या को नैतिक श्रेष्ठता में बदल देता है। सच्चा राष्ट्रवाद वही है जो संवैधानिक मूल्यों पर आधारित हो, न कि सांस्कृतिक एकरूपता पर।
नागरिकता : राष्ट्र का वास्तविक आधार
आंबेडकर के राजनीतिक दर्शन में राष्ट्रवाद से अधिक महत्वपूर्ण अवधारणा नागरिकता है। उनके अनुसार किसी राष्ट्र की वास्तविक शक्ति उसकी सीमाओं या भावनाओं में नहीं, बल्कि उसके नागरिकों की स्थिति और अधिकारों में निहित होती है। नागरिकता समानता और गरिमा का संस्थागत रूप है।
आंबेडकर ने नागरिकता को समावेशी, अधिकार-आधारित और संवैधानिक रूप से सुनिश्चित माना। उन्होंने धर्म, जाति या संस्कृति के आधार पर नागरिकता की किसी भी अवधारणा को अस्वीकार किया। उनके अनुसार नागरिकता का आधार सार्वभौमिक न्याय, स्वतंत्रता और समानता होनी चाहिए।
महत्वपूर्ण बात यह है कि आंबेडकर नागरिकता को केवल कानूनी दर्जा नहीं मानते थे, बल्कि एक सामाजिक स्थिति के रूप में देखते थे। यदि समाज में भेदभाव मौजूद है, तो कानूनी अधिकार भी निष्प्रभावी हो जाते हैं। इसलिए समावेशी नागरिकता के लिए संवैधानिक प्रावधानों के साथ-साथ सामाजिक सुधार और राज्य की सक्रिय भूमिका आवश्यक है।
समावेशी नागरिकता और अल्पसंख्यक अधिकार
आंबेडकर की समावेशी नागरिकता की अवधारणा अल्पसंख्यकों और वंचित समुदायों की सुरक्षा से गहराई से जुड़ी हुई है। उनका मानना था कि लोकतंत्र तभी सार्थक होता है जब अल्पसंख्यक स्वयं को सुरक्षित और सम्मानित महसूस करें। नागरिकता का उद्देश्य केवल राज्य की शक्ति को सीमित करना नहीं, बल्कि सामाजिक बहुसंख्यक के अत्याचार से भी व्यक्ति की रक्षा करना है।
इसी कारण आंबेडकर ने संवैधानिक सुरक्षा उपायों, मौलिक अधिकारों, आरक्षण और कानूनी संरक्षण पर ज़ोर दिया। उनके लिए ये उपाय विशेषाधिकार नहीं, बल्कि ऐतिहासिक अन्याय को सुधारने के आवश्यक साधन थे।
वे ऐसी नागरिकता के भी विरोधी थे जो सांस्कृतिक एकरूपता की माँग करती है। इसके विपरीत, वे बहुलतावादी नागरिकता के पक्षधर थे, जहाँ विविधता के साथ समानता संभव हो। समावेशी नागरिकता व्यक्ति को उसकी पहचान बनाए रखते हुए समान नैतिक और राजनीतिक दर्जा प्रदान करती है।
संवैधानिक नैतिकता और राष्ट्र निर्माण
आंबेडकर के राष्ट्र और नागरिकता संबंधी विचारों को जोड़ने वाली सबसे महत्वपूर्ण अवधारणा है संवैधानिक नैतिकता। उनका मानना था कि लोकतांत्रिक राष्ट्र भावनात्मक राष्ट्रवाद से नहीं, बल्कि संवैधानिक मूल्यों के सम्मान से टिकता है।
संवैधानिक नैतिकता का अर्थ है—न्याय, संयम, सहिष्णुता और संस्थागत मर्यादाओं का पालन। आंबेडकर के अनुसार, गहरी सामाजिक असमानताओं वाले समाज में संवैधानिक नैतिकता एक नैतिक मार्गदर्शक की भूमिका निभाती है, जो सत्ता के दुरुपयोग को रोकती है और सामाजिक परिवर्तन को दिशा देती है।
इस प्रकार आंबेडकर भारतीय राष्ट्र को अतीत की सांस्कृतिक एकता के रूप में नहीं, बल्कि भविष्य की ओर उन्मुख एक संवैधानिक परियोजना के रूप में देखते हैं—जो निरंतर संघर्ष, आत्मालोचना और समावेशन की माँग करती है।
निष्कर्ष : राष्ट्र और राष्ट्रवाद की पुनर्परिभाषा
आंबेडकर के विचार राष्ट्र, राष्ट्रवाद और नागरिकता की अवधारणाओं को एक नया नैतिक और सामाजिक आधार प्रदान करते हैं। वे सांस्कृतिक एकता के स्थान पर सामाजिक न्याय को, भावनात्मक राष्ट्रवाद के स्थान पर संवैधानिक मूल्यों को, और अमूर्त राष्ट्र की जगह जीवित नागरिकता को केंद्र में रखते हैं।
उनकी दृष्टि में सच्चा राष्ट्र वही है जहाँ जाति, धर्म, लिंग या सामाजिक पृष्ठभूमि की परवाह किए बिना प्रत्येक व्यक्ति समान नागरिक के रूप में भागीदारी कर सके। यदि राष्ट्रवाद को नैतिक रूप से वैध होना है, तो उसे इसी समावेशी दृष्टि की सेवा करनी होगी। यही कारण है कि आंबेडकर का चिंतन आज भी नागरिकता, राष्ट्रवाद और लोकतंत्र पर होने वाली बहसों में अत्यंत प्रासंगिक बना हुआ है।
संदर्भ (References)
- आंबेडकर, बी. आर., जाति का विनाश (Annihilation of Caste)
- आंबेडकर, बी. आर., राज्य और अल्पसंख्यक (States and Minorities)
- आंबेडकर, बी. आर., संविधान सभा में भाषण
- गोरे, एम. एस., आंबेडकर का राजनीतिक और सामाजिक चिंतन
- ओमवेट, गेल, स्वतंत्रता, समानता और समुदाय
- रोड्रिग्स, वैलेरियन (सं.), बी. आर. आंबेडकर के आवश्यक लेखन