जाति और हिंदू सामाजिक व्यवस्था की आलोचना
बी. आर. आंबेडकर के सामाजिक और राजनीतिक दर्शन के केंद्र में जाति की तीव्र आलोचना स्थित है। आंबेडकर के लिए जाति कोई साधारण सामाजिक प्रथा या सांस्कृतिक विशेषता नहीं थी, बल्कि यह सत्ता, वर्चस्व और असमानता की एक सुव्यवस्थित व्यवस्था थी, जो भारतीय समाज के प्रत्येक क्षेत्र—सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक और राजनीतिक—को प्रभावित करती थी। हिंदू सामाजिक व्यवस्था की उनकी आलोचना इसीलिए अत्यंत मौलिक और क्रांतिकारी थी, क्योंकि उसने उन नैतिक, धार्मिक और दार्शनिक आधारों पर प्रश्न उठाया जिन पर जाति व्यवस्था टिकी हुई थी।
आंबेडकर उन सुधारवादी दृष्टिकोणों से असहमत थे जो जाति की कुछ बुराइयों को दूर करने की बात करते थे, लेकिन उसकी मूल संरचना को स्वीकार करते थे। उनके अनुसार जाति अपने स्वभाव में ही अन्यायपूर्ण है और लोकतंत्र, समानता तथा मानव गरिमा के साथ असंगत है।
जाति : स्तरबद्ध असमानता की व्यवस्था
आंबेडकर ने जाति को “graded inequality” अर्थात स्तरबद्ध असमानता की व्यवस्था के रूप में परिभाषित किया। इसमें सामाजिक समूहों को जन्म के आधार पर एक पदानुक्रम में बाँध दिया जाता है, जहाँ असमान व्यवहार को सामान्य और नैतिक रूप से स्वीकार्य बना दिया जाता है। वर्ग व्यवस्था के विपरीत, जहाँ गतिशीलता संभव होती है, जाति व्यक्ति की सामाजिक स्थिति को स्थायी बना देती है।
इस व्यवस्था की सबसे घातक विशेषता यह है कि इसमें उत्पीड़न समाज में समान रूप से वितरित हो जाता है। प्रत्येक जाति अपने से नीचे की जाति पर प्रभुत्व रखती है और ऊपर की जाति के सामने अधीन रहती है। इस कारण जाति व्यवस्था के विरुद्ध सामूहिक प्रतिरोध विकसित नहीं हो पाता और असमानता सामाजिक सहमति के साथ बनी रहती है।
आंबेडकर का प्रसिद्ध कथन कि जाति “श्रम का विभाजन नहीं, बल्कि श्रमिकों का विभाजन” है, इस व्यवस्था की अमानवीय प्रकृति को स्पष्ट करता है। जाति व्यक्ति से पेशा चुनने की स्वतंत्रता छीन लेती है और उसकी सामाजिक गरिमा को जन्म से ही निर्धारित कर देती है।
हिंदू सामाजिक व्यवस्था और धार्मिक वैधता
आंबेडकर की जाति-आलोचना हिंदू सामाजिक व्यवस्था की आलोचना से अविभाज्य है। उनका तर्क था कि जाति हिंदू धर्म की कोई आकस्मिक विकृति नहीं, बल्कि उसकी सामाजिक संरचना का मूल तत्व है। धार्मिक ग्रंथों, कर्मकांडों और परंपराओं ने जाति को दैवी वैधता प्रदान की।
मनुस्मृति जैसे ग्रंथ आंबेडकर की आलोचना के केंद्र में रहे, क्योंकि वे असमानता, बहिष्कार और दमन को धार्मिक कर्तव्य के रूप में प्रस्तुत करते हैं। जब सामाजिक अन्याय को ईश्वर की इच्छा के रूप में दिखाया जाता है, तब वह नैतिक प्रश्नों से परे चला जाता है।
आंबेडकर ने इस तर्क को सिरे से खारिज किया कि हिंदू धर्म मूलतः समतावादी था और जाति उसकी बाद की विकृति है। उनके अनुसार, जब तक हिंदू धर्म जाति पर आधारित रहेगा, तब तक उसके भीतर से वास्तविक सामाजिक सुधार असंभव है।
अंतर्विवाह निषेध (Endogamy) और जाति की पुनरुत्पत्ति
आंबेडकर के जाति-विचार की एक अत्यंत महत्वपूर्ण अंतर्दृष्टि यह थी कि उन्होंने अंतर्विवाह निषेध (endogamy) को जाति की केंद्रीय संरचना के रूप में पहचाना। उनके अनुसार जाति केवल धार्मिक अनुष्ठानों से नहीं, बल्कि विवाह और लैंगिक नियंत्रण के माध्यम से पीढ़ी-दर-पीढ़ी बनी रहती है।
जाति के भीतर विवाह को अनिवार्य बनाकर हिंदू सामाजिक व्यवस्था सामाजिक पदानुक्रम को सुरक्षित रखती है। पवित्रता, सम्मान और पारिवारिक नियंत्रण से जुड़ी धारणाएँ इस व्यवस्था को बनाए रखने में निर्णायक भूमिका निभाती हैं।
इस विश्लेषण ने जाति को केवल सार्वजनिक जीवन की समस्या नहीं, बल्कि निजी और पारिवारिक जीवन में निहित सामाजिक नियंत्रण की व्यवस्था के रूप में उजागर किया।
जाति बनाम लोकतंत्र और सामाजिक नैतिकता
आंबेडकर के अनुसार जाति और लोकतंत्र मूलतः असंगत हैं। लोकतंत्र की आधारशिला है—व्यक्ति को नैतिक रूप से समान मानना और भाईचारे की भावना का विकास। जाति इसके विपरीत असमानता और सामाजिक दूरी को संस्थागत रूप देती है।
उन्होंने चेतावनी दी कि जाति-आधारित समाज लोकतांत्रिक संस्थाओं को अपनाकर भी लोकतांत्रिक मूल्यों को आत्मसात नहीं कर सकता। राजनीतिक समानता सामाजिक समानता के बिना टिक नहीं सकती।
नैतिक दृष्टि से भी आंबेडकर जाति को एक ऐसी व्यवस्था मानते थे जो मानव संवेदना को विकृत कर देती है। जाति सहानुभूति को नष्ट करती है, सामाजिक एकता को कमजोर करती है और साझा नैतिक उत्तरदायित्व की भावना को समाप्त कर देती है।
जाति का विनाश : एक क्रांतिकारी समाधान
आंबेडकर की आलोचना का चरम बिंदु उनका “जाति के विनाश” का आह्वान है। वे उन सुधारवादी उपायों को अपर्याप्त मानते थे जो जाति को मानवीय बनाने की कोशिश करते थे। उनके अनुसार जाति को सुधारा नहीं जा सकता; उसे समाप्त करना होगा।
इसके लिए केवल कानूनी सुधार पर्याप्त नहीं थे। आंबेडकर ने सामाजिक चेतना के रूपांतरण की आवश्यकता पर बल दिया, जिसमें उन धार्मिक सिद्धांतों को अस्वीकार करना शामिल था जो असमानता को正 ठहराते हैं। सामाजिक सुधार को उन्होंने राजनीतिक सुधार की पूर्वशर्त माना।
आंबेडकर की दृष्टि में जाति का विनाश विनाशकारी नहीं, बल्कि नैतिक पुनर्निर्माण की प्रक्रिया थी—एक ऐसे समाज की रचना जो स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व पर आधारित हो।
धर्मांतरण और हिंदू सामाजिक व्यवस्था का परित्याग
आंबेडकर द्वारा हिंदू धर्म का त्याग और बौद्ध धर्म की स्वीकृति उनकी आलोचना का तार्किक निष्कर्ष थी। उनका निष्कर्ष स्पष्ट था कि जब तक जाति हिंदू धर्म का अभिन्न अंग बनी रहेगी, तब तक दलितों के लिए उसमें सम्मानजनक जीवन संभव नहीं है।
धर्मांतरण उनके लिए आध्यात्मिक पलायन नहीं, बल्कि एक राजनीतिक और नैतिक घोषणा थी—एक ऐसे सामाजिक ढाँचे का त्याग जो मनुष्यता से वंचित करता है और आत्मसम्मान की पुनःप्राप्ति का माध्यम।
इस प्रकार आंबेडकर ने यह दिखाया कि मुक्ति केवल कानूनी और आर्थिक परिवर्तनों से नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और नैतिक ढाँचों के रूपांतरण से भी जुड़ी है।
निष्कर्ष : भारतीय समाज की केंद्रीय समस्या के रूप में जाति
जाति और हिंदू सामाजिक व्यवस्था पर आंबेडकर की आलोचना आधुनिक सामाजिक चिंतन की सबसे सशक्त हस्तक्षेपों में से एक है। उन्होंने जाति को धार्मिक सत्ता, सामाजिक प्रथाओं और नैतिक उदासीनता से पोषित स्तरबद्ध असमानता की व्यवस्था के रूप में उजागर किया।
आंबेडकर के लिए जाति लोकतंत्र, सामाजिक न्याय और राष्ट्रीय एकता के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा थी। उसका विनाश गरिमा, समानता और बंधुत्व पर आधारित समाज के निर्माण के लिए अनिवार्य शर्त है। जाति, धर्म और सामाजिक परिवर्तन पर होने वाली समकालीन बहसों में आंबेडकर का यह दृष्टिकोण आज भी उतना ही प्रासंगिक है।
संदर्भ (References)
- आंबेडकर, बी. आर., जाति का विनाश (Annihilation of Caste)
- आंबेडकर, बी. आर., हिंदू धर्म का दर्शन (Philosophy of Hinduism)
- आंबेडकर, बी. आर., भारत में जातियाँ: उनकी संरचना, उत्पत्ति और विकास
- ओमवेट, गेल, बुद्ध से आंबेडकर तक: जाति की समझ
- ज़ेलियट, एलेनोर, अनटचेबल से दलित तक
- तेलतुम्बड़े, आनंद, रिपब्लिक ऑफ़ कास्ट