समकालीन सरोकार, अंतर्विरोध और बहसें
बी. आर. आंबेडकर की प्रासंगिकता समकालीन भारत में केवल ऐतिहासिक स्मरण तक सीमित नहीं है। आंबेडकर के विचार आज भी लोकतंत्र, सामाजिक न्याय, जाति, धर्म, राष्ट्रवाद, लैंगिक समानता और आर्थिक असमानता से जुड़ी बहसों को गहराई से प्रभावित करते हैं। किंतु आंबेडकर के समकालीन उपयोग के साथ गंभीर अंतर्विरोध और प्रतिस्पर्धी व्याख्याएँ भी जुड़ी हुई हैं। एक ओर उनके विचारों का व्यापक संदर्भ लिया जाता है, वहीं दूसरी ओर उनकी मूल और क्रांतिकारी आलोचना को अक्सर कमजोर, चयनात्मक या विकृत रूप में प्रस्तुत किया जाता है।
यही तनाव—प्रासंगिकता और विकृति के बीच—आंबेडकर से जुड़ी समकालीन चिंताओं और बहसों का केंद्र है।
सामाजिक लोकतंत्र का संकट
आंबेडकर ने स्पष्ट रूप से चेतावनी दी थी कि सामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र के बिना राजनीतिक लोकतंत्र टिकाऊ नहीं हो सकता। समकालीन भारत में यह चेतावनी अत्यंत प्रासंगिक दिखाई देती है। संवैधानिक गारंटियों के बावजूद जाति-आधारित भेदभाव, आर्थिक असमानता और सामाजिक बहिष्कार आज भी व्यापक रूप से मौजूद हैं।
अछूतपन के नए रूप, संपत्ति और संसाधनों का केंद्रीकरण, तथा शिक्षा और रोज़गार तक असमान पहुँच यह दर्शाती है कि औपचारिक समानता वास्तविक समानता में परिवर्तित नहीं हो सकी है। आंबेडकर द्वारा बंधुत्व (fraternity) पर दिया गया ज़ोर—जो लोकतंत्र की नैतिक नींव है—आज के सामाजिक ध्रुवीकरण और अविश्वास के माहौल में और भी प्रासंगिक हो जाता है।
यहाँ मूल अंतर्विरोध यह है कि लोकतांत्रिक संस्थाएँ तो मौजूद हैं, लेकिन वे सामाजिक परिस्थितियाँ कमजोर बनी हुई हैं जिनके बिना लोकतंत्र सार्थक नहीं हो सकता।
संवैधानिकता बनाम बहुसंख्यकवाद
आंबेडकर का लोकतंत्र संबंधी दृष्टिकोण संवैधानिक नैतिकता, अल्पसंख्यक अधिकारों और संस्थागत संयम पर आधारित था। वे बहुसंख्यकवाद को लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा मानते थे।
समकालीन राजनीति में संवैधानिकता और बहुसंख्यक राष्ट्रवाद के बीच बढ़ता तनाव दिखाई देता है। जनादेश का उपयोग अधिकारों के क्षरण, अल्पसंख्यकों के हाशिएकरण और संस्थाओं को कमजोर करने के लिए किया जाना आंबेडकर की लोकतंत्र-समझ के विपरीत है।
यह एक गहरा अंतर्विरोध है कि आंबेडकर को प्रतीकात्मक रूप से सम्मानित किया जाता है, जबकि वे जिन संवैधानिक मूल्यों के रक्षक थे—जैसे कानून के समक्ष समानता और असहमति की सुरक्षा—उन्हें चुनौती दी जा रही है।
समकालीन भारत में जाति : निरंतरता और रूपांतरण
एक प्रमुख समकालीन बहस जाति के बदलते स्वरूप को लेकर है। कुछ विद्वान मानते हैं कि शहरीकरण, आर्थिक विकास और आधुनिकीकरण के कारण जाति का प्रभाव कम हो रहा है। किंतु आंबेडकर का विश्लेषण बताता है कि जाति समाप्त नहीं होती, बल्कि नए रूपों में स्वयं को ढाल लेती है।
आज जाति आवासीय पृथक्करण, शिक्षा तक पहुँच, श्रम बाज़ार और डिजिटल प्लेटफॉर्मों के माध्यम से कार्य करती है। प्रत्यक्ष भेदभाव भले ही सार्वजनिक रूप से निंदनीय हो, लेकिन संरचनात्मक असमानताएँ बनी रहती हैं। आंबेडकर की “स्तरबद्ध असमानता” की अवधारणा इन समकालीन रूपों को समझने में सहायक है।
साथ ही, दलित आत्मसम्मान, राजनीतिक लामबंदी और सांस्कृतिक आंदोलनों में वह मुक्ति-सम्भावना दिखाई देती है जिसकी कल्पना आंबेडकर ने की थी। यहाँ अंतर्विरोध दमन और प्रतिरोध—दोनों की सह-अस्तित्व में मौजूदगी में निहित है।
पहचान की राजनीति और सार्वभौमिकता
आंबेडकर और पहचान की राजनीति के संबंध में तीखी बहसें होती रही हैं। आलोचकों का कहना है कि समकालीन दलित राजनीति समाज को विभाजित करती है, जबकि समर्थकों के अनुसार ऐतिहासिक अन्याय के विरुद्ध संघर्ष के लिए पहचान-आधारित राजनीति आवश्यक है।
आंबेडकर का स्वयं का दृष्टिकोण इस बहस को जटिल बनाता है। वे दलित अनुभव से बोलते थे, लेकिन उनका अंतिम लक्ष्य सार्वभौमिक मानवीय मुक्ति था। पहचान उनके लिए लक्ष्य नहीं, बल्कि समानता और गरिमा प्राप्त करने का साधन थी।
समकालीन अंतर्विरोध तब उत्पन्न होता है जब पहचान की राजनीति को या तो विभाजनकारी कहकर खारिज कर दिया जाता है, या फिर उसे केवल प्रतीकात्मक प्रतिनिधित्व तक सीमित कर दिया जाता है—बिना वास्तविक पुनर्वितरण और सुधार के।
धर्म, धर्मनिरपेक्षता और सांस्कृतिक राजनीति
आंबेडकर की धर्म-आलोचना—विशेषकर उन धार्मिक व्यवस्थाओं की जो असमानता को正 ठहराती हैं—आज की धर्मनिरपेक्षता और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की बहसों में अत्यंत प्रासंगिक है। वे धार्मिक स्वतंत्रता के समर्थक थे, लेकिन उनका आग्रह था कि धर्म को संवैधानिक मूल्यों के अधीन होना चाहिए।
समकालीन भारत में धर्म राजनीतिक विमर्श और नीतियों को अधिक प्रभावित करने लगा है। आस्था-आधारित पहचान और संवैधानिक धर्मनिरपेक्षता के बीच तनाव वही अंतर्विरोध है जिसकी चेतावनी आंबेडकर ने दी थी।
आंबेडकर का दर्शन न तो ऐसी धर्मनिरपेक्षता का समर्थन करता है जो सामाजिक असमानताओं की अनदेखी करे, और न ही ऐसे सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का जो अधिकारों को धार्मिक पहचान के अधीन कर दे।
लैंगिक न्याय और अधूरा सुधार
हिंदू कोड बिल के माध्यम से आंबेडकर की लैंगिक समानता की प्रतिबद्धता आज भी समकालीन बहसों के लिए मानक बनी हुई है। यद्यपि कानूनी सुधारों ने स्त्रियों के अधिकारों का विस्तार किया है, फिर भी पितृसत्ता परिवार, श्रम बाज़ार और सामाजिक मान्यताओं में गहराई से जमी हुई है।
यहाँ अंतर्विरोध प्रगतिशील कानूनों और प्रतिगामी सामाजिक व्यवहारों के सह-अस्तित्व में दिखाई देता है। आंबेडकर का यह कथन कि “घरेलू जीवन में निरंकुशता के साथ लोकतंत्र जीवित नहीं रह सकता”, आज भी अत्यंत प्रासंगिक है।
समकालीन नारीवादी आंदोलनों में आंबेडकर की जाति और लिंग के अंतर्संबंध (intersectionality) की समझ लगातार अधिक महत्त्वपूर्ण होती जा रही है।
प्रतीकीकरण, अपहरण और क्रांतिकारी चिंतन
समकालीन बहसों का एक महत्वपूर्ण पक्ष है आंबेडकर का प्रतीकीकरण (iconization)। मूर्तियाँ, चित्र और सार्वजनिक समारोह उनके व्यापक सम्मान को दर्शाते हैं। किंतु यह प्रतीकात्मक स्वीकृति अक्सर उनके क्रांतिकारी विचारों के प्रति प्रतिरोध के साथ सह-अस्तित्व में रहती है।
हिंदू सामाजिक व्यवस्था की उनकी आलोचना, अल्पसंख्यक अधिकारों का उनका समर्थन और आर्थिक लोकतंत्र पर उनका ज़ोर अक्सर हाशिए पर डाल दिया जाता है। आंबेडकर को सम्मान देना लेकिन उनके विचारों को न अपनाना स्मृति-राजनीति का एक गंभीर अंतर्विरोध है।
स्वयं आंबेडकर ने नायक-पूजा के विरुद्ध चेतावनी दी थी और आलोचनात्मक विवेक तथा नैतिक साहस पर ज़ोर दिया था।
निष्कर्ष : वर्तमान के लिए एक आलोचनात्मक संसाधन
आंबेडकर से जुड़ी समकालीन चिंताएँ, अंतर्विरोध और बहसें उनके विचारों की स्थायी शक्ति और विवादास्पद प्रकृति—दोनों को उजागर करती हैं। आंबेडकर अतीत की स्मृति नहीं, बल्कि वर्तमान को समझने और वैकल्पिक भविष्य की कल्पना करने का एक सशक्त बौद्धिक संसाधन हैं।
उनका चिंतन समाज को समानता, सत्ता और न्याय से जुड़े असहज प्रश्नों का सामना करने के लिए बाध्य करता है। संवैधानिक आदर्शों और सामाजिक यथार्थ के बीच का अंतर, प्रतीकात्मक समावेशन और वास्तविक परिवर्तन के बीच का तनाव, तथा लोकतंत्र और वर्चस्व के बीच का संघर्ष—ये सभी वही अधूरी परियोजनाएँ हैं जिनकी ओर आंबेडकर ने संकेत किया था।
आज आंबेडकर से वास्तविक संवाद का अर्थ है—उत्सव से आगे बढ़कर आलोचनात्मक अनुप्रयोग की ओर जाना; उनके विचारों का उपयोग संस्थाओं की जाँच, पदानुक्रमों की चुनौती और लोकतंत्र की नैतिक नींव के पुनर्निर्माण के लिए करना।
संदर्भ (References)
- आंबेडकर, बी. आर., जाति का विनाश (Annihilation of Caste)
- आंबेडकर, बी. आर., राज्य और अल्पसंख्यक (States and Minorities)
- आंबेडकर, बी. आर., संविधान सभा में भाषण
- ओमवेट, गेल, आंबेडकर: एक प्रबुद्ध भारत की ओर
- रोड्रिग्स, वैलेरियन (सं.), बी. आर. आंबेडकर के आवश्यक लेखन
- तेलतुम्बड़े, आनंद, रिपब्लिक ऑफ़ कास्ट