शहरी शासन (Urban Governance)
परिचय
शहरी शासन भारत के लोकतांत्रिक और प्रशासनिक ढांचे का एक महत्वपूर्ण आयाम है। जैसे-जैसे शहर आर्थिक विकास, सामाजिक नवाचार और राजनीतिक सक्रियता के केंद्र बने हैं, शहरी क्षेत्रों में शासन का महत्व बढ़ता गया है। शहरी शासन केवल प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं है; यह उन संस्थागत तंत्रों, राजनीतिक प्रक्रियाओं और सहभागिता संरचनाओं का प्रतिनिधित्व करता है जिनके माध्यम से शहरी समुदाय सार्वजनिक सेवाओं, आधारभूत संरचना और नागरिक अधिकारों पर निर्णय लेते हैं।

शहरी शासन की चुनौतियाँ बहुआयामी हैं। तेज़ी से बढ़ती जनसंख्या, विविध आर्थिक स्थिति, प्रवासन और जनसंख्या घनत्व सेवा वितरण और योजना को जटिल बनाते हैं। ग्रामीण शासन की तुलना में शहरी शासन में नगर प्रबंधन, महानगरीय समन्वय और बहु-स्तरीय नीति कार्यान्वयन शामिल होते हैं।
शहरी शासन की वैचारिक पृष्ठभूमि
शहरी शासन उन औपचारिक और अनौपचारिक संस्थाओं, नीतियों और प्रक्रियाओं को संदर्भित करता है जिनके माध्यम से शहर और कस्बों का प्रबंधन होता है। इसका उद्देश्य उत्तरदायित्व, पारदर्शिता, संवेदनशीलता और नागरिक सहभागिता सुनिश्चित करना है। शहरी शासन में नगरपालिका प्रशासन, नगर योजना, सेवा वितरण, वित्तीय प्रबंधन और नियामक निगरानी शामिल हैं।
स्थानीय शासन और विकेंद्रीकरण के विद्वानों का तर्क है कि शहरी शासन में प्रशासनिक दक्षता और राजनीतिक वैधता दोनों की आवश्यकता होती है। शहरों को ऐसे शासन मॉडल की आवश्यकता है जो नौकरशाही क्षमता और नागरिक भागीदारी के बीच संतुलन बनाए रखे, ताकि शहरी विकास नागरिकों की आवश्यकताओं और आकांक्षाओं के अनुरूप हो।
भारत में शहरी शासन का ऐतिहासिक विकास
भारत में शहरी शासन का विकास विभिन्न ऐतिहासिक चरणों से गुजरा है। औपनिवेशिक काल में नगरपालिका और नगर निगम मुख्यतः प्रशासनिक नियंत्रण, कर संग्रह और नागरिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए स्थापित किए गए थे। इन संस्थाओं का उद्देश्य नागरिक सशक्तिकरण नहीं था।
स्वतंत्रता के बाद, शहरी शासन प्रारंभ में केंद्रीकृत प्रशासनिक मॉडल का पालन करता रहा। लेकिन तेजी से बढ़ती शहरी आबादी, सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन और लोकतांत्रिक दबाव ने संस्थागत सुधार की आवश्यकता को स्पष्ट किया। परिणामस्वरूप सत्ता का अधिक विकेंद्रीकरण और निर्वाचित शहरी निकायों की स्थापना हुई।
संवैधानिक और कानूनी ढांचा
74वें संविधान संशोधन अधिनियम (1992) ने शहरी शासन में मील का पत्थर स्थापित किया। इस संशोधन ने शहरी स्थानीय निकायों (ULBs) को संवैधानिक दर्जा प्रदान किया और विकेंद्रीकृत शहरी प्रशासन का ढांचा बनाया। इसमें नगर पालिकाएँ, नगर निगम और नगर पंचायतें शामिल हैं, जिन्हें शहरी योजना, सेवा वितरण, नियमन और संसाधन जुटाने के अधिकार दिए गए।
संशोधन में निर्वाचित प्रतिनिधित्व, महिलाओं और वंचित समूहों के लिए आरक्षण, और वित्तीय विकेंद्रीकरण की व्यवस्थाएँ भी शामिल हैं। शहरी शासन को संवैधानिक दर्जा देकर नागरिक सहभागिता और उत्तरदायित्व को मजबूत किया गया।
संस्थागत संरचना और कार्य
शहरी शासन कई स्तरों पर कार्य करता है, जिसमें नगर निगम, मध्यवर्ती नगर परिषद और विशेष एजेंसियाँ शामिल हैं। इन निकायों की जिम्मेदारियों में शहरी योजना, जलापूर्ति, स्वच्छता, अपशिष्ट प्रबंधन, आवास, परिवहन और स्थानीय आर्थिक विकास शामिल हैं।
प्रभावी शहरी शासन के लिए स्थानीय, राज्य और केंद्र सरकारों के बीच समन्वय आवश्यक है। वित्तीय हस्तांतरण, नियामक निगरानी और नीतिगत ढांचा शहरी संस्थाओं के अधिकारों को परिभाषित करता है। इसके अतिरिक्त, वार्ड समितियों, नागरिक मंचों और शिकायत निवारण प्रणाली के माध्यम से नागरिक सहभागिता शासन की वैधता को बढ़ाती है।
शहरी शासन और सहभागी लोकतंत्र
शहरी क्षेत्रों में सहभागी शासन का उद्देश्य नागरिकों को निर्णय-निर्माण, नीति प्राथमिकता और सेवा वितरण की निगरानी में शामिल करना है। वार्ड समितियाँ, निवासी संघ और सार्वजनिक सुनवाई जैसी सहभागी व्यवस्थाएँ शहरी योजना को लोकतांत्रिक बनाने और उत्तरदायित्व बढ़ाने में मदद करती हैं।
सहभागिता सामाजिक असमानताओं को दूर करने में भी मदद करती है, क्योंकि यह हाशिए पर पड़े समुदायों को निर्णय प्रक्रिया में भाग लेने का अवसर देती है। इस प्रकार शहरी शासन लोकतांत्रिक आदर्शों और प्रशासनिक व्यवहार का संयोजन बन जाता है।
शहरी शासन की चुनौतियाँ
शहरी शासन को अनेक चुनौतियों का सामना करना पड़ता है:
- प्रशासनिक जटिलता: शहरों में पेशेवर प्रबंधन आवश्यक है, लेकिन नौकरशाही में अक्सर अक्षमता रहती है।
- वित्तीय सीमाएँ: शहरी निकायों की वित्तीय स्वायत्तता सीमित है और वे राज्य अनुदानों पर निर्भर रहते हैं।
- अनौपचारिक बस्तियाँ: शहरी शासन को स्लम और अनौपचारिक अर्थव्यवस्था को समायोजित करना पड़ता है।
- समन्वय की कमी: एजेंसियों और सरकारों के बीच समन्वय कमजोर होने से सेवा वितरण में विफलता होती है।
- राजनीतिक विभाजन: अनेक राजनीतिक हित और समूह नीति निर्माण को प्रभावित कर सकते हैं।
सतत विकास और शहरी शासन
आधुनिक शहरी शासन सतत विकास, पर्यावरण प्रबंधन और समावेशी विकास से जुड़ा हुआ है। स्मार्ट सिटी परियोजनाएँ, ई-गवर्नेंस और जलवायु-रोधी योजना तकनीक, सहभागिता और सततता के सिद्धांतों को शहरी प्रबंधन में एकीकृत करती हैं।
शहरी शासन अवसंरचना, सामाजिक समानता, आर्थिक विकास और पर्यावरण संरक्षण के संयोजन पर कार्य करता है। इन सभी आयामों का संतुलन उसकी प्रभावशीलता और वैधता को परिभाषित करता है।
निष्कर्ष
शहरी शासन भारतीय लोकतंत्र और विकास की रणनीति का एक केंद्रीय स्तंभ है। संवैधानिक और संस्थागत सुधारों, विशेषकर 74वें संशोधन के बाद, विकेंद्रीकृत और सहभागी शासन का ढांचा मजबूत हुआ है। इसके बावजूद, तेज़ी से बढ़ती शहरी आबादी, संस्थागत क्षमता की सीमाएँ और सामाजिक-आर्थिक विविधता लगातार चुनौतियाँ प्रस्तुत करती हैं।
प्रभावी शहरी शासन के लिए संस्थागत नवाचार, वित्तीय सशक्तिकरण, नागरिक सहभागिता और बहु-स्तरीय समन्वित योजना आवश्यक हैं। जैसे-जैसे शहरी भारत बढ़ रहा है, सुदृढ़ शासन ढांचे समानता, सतत विकास और लोकतांत्रिक प्रशासन सुनिश्चित करने में अहम होंगे।
संदर्भ / सुझाई गई पुस्तकें
- एम. पी. शर्मा – Urban Local Government in India
- भारत सरकार, शहरी विकास मंत्रालय – Urban Governance Reports
- जीन ड्रेज़ और अमर्त्य सेन – India: Development and Participation
- बी. के. घोष – Local Governance in India
- रमेश सिंह – Municipal Administration and Governance in India
- 74वां संविधान संशोधन अधिनियम (1992) – पाठ और व्याख्याएँ
FAQs
1. शहरी शासन क्या है?
शहरी शासन उन प्रक्रियाओं और संस्थाओं को संदर्भित करता है जिनके माध्यम से शहर और कस्बों का प्रबंधन किया जाता है, जिसमें सेवा वितरण, योजना और नागरिक सहभागिता शामिल है।
2. भारत में शहरी शासन क्यों महत्वपूर्ण है?
तेज़ urbanization और बढ़ती महानगरीय आबादी के कारण शहरी शासन लोकतांत्रिक सहभागिता और सतत विकास के लिए आवश्यक है।
3. शहरी स्थानीय निकायों की मुख्य जिम्मेदारियाँ क्या हैं?
शहरी योजना, जलापूर्ति, स्वच्छता, अपशिष्ट प्रबंधन, आवास, परिवहन और स्थानीय आर्थिक विकास।
4. शहरी शासन की प्रमुख चुनौतियाँ क्या हैं?
प्रशासनिक अक्षमता, वित्तीय निर्भरता, अनौपचारिक बस्तियाँ, समन्वय की कमी और राजनीतिक विभाजन।