जेंडरयुक्त अंतरराष्ट्रीय संबंध की अवधारणाएँ : संप्रभुता
(Gendered Concepts of IR: Sovereignty)
संप्रभुता (Sovereignty) अंतरराष्ट्रीय संबंध (IR) की सबसे मूलभूत अवधारणाओं में से एक है। पारंपरिक रूप से इसे किसी राज्य की अपने क्षेत्र और जनसंख्या पर सर्वोच्च सत्ता के रूप में परिभाषित किया जाता है। मुख्यधारा IR सिद्धांतों में संप्रभुता को एक तटस्थ, कानूनी–राजनीतिक सिद्धांत माना गया है। नारीवादी विद्वान इस तटस्थता को चुनौती देते हैं और तर्क देते हैं कि संप्रभुता अपने ऐतिहासिक निर्माण, प्रतीकात्मक अर्थों और राजनीतिक व्यवहारों में गहराई से जेंडरयुक्त है। जो अवधारणा वस्तुनिष्ठ प्रतीत होती है, वह वास्तव में पुरुषवादी मान्यताओं—स्वायत्तता, नियंत्रण और प्रभुत्व—पर आधारित है, जबकि परस्पर निर्भरता, देखभाल और असुरक्षा को अदृश्य बना देती है।
यह इकाई संप्रभुता को एक जेंडरयुक्त अवधारणा के रूप में विश्लेषित करती है और दिखाती है कि नारीवादी IR इसके अर्थों, सीमाओं और परिणामों पर कैसे पुनर्विचार करता है।
संप्रभुता की पारंपरिक समझ
पारंपरिक IR में संप्रभुता को स्वायत्तता, स्वतंत्रता और सर्वोच्च अधिकार के रूप में समझा जाता है। संप्रभु राज्य को एक सीमाबद्ध, आत्मनिर्भर इकाई के रूप में कल्पित किया जाता है, जो बाहरी हस्तक्षेप से मुक्त होकर निर्णय लेने और स्वयं की रक्षा करने में सक्षम है। यह दृष्टिकोण आधुनिक प्रारंभिक राजनीतिक चिंतन से प्रेरित है, जहाँ संप्रभुता को केंद्रीकृत सत्ता, व्यवस्था और आज्ञाकारिता लागू करने की क्षमता से जोड़ा गया।
मुख्यधारा IR में संप्रभुता दो प्रमुख कार्य करती है। पहला, यह राज्य को वैश्विक राजनीति का प्राथमिक कर्ता स्थापित करती है। दूसरा, यह क्षेत्रीय अखंडता और राष्ट्रीय हित की रक्षा के नाम पर बल प्रयोग को वैध ठहराती है। नारीवादी विद्वानों के अनुसार, ये दोनों कार्य पुरुषवादी राजनीतिक सत्ता के आदर्श पर आधारित हैं, जो नियंत्रण, शक्ति और आत्मनिर्भरता को महिमामंडित करते हैं।
पुरुषवादी राजनीतिक कल्पनाएँ और संप्रभुता
नारीवादी IR सिद्धांतकारों का तर्क है कि संप्रभुता पुरुषवादी राजनीतिक कल्पनाओं में रची-बसी है। संप्रभु राज्य को अक्सर एक तर्कसंगत, स्वायत्त पुरुष विषय (male subject) के रूप में रूपकात्मक ढंग से प्रस्तुत किया जाता है—जो सीमाओं की रक्षा करता है, नियंत्रण स्थापित करता है और अव्यवस्था को दबाता है।
J. Ann Tickner बताती हैं कि संप्रभुता की भाषा पारंपरिक रूप से पुरुषत्व से जुड़े गुणों—स्वतंत्रता, निर्णायकता और दमनकारी क्षमता—को विशेषाधिकार देती है। इसके विपरीत, स्त्रीत्व से जुड़े गुण—निर्भरता, देखभाल और संबंधपरकता—को संप्रभुता के लिए खतरे के रूप में देखा जाता है।
यह जेंडरयुक्त कोडिंग सैन्यीकरण को स्वाभाविक बनाती है। “मज़बूत” संप्रभु राज्य वह माना जाता है जो शक्ति का प्रदर्शन कर सके, जबकि सहयोग या संयम को कमजोरी के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। इस प्रकार संप्रभुता एक नैतिक और राजनीतिक आदर्श बन जाती है, जो पुरुषवादी शक्ति की अवधारणाओं पर टिकी होती है।
सार्वजनिक सत्ता और निजी क्षेत्र का बहिष्कार
संप्रभुता का एक अन्य जेंडरयुक्त आयाम सार्वजनिक–निजी विभाजन में निहित है। संप्रभुता को कूटनीति, युद्ध और कानून जैसे सार्वजनिक क्षेत्रों में परिभाषित किया जाता है—वे क्षेत्र जो ऐतिहासिक रूप से पुरुषों के वर्चस्व में रहे हैं। इसके विपरीत, परिवार, पुनरुत्पादन और देखभाल से जुड़ा निजी क्षेत्र संप्रभु राजनीति से बाहर रखा जाता है।
नारीवादी विद्वानों का तर्क है कि यह बहिष्कार प्राकृतिक नहीं, बल्कि राजनीतिक है। संप्रभु राज्य जनसंख्या, श्रम शक्ति और सेना को बनाए रखने के लिए सामाजिक पुनरुत्पादन पर निर्भर करता है—एक ऐसा कार्य जो प्रायः स्त्रियों द्वारा किया जाता है। फिर भी, ये योगदान संप्रभु विमर्श में अदृश्य रहते हैं।
Cynthia Enloe ने दिखाया है कि स्त्रियों का दैनिक श्रम—सैनिकों का पालन-पोषण, घरेलू कार्य, युद्ध अर्थव्यवस्था को सहारा देना—राज्य की संप्रभुता की नींव है, लेकिन इसे राजनीतिक मान्यता नहीं मिलती। इस प्रकार संप्रभुता उन जेंडर आधारित असमानताओं पर टिकी होती है जिन्हें वह स्वीकार नहीं करती।
संप्रभुता, सीमाएँ और शरीरों पर नियंत्रण
नारीवादी आलोचनाएँ इस बात पर बल देती हैं कि संप्रभुता केवल भू-क्षेत्र पर ही नहीं, बल्कि शरीरों पर भी लागू होती है—विशेषकर स्त्रियों के शरीरों पर। राज्य राष्ट्रीय हित और जनसांख्यिकीय सुरक्षा के नाम पर प्रजनन, यौनिकता, विवाह और प्रवासन को नियंत्रित करता है।
जनसंख्या नीतियाँ, नागरिकता कानून और नैतिक विनियमन यह दिखाते हैं कि संप्रभुता कैसे निजी जीवन में प्रवेश करती है। नारीवादी IR के अनुसार, ये प्रथाएँ यह भ्रम तोड़ती हैं कि संप्रभुता केवल क्षेत्रीय सत्ता है; वास्तव में यह जैव-राजनीतिक (biopolitical) नियंत्रण के माध्यम से कार्य करती है।
युद्ध और संघर्ष की परिस्थितियों में ये जेंडरयुक्त अभ्यास और भी स्पष्ट हो जाते हैं, जहाँ यौन हिंसा का उपयोग संप्रभु प्रभुत्व स्थापित करने और क्षेत्रीय विजय को चिह्नित करने के लिए किया जाता है।
उत्तर–औपनिवेशिक और नारीवादी आलोचनाएँ
उत्तर–औपनिवेशिक नारीवादी विद्वानों का तर्क है कि अंतरराष्ट्रीय प्रणाली में संप्रभुता समान रूप से वितरित नहीं है। पश्चिमी राज्यों को पूर्ण संप्रभु माना जाता है, जबकि उत्तर–औपनिवेशिक राज्यों की संप्रभुता अक्सर शर्तबद्ध या सीमित होती है—जो उपनिवेशवाद की विरासत, आर्थिक निर्भरता और वैश्विक शासन-प्रणालियों से प्रभावित होती है।
इन पदानुक्रमों में जेंडर की भूमिका महत्वपूर्ण है। संरचनात्मक समायोजन कार्यक्रम, मानवीय हस्तक्षेप और सुरक्षा नीतियाँ अक्सर स्त्रियों को विकास या संरक्षण के उपकरण के रूप में लक्षित करती हैं, जिससे संप्रभुता के पितृसत्तात्मक रूप पुनः उत्पन्न होते हैं।
इस प्रकार नारीवादी आलोचना संप्रभुता को एक पदानुक्रमित और बहिष्करणकारी अवधारणा के रूप में उजागर करती है, न कि सभी राज्यों पर समान रूप से लागू होने वाले सार्वभौमिक सिद्धांत के रूप में।
संप्रभुता पर पुनर्विचार : नारीवादी विकल्प
नारीवादी IR संप्रभुता को पूरी तरह खारिज नहीं करता, बल्कि उसे पुनर्परिभाषित करने का प्रयास करता है। स्वायत्तता और नियंत्रण के बजाय, नारीवादी दृष्टिकोण परस्पर निर्भरता, उत्तरदायित्व और मानव सुरक्षा पर ज़ोर देता है।
राज्य संप्रभुता से लोगों के जीवित अनुभवों की ओर ध्यान स्थानांतरित कर नारीवादी दृष्टियाँ इस मान्यता को चुनौती देती हैं कि सीमाओं की रक्षा ही सुरक्षा की गारंटी है। वे ऐसी राजनीतिक सत्ता की कल्पना प्रस्तुत करती हैं जो सैन्य शक्ति के बजाय सामाजिक न्याय के प्रति जवाबदेह हो।
यह पुनर्विचार वैश्विक राजनीति की वैकल्पिक कल्पनाओं के लिए स्थान खोलता है, जहाँ संप्रभुता सहयोग, देखभाल और अंतरराष्ट्रीय उत्तरदायित्व के साथ संगत हो सकती है।
निष्कर्ष : IR की जेंडरयुक्त नींव के रूप में संप्रभुता
नारीवादी विश्लेषण से स्पष्ट होता है कि संप्रभुता एक गहराई से जेंडरयुक्त अवधारणा है, जो यह निर्धारित करती है कि अंतरराष्ट्रीय संबंधों में सत्ता, सुरक्षा और वैधता को कैसे समझा जाए। इसकी पुरुषवादी नींव स्वायत्तता और बल प्रयोग को प्राथमिकता देती है, जबकि देखभाल, निर्भरता और दैनिक जीवन को हाशिए पर रखती है।
इन जेंडर आधारित मान्यताओं को उजागर कर नारीवादी IR संप्रभुता की स्वयंसिद्ध स्थिति को अस्थिर करता है और उसके नैतिक व राजनीतिक परिणामों पर प्रकाश डालता है। इस प्रकार संप्रभुता की आलोचना वैश्विक राजनीति को अधिक समावेशी और मानवीय रूप में पुनर्कल्पित करने की व्यापक नारीवादी परियोजना का केंद्रीय हिस्सा बन जाती है।
संदर्भ (References)
- टिकनर, जे. ऐन, जेंडर इन इंटरनेशनल रिलेशन्स: फ़ेमिनिस्ट पर्सपेक्टिव्स ऑन अचीविंग ग्लोबल सिक्योरिटी
- एनलो, सिंथिया, बनानाज़, बीचेज़ एंड बेसिस
- पीटरसन, वी. स्पाइक, जेंडर्ड स्टेट्स
- सिल्वेस्टर, क्रिस्टीन, फ़ेमिनिस्ट थ्योरी एंड इंटरनेशनल रिलेशन्स
- वेबर, सिंथिया, इंटरनेशनल रिलेशन्स थ्योरी: ए क्रिटिकल इंट्रोडक्शन