निर्वाचन अध्ययनों का विकास (Evolution of Election Studies)
निर्वाचन अध्ययन लोकतांत्रिक राजनीति के अध्ययन का एक महत्वपूर्ण क्षेत्र है, जो चुनावों, मतदाता व्यवहार, राजनीतिक दलों और प्रतिनिधित्व की प्रक्रियाओं को समझने का प्रयास करता है। समय के साथ यह क्षेत्र केवल चुनावी परिणामों के वर्णन तक सीमित न रहकर एक बहु-विषयक (interdisciplinary) अध्ययन बन गया है, जिसमें राजनीति विज्ञान के साथ-साथ समाजशास्त्र, मनोविज्ञान, अर्थशास्त्र और सांख्यिकी का भी योगदान रहा है।
निर्वाचन अध्ययनों का विकास लोकतंत्र की बदलती प्रकृति, नई शोध-पद्धतियों और प्रतिनिधित्व व सहभागिता से जुड़ी सैद्धांतिक चिंताओं को प्रतिबिंबित करता है।
प्रारंभिक चरण: वर्णनात्मक और संस्थागत दृष्टिकोण
निर्वाचन अध्ययनों का प्रारंभिक चरण मुख्यतः वर्णनात्मक (descriptive) और संस्थागत (institutional) था। इस दौर में विद्वानों का ध्यान निम्न विषयों पर केंद्रित रहा—
- निर्वाचन कानून और प्रक्रियाएँ
- संवैधानिक ढाँचा
- दलीय व्यवस्था और संसदीय संस्थाएँ
चुनावों को मुख्यतः प्रतिनिधित्व के औपचारिक तंत्र के रूप में देखा गया। मतदाता व्यवहार या सामाजिक प्रभावों पर कम ध्यान दिया गया। इस दृष्टिकोण में मतदाताओं को अपेक्षाकृत निष्क्रिय और तर्कसंगत माना गया।
समाजशास्त्रीय मोड़: मतदान एक सामाजिक प्रक्रिया
बीसवीं शताब्दी के मध्य में निर्वाचन अध्ययनों में एक महत्वपूर्ण परिवर्तन आया, जिसे समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण कहा जाता है। इस दृष्टिकोण ने मतदान को एक सामाजिक प्रक्रिया के रूप में देखा।
इस चरण में यह तर्क सामने आया कि मतदान व्यवहार पर—
- वर्ग
- धर्म
- जाति
- क्षेत्र
जैसे सामाजिक कारकों का गहरा प्रभाव पड़ता है।
मतदान को अब एक व्यक्तिगत निर्णय नहीं, बल्कि सामाजिक पहचान और सामूहिक अनुभवों से जुड़ा व्यवहार माना जाने लगा।
मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण: मतदाता केंद्र में
इसके बाद निर्वाचन अध्ययनों में मनोवैज्ञानिक या व्यवहारवादी दृष्टिकोण का विकास हुआ। इसने सामाजिक समूहों से हटकर व्यक्तिगत मतदाता को विश्लेषण का केंद्र बनाया।
इस दृष्टिकोण के अनुसार मतदान व्यवहार प्रभावित होता है—
- राजनीतिक दृष्टिकोण और धारणाओं से
- दल-निष्ठा (Party Identification) से
- नेताओं और मुद्दों की छवि से
इस चरण में सर्वेक्षण अनुसंधान, जनमत सर्वे और सांख्यिकीय विश्लेषण को व्यापक रूप से अपनाया गया। इसे निर्वाचन अध्ययनों में एक क्रांतिकारी परिवर्तन माना जाता है।
तर्कसंगत चयन और आर्थिक मॉडल
1960 के दशक के बाद निर्वाचन अध्ययनों में तर्कसंगत चयन सिद्धांत (Rational Choice Theory) का प्रभाव बढ़ा। इस दृष्टिकोण के अनुसार—
- मतदाता लाभ–हानि का आकलन करते हैं
- सरकारी नीतियों और प्रदर्शन का मूल्यांकन करते हैं
- अपने हितों को अधिकतम करने के लिए मतदान करते हैं
इससे आर्थिक मतदान सिद्धांत (Economic Voting) का विकास हुआ, जिसमें माना गया कि मतदाता आर्थिक प्रदर्शन के आधार पर सरकार को पुरस्कृत या दंडित करते हैं।
हालाँकि आलोचकों का तर्क है कि यह दृष्टिकोण पहचान, भावना और विचारधारा की भूमिका को कम करके आँकता है।
संस्थागत और तुलनात्मक दृष्टिकोण
जैसे-जैसे विभिन्न देशों में लोकतंत्र का विस्तार हुआ, निर्वाचन अध्ययनों में तुलनात्मक और संस्थागत दृष्टिकोण उभरा। इस चरण में अध्ययन किया गया—
- विभिन्न निर्वाचन प्रणालियों का प्रभाव
- निर्वाचन क्षेत्र की संरचना
- मतदान प्रतिशत में अंतर
इस दृष्टिकोण ने यह स्पष्ट किया कि मतदाता व्यवहार को संस्थागत ढाँचे से अलग करके नहीं समझा जा सकता। निर्वाचन नियम और दलीय प्रतिस्पर्धा मतदाता विकल्पों को आकार देते हैं।
नव-लोकतंत्र और वैश्विक दक्षिण में निर्वाचन अध्ययन
बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में उपनिवेशोत्तर और अधिनायकवादी शासन से निकले देशों में चुनावों के प्रसार ने निर्वाचन अध्ययनों को नई दिशा दी।
इन संदर्भों में ध्यान केंद्रित हुआ—
- लोकतांत्रिक सुदृढ़ीकरण
- चुनावी निष्पक्षता और धांधली
- पहचान की राजनीति, संरक्षकवाद और क्लाइंटेलिज़्म
भारत जैसे देशों में चुनावों को जन-सक्रियता, सामाजिक समावेशन और वैधता के साधन के रूप में देखा गया। इससे पश्चिमी मॉडल की सीमाएँ उजागर हुईं और संदर्भ-विशिष्ट विश्लेषण को महत्व मिला।
समालोचनात्मक और मानक दृष्टिकोण
हाल के वर्षों में निर्वाचन अध्ययनों में समालोचनात्मक और मानक (normative) दृष्टिकोण उभरे हैं। इनमें निम्न मुद्दों पर ध्यान दिया गया—
- मतदान प्रतिशत में गिरावट
- धन और मीडिया का प्रभाव
- राजनीतिक असमानता
- लोकलुभावनवाद और ध्रुवीकरण
अब चुनावों का मूल्यांकन केवल उनकी प्रक्रिया के आधार पर नहीं, बल्कि इस आधार पर भी किया जाता है कि वे लोकतांत्रिक आदर्शों को कितना पूरा करते हैं।
पद्धतिगत विस्तार
निर्वाचन अध्ययनों के विकास के साथ अनुसंधान पद्धतियों में भी विस्तार हुआ—
- बड़े पैमाने के सर्वेक्षण
- प्रयोगात्मक अध्ययन
- डिजिटल और डेटा-आधारित विश्लेषण
- दीर्घकालिक (longitudinal) अध्ययन
इन पद्धतियों ने विश्लेषण को अधिक गहरा बनाया, साथ ही नैतिक और व्याख्यात्मक चुनौतियाँ भी प्रस्तुत कीं।
निर्वाचन अध्ययन और लोकतांत्रिक सिद्धांत
निर्वाचन अध्ययन हमेशा से लोकतांत्रिक सिद्धांत से जुड़े रहे हैं। चुनावों को—
- प्रतिनिधित्व का माध्यम
- जवाबदेही का उपकरण
- राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का क्षेत्र
- सामाजिक संघर्ष और समझौते का मंच
माना गया है।
यही कारण है कि निर्वाचन अध्ययन लोकतंत्र की गुणवत्ता पर चल रही बहसों में केंद्रीय स्थान रखते हैं।
निष्कर्ष
निर्वाचन अध्ययनों का विकास संस्थागत वर्णन से व्यवहारिक विश्लेषण, और राष्ट्रीय अध्ययन से तुलनात्मक दृष्टिकोण की ओर एक क्रमिक यात्रा को दर्शाता है। जो अध्ययन कभी केवल चुनावी प्रक्रियाओं तक सीमित था, वह आज लोकतांत्रिक राजनीति के सामाजिक, मनोवैज्ञानिक, आर्थिक और संस्थागत आयामों को समाहित करता है।
यह विकास इस बात को स्पष्ट करता है कि चुनाव केवल तकनीकी घटनाएँ नहीं, बल्कि ऐतिहासिक, सामाजिक और शक्ति-संबंधों से निर्मित राजनीतिक प्रक्रियाएँ हैं।
आधुनिक लोकतंत्र जिन नई चुनौतियों का सामना कर रहे हैं—जैसे विश्वास की कमी, डिजिटल हस्तक्षेप और ध्रुवीकरण—उनके संदर्भ में निर्वाचन अध्ययन की प्रासंगिकता और भी बढ़ जाती है।
संदर्भ (References)
- Duverger, Maurice. Political Parties
- Lazarsfeld, Paul et al. The People’s Choice
- Campbell, Angus et al. The American Voter
- Norris, Pippa. Electoral Engineering
- Dalton, Russell J. Citizen Politics