समानता, प्राथमिकता या पर्याप्तता : वितरणात्मक न्याय की बहस
परिचय (Introduction)
समकालीन राजनीतिक सिद्धांत (contemporary political theory) में वितरणात्मक न्याय (distributive justice) को लेकर एक गहन बहस यह है कि समाज में न्याय स्थापित करने का सही सिद्धांत क्या होना चाहिए। लंबे समय तक समानता (equality) को न्याय का केंद्रीय नैतिक मूल्य माना गया, लेकिन हाल के दशकों में कई विचारकों ने इस धारणा को चुनौती दी है। इसी संदर्भ में समानता (Equality), प्राथमिकता (Priority) और पर्याप्तता (Sufficiency) के बीच एक महत्वपूर्ण वैचारिक बहस उभर कर सामने आती है।

इस बहस से जुड़े प्रमुख विचारक हैं डेरेक पारफिट (Derek Parfit), हैरी फ्रैंकफर्ट (Harry Frankfurt) और सैमुअल शेफलर (Samuel Scheffler)। इन विचारकों का मुख्य प्रश्न यह है कि क्या न्याय का अर्थ सभी को समान बनाना है, या सबसे वंचित लोगों को प्राथमिकता देना है, या केवल यह सुनिश्चित करना है कि सभी के पास “पर्याप्त” हो। यह विषय DU MA Political Science के पाठ्यक्रम में Debates in Political Theory का एक केंद्रीय भाग है।
वितरणात्मक न्याय और नैतिक समानता : वैचारिक पृष्ठभूमि
वितरणात्मक न्याय का संबंध समाज में संसाधनों, अवसरों और लाभों के न्यायपूर्ण वितरण से है। पारंपरिक समानतावादी सिद्धांत यह मानते हैं कि असमानता अपने आप में नैतिक रूप से गलत है। इस दृष्टिकोण में न्याय की मांग यह है कि व्यक्तियों के बीच अंतर को कम से कम किया जाए।
लेकिन आलोचकों ने यह प्रश्न उठाया कि क्या समानता हर परिस्थिति में नैतिक रूप से आवश्यक है। क्या ऐसा समाज बेहतर होगा जहाँ सभी समान रूप से गरीब हों, बजाय उस समाज के जहाँ कुछ लोग अधिक समृद्ध हों लेकिन कोई भी पहले से बदतर न हो? ऐसे ही प्रश्नों ने प्राथमिकता और पर्याप्तता जैसे वैकल्पिक सिद्धांतों को जन्म दिया।
समानता (Equality) एक नैतिक आदर्श के रूप में
समानतावादी दृष्टिकोण के अनुसार असमानता अपने आप में एक नैतिक समस्या है, चाहे उससे किसी को प्रत्यक्ष नुकसान हो या नहीं। इस दृष्टिकोण में समानता को केवल साधन नहीं बल्कि स्वयं एक नैतिक आदर्श (moral ideal) माना जाता है।
हालाँकि, इस दृष्टिकोण की एक बड़ी आलोचना यह है कि यह कभी-कभी “levelling down” की समस्या पैदा करता है। इसका अर्थ यह है कि समानता प्राप्त करने के लिए सभी को बदतर स्थिति में लाना भी नैतिक रूप से स्वीकार्य मान लिया जाता है। इसी कारण कई विचारकों ने यह तर्क दिया कि समानता को अंतिम लक्ष्य मानना समस्याग्रस्त हो सकता है।
प्राथमिकता सिद्धांत (Priority View – Derek Parfit)
डेरेक पारफिट द्वारा प्रस्तुत प्राथमिकता सिद्धांत (priority view) समानता को एक मौलिक नैतिक लक्ष्य के रूप में अस्वीकार करता है। पारफिट के अनुसार नैतिक रूप से महत्वपूर्ण यह नहीं है कि लोग एक-दूसरे के समान हैं या नहीं, बल्कि यह है कि सबसे वंचित लोगों को अधिक लाभ मिले।
इस दृष्टिकोण के अनुसार किसी व्यक्ति को लाभ देना तब अधिक नैतिक महत्व रखता है जब वह व्यक्ति पहले से ही बहुत बुरी स्थिति में हो। इस प्रकार प्राथमिकता सिद्धांत समानता के “levelling down” की समस्या से बचता है और ध्यान इस बात पर केंद्रित करता है कि किसे लाभ मिल रहा है, न कि केवल तुलना पर।
हालाँकि, प्राथमिकता सिद्धांत यह स्वीकार करता है कि बड़ी असमानताएँ बनी रह सकती हैं, बशर्ते सबसे कमजोर वर्ग की स्थिति में सुधार हो।
पर्याप्तता सिद्धांत (Sufficiency View – Harry Frankfurt)
हैरी फ्रैंकफर्ट द्वारा विकसित पर्याप्तता सिद्धांत (sufficiency view) समानता को और भी अधिक स्पष्ट रूप से अस्वीकार करता है। फ्रैंकफर्ट का तर्क है कि न्याय का प्रश्न यह नहीं है कि लोगों के पास कितना अंतर है, बल्कि यह है कि क्या सभी के पास पर्याप्त (enough) है या नहीं।
उनके अनुसार असमानता अपने आप में नैतिक रूप से गलत नहीं है। नैतिक समस्या तब उत्पन्न होती है जब कुछ लोग बुनियादी आवश्यकताओं से वंचित रहते हैं। एक बार जब सभी लोग एक न्यूनतम सभ्य जीवन स्तर (minimum decent standard of living) प्राप्त कर लेते हैं, तो उसके बाद की असमानताएँ नैतिक रूप से महत्वहीन हो जाती हैं।
यह दृष्टिकोण विशेष रूप से गरीबी उन्मूलन और सामाजिक नीति (social policy) के संदर्भ में प्रभावशाली माना जाता है।
शेफलर का संबंधात्मक समानतावाद (Relational Egalitarianism)
सैमुअल शेफलर (Samuel Scheffler) समानता, प्राथमिकता और पर्याप्तता — तीनों पर एक आलोचनात्मक दृष्टि प्रस्तुत करते हैं। शेफलर के अनुसार समानता का महत्व केवल वितरण (distribution) में नहीं, बल्कि सामाजिक संबंधों (social relations) में निहित है।
वे तर्क देते हैं कि अत्यधिक असमानताएँ समाज में प्रभुत्व (domination), अपमान (stigma) और राजनीतिक असमानता को जन्म देती हैं, जिससे नागरिकों के बीच आपसी सम्मान और लोकतांत्रिक समानता कमजोर होती है। इसलिए, भले ही सभी के पास “पर्याप्त” हो, फिर भी कुछ असमानताएँ नैतिक रूप से आपत्तिजनक हो सकती हैं।
इस प्रकार शेफलर समानता को एक संबंधात्मक मूल्य (relational value) के रूप में पुनर्परिभाषित करते हैं।
तुलनात्मक विश्लेषण : समानता, प्राथमिकता और पर्याप्तता
इन तीनों दृष्टिकोणों की तुलना करने पर स्पष्ट होता है कि वे न्याय को अलग-अलग नैतिक प्राथमिकताओं के आधार पर समझते हैं। समानता तुलनात्मक निष्पक्षता पर ज़ोर देती है, प्राथमिकता सबसे कमजोर की स्थिति सुधारने पर, और पर्याप्तता न्यूनतम जीवन स्तर सुनिश्चित करने पर।
प्राथमिकता सिद्धांत समानता की कुछ अतियों से बचता है, लेकिन यह बड़ी असमानताओं को वैध ठहरा सकता है। पर्याप्तता सिद्धांत गरीबी पर ध्यान केंद्रित करता है, लेकिन यह उन असमानताओं की अनदेखी कर सकता है जो लोकतांत्रिक समानता को प्रभावित करती हैं। शेफलर का दृष्टिकोण इन सभी को सामाजिक संबंधों के संदर्भ में समझने का प्रयास करता है।
आलोचना और प्रत्यालोचना
समानता की आलोचना levelling down की समस्या के कारण की जाती है। प्राथमिकता सिद्धांत पर यह आरोप लगाया जाता है कि वह सापेक्ष असमानता (relative inequality) को पर्याप्त महत्व नहीं देता। पर्याप्तता सिद्धांत की आलोचना यह कहकर की जाती है कि “पर्याप्त” की सीमा मनमानी (arbitrary) हो सकती है।
इन आलोचनाओं के उत्तर में कई विद्वान यह तर्क देते हैं कि न्याय को किसी एक सिद्धांत में सीमित नहीं किया जा सकता। वास्तविक समाजों में समानता, प्राथमिकता और पर्याप्तता — तीनों को संतुलित रूप में समझना आवश्यक है।
समकालीन प्रासंगिकता (Contemporary Relevance)
आज की राजनीति में कर नीति (taxation), कल्याणकारी राज्य (welfare state) और वैश्विक असमानता (global inequality) से जुड़े विवाद इसी बहस से प्रभावित हैं। यह प्रश्न कि नीति का लक्ष्य समानता होना चाहिए या गरीबी उन्मूलन, सीधे इस वैचारिक संघर्ष से जुड़ा है।
निष्कर्ष (Conclusion)
समानता, प्राथमिकता और पर्याप्तता के बीच की बहस यह दिखाती है कि न्याय एक जटिल और बहु-आयामी अवधारणा है। जहाँ समानता नैतिक समान मूल्य पर ज़ोर देती है, वहीं प्राथमिकता और पर्याप्तता उसके विकल्प प्रस्तुत करती हैं। Parfit, Frankfurt और Scheffler के विचार समकालीन राजनीतिक सिद्धांत को अधिक गहराई और संतुलन प्रदान करते हैं।