AFSPA और मानवाधिकार बहस
सशस्त्र बल (विशेष शक्तियाँ) अधिनियम – AFSPA भारत के सबसे विवादास्पद सुरक्षा क़ानूनों में से एक रहा है, विशेष रूप से जम्मू और कश्मीर जैसे संघर्ष-प्रभावित क्षेत्रों में। इसे आंतरिक सुरक्षा चुनौतियों से निपटने के लिए एक आपातकालीन क़ानून के रूप में लागू किया गया था, लेकिन समय के साथ यह केवल एक सुरक्षा उपकरण नहीं, बल्कि राज्य शक्ति, लोकतंत्र और मानवाधिकारों के बीच टकराव का प्रतीक बन गया।
जम्मू और कश्मीर में AFSPA की बहस मूलतः इस प्रश्न के इर्द-गिर्द घूमती है कि राष्ट्रीय सुरक्षा और नागरिक स्वतंत्रताओं के बीच संतुलन कैसे स्थापित किया जाए।
AFSPA: कानूनी और राजनीतिक पृष्ठभूमि
AFSPA उन क्षेत्रों में लागू किया जाता है जिन्हें “अशांत क्षेत्र” घोषित किया जाता है। इसका उद्देश्य सशस्त्र बलों को उग्रवाद और आतंकवाद से निपटने के लिए विशेष अधिकार देना था।
जम्मू और कश्मीर में, AFSPA को एक अस्थायी सुरक्षा व्यवस्था के रूप में लागू किया गया, किंतु इसके लंबे समय तक जारी रहने से यह एक सामान्य शासन-तंत्र (routine governance) का हिस्सा बन गया। यही निरंतरता मानवाधिकार बहस का केंद्रीय बिंदु रही है।
AFSPA के अंतर्गत विशेष शक्तियाँ
AFSPA सशस्त्र बलों को असाधारण अधिकार प्रदान करता है, जैसे—
- संदेह के आधार पर बल प्रयोग, यहाँ तक कि घातक बल का उपयोग
- बिना वारंट गिरफ़्तारी
- बिना न्यायिक अनुमति तलाशी और जब्ती
- केंद्र सरकार की अनुमति के बिना अभियोजन से संरक्षण
इन प्रावधानों का उद्देश्य संचालन की सुविधा है, लेकिन वे उत्तरदायित्व, अनुपातिकता और विधि-शासन से जुड़े गंभीर प्रश्न भी खड़े करते हैं।
सुरक्षा का तर्क: AFSPA के समर्थक
AFSPA के समर्थकों का तर्क है कि—
- उग्रवाद और आतंकवाद असाधारण खतरे हैं
- सामान्य पुलिस व्यवस्था इनसे निपटने में सक्षम नहीं
- सशस्त्र बलों को कानूनी संरक्षण आवश्यक है
इस दृष्टिकोण से AFSPA को राष्ट्रीय सुरक्षा का आवश्यक उपकरण माना जाता है, जो आतंकवाद पर नियंत्रण और क्षेत्रीय अखंडता बनाए रखने में सहायक है।
समर्थकों का यह भी मानना है कि AFSPA को हटाने से सुरक्षा स्थिति बिगड़ सकती है।
मानवाधिकार दृष्टिकोण: आलोचनाएँ
मानवाधिकार संगठनों और नागरिक समाज ने AFSPA की कड़ी आलोचना की है। उनके अनुसार, यह क़ानून—
- न्यायेतर हत्याओं
- जबरन गुमशुदगियों
- मनमानी गिरफ़्तारियों
- यातना और दुर्व्यवहार
को बढ़ावा देता है।
सबसे विवादास्पद पहलू है व्यावहारिक प्रतिरक्षा (de facto immunity), जिसके कारण सुरक्षा बलों पर अभियोजन बहुत दुर्लभ हो जाता है। इससे दंडहीनता की धारणा मज़बूत होती है और न्याय व्यवस्था पर जनता का विश्वास कम होता है।
AFSPA और विधि-शासन (Rule of Law)
लोकतांत्रिक दृष्टि से एक बड़ा प्रश्न यह है कि क्या AFSPA विधि-शासन के सिद्धांत के अनुरूप है। आलोचकों का कहना है कि—
- असाधारण शक्तियाँ संवैधानिक अधिकारों को कमजोर करती हैं
- सैन्य अधिकार नागरिक संस्थाओं पर हावी हो जाते हैं
- आपातकालीन शासन सामान्य शासन में बदल जाता है
इससे “क़ानून” और “अपवाद” के बीच की सीमा धुंधली हो जाती है।
न्यायपालिका की भूमिका और संवैधानिक बहस
भारतीय न्यायपालिका ने AFSPA की संवैधानिक वैधता को स्वीकार किया है, लेकिन साथ ही सुरक्षा उपायों और अनुपातिक बल-प्रयोग पर ज़ोर दिया है।
Supreme Court of India ने स्पष्ट किया है कि—
- AFSPA असीमित शक्तियाँ नहीं देता
- बल-प्रयोग न्यूनतम और न्यायोचित होना चाहिए
- मानवाधिकार संरक्षण लागू रहता है
फिर भी आलोचकों का मानना है कि ज़मीनी स्तर पर न्यायिक दिशा-निर्देशों का प्रभाव सीमित रहा है।
समाज पर प्रभाव और राजनीतिक अलगाव
AFSPA का प्रभाव केवल क़ानूनी नहीं, बल्कि सामाजिक और मनोवैज्ञानिक भी रहा है। निरंतर सैन्य उपस्थिति और आपातकालीन क़ानूनों ने—
- निगरानी और भय को सामान्य बना दिया
- नागरिक जीवन और राजनीतिक अभिव्यक्ति को सीमित किया
- “शासन” के बजाय “नियंत्रण” की भावना को मज़बूत किया
कई नागरिकों के लिए AFSPA राज्य और जनता के बीच अविश्वास का प्रतीक बन गया।
सुरक्षा बनाम अधिकार: एक मिथ्या द्वंद्व?
मानवाधिकार विमर्श का एक केंद्रीय तर्क यह है कि सुरक्षा और अधिकार परस्पर विरोधी नहीं हैं। अत्यधिक बल-आधारित नीति—
- अल्पकालिक नियंत्रण तो दे सकती है
- लेकिन दीर्घकालिक शांति को कमजोर करती है
- लोकतांत्रिक वैधता को क्षति पहुँचाती है
इस दृष्टि से AFSPA को संघर्ष के मूल कारणों—जैसे राजनीतिक बहिष्करण और अविश्वास—को अनदेखा करने वाला क़ानून माना जाता है।
तुलनात्मक दृष्टिकोण
अन्य लोकतांत्रिक देशों के अनुभव बताते हैं कि लंबे समय तक आपातकालीन क़ानूनों का प्रयोग—
- संस्थागत क्षरण
- नागरिक–सैन्य असंतुलन
- और संघर्ष की पुनरावृत्ति
को जन्म देता है।
जम्मू और कश्मीर इसका एक महत्वपूर्ण उदाहरण है।
सुधार, वापसी और निरसन की बहस
AFSPA को लेकर मांगें विभिन्न स्तरों पर हैं—
- पूर्ण निरसन
- शांत क्षेत्रों से चरणबद्ध वापसी
- कड़े जवाबदेही तंत्र
- समयबद्ध और नागरिक निगरानी के साथ प्रयोग
ये बहसें इस व्यापक प्रश्न को दर्शाती हैं कि लोकतंत्र आंतरिक संघर्षों का प्रबंधन कैसे करे।
निष्कर्ष
AFSPA और उससे जुड़ी मानवाधिकार बहस आधुनिक लोकतंत्र की एक मूलभूत दुविधा को उजागर करती है—सुरक्षा की आवश्यकता और संवैधानिक नैतिकता के बीच संतुलन।
जम्मू और कश्मीर में AFSPA ने आतंकवाद को नियंत्रित करने में भूमिका निभाई, लेकिन साथ ही उसने राजनीतिक अलगाव, अविश्वास और मानवाधिकार चिंताओं को भी गहराया।
अनुभव यह बताता है कि असाधारण क़ानूनों के माध्यम से प्राप्त सुरक्षा टिकाऊ नहीं होती, यदि वह लोकतांत्रिक वैधता से रहित हो। स्थायी शांति के लिए आवश्यक है—
- राजनीतिक संवाद
- जवाबदेही
- नागरिक स्वतंत्रताओं की बहाली
अंततः AFSPA पर बहस केवल एक क़ानून की नहीं, बल्कि इस प्रश्न की है कि संघीय लोकतंत्र संघर्षग्रस्त क्षेत्रों में स्वयं को कैसे परिभाषित करता है।
संदर्भ (References)
- Armed Forces (Special Powers) Act
- Constitution of India
- Supreme Court of India के निर्णय
- Human Rights Watch और Amnesty International की रिपोर्टें
- Bose, Sumantra. Kashmir: Roots of Conflict, Paths to Peace