राज्य और शासन के प्रकार – फासीवाद, सत्तावाद और लोकलुभावनवाद
(States and Regime Types – Fascism, Authoritarianism, Populism)
आधुनिक राज्य में सत्ता, अधिकार और वैधता किस प्रकार संगठित होती है—इसे समझने के लिए शासन के प्रकार (regime types) का अध्ययन अत्यंत आवश्यक है। यद्यपि उदार लोकतंत्र स्वयं को राजनीतिक विकास की आदर्श परिणति के रूप में प्रस्तुत करता है, लेकिन बीसवीं और इक्कीसवीं शताब्दी का अनुभव यह दिखाता है कि अलोकतांत्रिक और मिश्रित शासन-रूप लगातार मौजूद रहे हैं और कई बार पुनः उभरे भी हैं।
फासीवाद, सत्तावाद और लोकलुभावनवाद ऐसे ही शासन-रूप हैं, जो ऐतिहासिक संकटों, सामाजिक अस्थिरता और संरचनात्मक अंतर्विरोधों से जन्म लेते हैं। ये शासन-प्रकार अलग–अलग होते हुए भी सत्ता के केंद्रीकरण, असहमति के दमन और लोकतंत्र की पुनर्व्याख्या जैसे साझा तत्व रखते हैं।
यह इकाई इन तीनों शासन-रूपों का तुलनात्मक अध्ययन करती है और यह विश्लेषण करती है कि आधुनिक राज्य किस प्रकार सत्ता को केंद्रित करता है, सहमति का निर्माण करता है और लोकतांत्रिक संस्थाओं को सीमित या पुनर्गठित करता है।
शासन-प्रकार और आधुनिक राज्य
शासन (Regime) से आशय उन नियमों, मानदंडों और संस्थाओं से है, जो यह निर्धारित करते हैं कि राजनीतिक सत्ता कैसे प्राप्त की जाती है, कैसे प्रयोग की जाती है और उस पर नियंत्रण कैसे रखा जाता है। शासन-प्रकार राज्य और समाज के संबंध को आकार देते हैं—कौन शासन करता है, निर्णय कैसे लिए जाते हैं और किन हितों को प्राथमिकता मिलती है।
फासीवाद, सत्तावाद और लोकलुभावनवाद उदार लोकतंत्र से इस अर्थ में भिन्न हैं कि वे बहुलवाद, अधिकारों और जवाबदेही को सीमित करते हैं। फिर भी ये आधुनिकता के बाहर की विकृतियाँ नहीं हैं, बल्कि आधुनिक राज्य-संरचनाओं, जन-राजनीति, राष्ट्रवाद और पूँजीवादी संकटों की उपज हैं।
फासीवाद: समग्र सत्ता और संगठित राज्य
फासीवाद का उदय बीसवीं सदी के प्रारंभिक यूरोप में आर्थिक संकट, सामाजिक उथल-पुथल और उदार लोकतंत्र की विफलताओं की प्रतिक्रिया के रूप में हुआ। यह सत्तावादी शासन का एक चरम रूप है, जिसकी विशेषता है—पूर्ण राजनीतिक लामबंदी, आक्रामक राष्ट्रवाद और राज्य–समाज का विलय।
Hannah Arendt ने फासीवाद और नाज़ीवाद को संपूर्णतावाद (totalitarianism) के रूप में विश्लेषित किया, जहाँ राज्य केवल राजनीतिक संस्थाओं पर ही नहीं, बल्कि सामाजिक जीवन, संस्कृति और व्यक्ति की चेतना तक पर नियंत्रण स्थापित करना चाहता है। फासीवादी शासन बहुलवाद को अस्वीकार करता है, विरोध को कुचलता है और हिंसा को राष्ट्रीय पुनर्जागरण के साधन के रूप में महिमामंडित करता है।
फासीवादी राज्य सत्ता को एक करिश्माई नेता के इर्द-गिर्द केंद्रीकृत करता है, प्रचार और जन-संगठनों का व्यापक उपयोग करता है और व्यवस्थित दमन को शासन का आधार बनाता है। यहाँ क़ानून सत्ता को सीमित करने के बजाय विचारधारा का उपकरण बन जाता है।
फासीवाद और राजनीतिक अर्थव्यवस्था
फासीवादी शासन पूँजीवाद को समाप्त नहीं करते, बल्कि उसे राज्य-नियंत्रण के अधीन पुनर्गठित करते हैं। निजी संपत्ति बनी रहती है, लेकिन श्रम को कठोरता से नियंत्रित किया जाता है, ट्रेड यूनियनों को तोड़ा जाता है और वर्ग-संघर्ष को राष्ट्रीय एकता के नाम पर दबा दिया जाता है।
इससे स्पष्ट होता है कि फासीवाद आधुनिक राज्य का उपयोग पूँजीवादी संकट को दमन, सैन्यीकरण और राष्ट्रवादी लामबंदी के माध्यम से संभालने के लिए करता है, न कि लोकतांत्रिक पुनर्वितरण के ज़रिये।
सत्तावाद: सीमित बहुलवाद और नियंत्रित राजनीति
सत्तावादी शासन फासीवाद की तुलना में कम तीव्र और कम व्यापक होता है। यह पूर्ण नियंत्रण के बजाय सीमित बहुलवाद की अनुमति देता है, लेकिन वास्तविक राजनीतिक प्रतिस्पर्धा और सहभागिता को कड़े रूप में नियंत्रित करता है।
Juan Linz के अनुसार, सत्तावाद की चार प्रमुख विशेषताएँ हैं—सीमित राजनीतिक बहुलवाद, मार्गदर्शक विचारधारा का अभाव, सीमित राजनीतिक लामबंदी और नेतृत्व द्वारा सत्ता का अपेक्षाकृत पूर्वानुमेय लेकिन अस्पष्ट सीमाओं के भीतर प्रयोग।
सत्तावादी राज्य जन-आंदोलन की बजाय नौकरशाही नियंत्रण, सुरक्षा तंत्र और क़ानूनी प्रतिबंधों पर निर्भर करते हैं। चुनाव हो सकते हैं, लेकिन वे कड़े नियंत्रण में होते हैं। विपक्ष को तभी तक सहन किया जाता है, जब तक वह शासन की स्थिरता को चुनौती न दे।
सत्तावाद और विकास
कई उत्तर–औपनिवेशिक समाजों में सत्तावादी शासन ने सत्ता के केंद्रीकरण को विकास, स्थिरता और राष्ट्रीय एकता के नाम पर正 ठहराया। राज्य आर्थिक योजना में केंद्रीय भूमिका निभाता है, लेकिन नागरिक स्वतंत्रताओं को सीमित कर देता है।
यह मॉडल राज्य-क्षमता और लोकतांत्रिक जवाबदेही के बीच तनाव को उजागर करता है। सत्तावादी शासन अल्पकालिक स्थिरता दे सकते हैं, किंतु दीर्घकाल में वे वैधता-संकट और सामाजिक प्रतिरोध को जन्म देते हैं।
लोकलुभावनवाद: लोकतंत्र बनाम उदारवाद?
लोकलुभावनवाद को एक पूर्ण शासन-प्रणाली के बजाय एक राजनीतिक तर्क या शैली के रूप में समझा जाता है, जो लोकतांत्रिक और सत्तावादी—दोनों व्यवस्थाओं में काम कर सकता है। लोकलुभावन नेता स्वयं को “जनता” का सच्चा प्रतिनिधि बताते हैं और भ्रष्ट “अभिजात वर्ग” के विरुद्ध खड़ा करते हैं।
Cas Mudde लोकलुभावनवाद को एक “पतली विचारधारा (thin-centered ideology)” बताते हैं, जो समाज को दो विरोधी समूहों—शुद्ध जनता और भ्रष्ट अभिजात—में बाँट देती है। लोकलुभावनवाद चुनावों के साथ सह-अस्तित्व रख सकता है, लेकिन यह अल्पसंख्यक अधिकारों, न्यायपालिका की स्वतंत्रता और मीडिया की स्वायत्तता जैसे उदार लोकतांत्रिक मानदंडों को कमज़ोर करता है।
लोकलुभावनवाद और राज्य
लोकलुभावन शासन कार्यपालिका में सत्ता को केंद्रीकृत करता है, संस्थागत नियंत्रणों को कमज़ोर करता है और अधिकार को व्यक्तिकेंद्रित बनाता है। लोकतांत्रिक वैधता का दावा करते हुए भी लोकलुभावनवाद लोकतंत्र को बहुमत के निरंकुश शासन के रूप में पुनर्परिभाषित करता है।
लोकलुभावन राज्य प्रतीकात्मक राजनीति, प्रत्यक्ष संचार और राष्ट्रवादी विमर्श पर निर्भर करते हैं। असहमति को राष्ट्र-विरोधी या अभिजातवादी बताकर अवैध ठहराया जाता है, जिससे विरोध की जगह सिमट जाती है।
फासीवाद, सत्तावाद और लोकलुभावनवाद: तुलनात्मक विश्लेषण
इन तीनों शासन-प्रकारों में कुछ समानताएँ दिखाई देती हैं—
- कार्यपालिका में सत्ता का केंद्रीकरण
- संस्थागत नियंत्रणों का क्षरण
- बहुलवाद और असहमति के प्रति संदेह
- राष्ट्रवाद और सुरक्षा विमर्श का प्रयोग
फिर भी इनके बीच महत्वपूर्ण अंतर हैं। फासीवाद पूर्ण प्रभुत्व चाहता है; सत्तावाद व्यावहारिक नियंत्रण पर ज़ोर देता है; और लोकलुभावनवाद लोकतंत्र को भीतर से पुनर्गठित करता है।
इन अंतरों को समझना समकालीन राजनीति के विश्लेषण के लिए आवश्यक है।
समकालीन प्रासंगिकता और लोकतांत्रिक पतन
दुनिया भर में लोकलुभावन और सत्तावादी प्रवृत्तियों के पुनरुत्थान ने शासन-विश्लेषण को फिर से प्रासंगिक बना दिया है। लोकतांत्रिक पतन अक्सर अचानक नहीं, बल्कि धीरे-धीरे संस्थाओं, अधिकारों और मानदंडों के क्षरण के माध्यम से होता है।
आधुनिक राज्य के पास विशाल प्रशासनिक, निगरानी और क़ानूनी क्षमताएँ हैं, जिन्हें औपचारिक लोकतंत्र के भीतर रहते हुए भी सत्तावादी उद्देश्यों के लिए प्रयोग किया जा सकता है।
निष्कर्ष: शासन-प्रकार और राज्य का भविष्य
फासीवाद, सत्तावाद और लोकलुभावनवाद यह स्पष्ट करते हैं कि आधुनिक राज्य स्वभावतः लोकतांत्रिक नहीं होता। ऐतिहासिक संकटों, सामाजिक शक्तियों और राजनीतिक नेतृत्व के आधार पर राज्य-सत्ता विभिन्न रूपों में संगठित हो सकती है।
इन शासन-प्रकारों का अध्ययन यह समझने में मदद करता है कि लोकतंत्र को कैसे खोखला किया जा सकता है, निलंबित किया जा सकता है या भीतर से रूपांतरित किया जा सकता है—बिना राज्य को समाप्त किए।
इस इकाई के साथ यह पेपर अपने केंद्रीय तर्क को पूर्ण करता है: आधुनिक राज्य एक विवादित, अस्थिर और परिवर्तनशील राजनीतिक संरचना है, जिसे पूँजीवाद, सुरक्षा, शासन-तकनीकों और शासन-प्रकारों के अंतर्संबंधों के माध्यम से समझा जाना चाहिए।
संदर्भ (References)
- Arendt, Hannah. The Origins of Totalitarianism
- Linz, Juan. Totalitarian and Authoritarian Regimes
- Mudde, Cas. Populist Radical Right Parties in Europe
- Poulantzas, Nicos. State, Power, Socialism
- Levitsky, Steven & Ziblatt, Daniel. How Democracies Die