राज्य निर्माण – यूरोपीय, औपनिवेशिक और उत्तर–औपनिवेशिक राज्य
(State Formation – European, Colonial and Post-Colonial State)
राज्य निर्माण (State Formation) कोई एकरूप या रैखिक प्रक्रिया नहीं है। आधुनिक राज्य अलग–अलग ऐतिहासिक परिस्थितियों, युद्ध, पूँजी, दमन, औपनिवेशिक प्रभुत्व और उत्तर–औपनिवेशिक रूपांतरणों के माध्यम से विकसित हुए हैं। तुलनात्मक राजनीतिक सिद्धांत इस बात पर ज़ोर देता है कि यूरोप में राज्य निर्माण के अनुभव को किसी सार्वभौमिक मॉडल के रूप में नहीं देखा जा सकता। औपनिवेशिक और उत्तर–औपनिवेशिक राज्यों का विकास बिल्कुल भिन्न परिस्थितियों में हुआ, जिसके कारण उनकी सत्ता, वैधता और शासन की प्रकृति भी अलग रही।
यह इकाई राज्य निर्माण के तीन प्रमुख मार्गों—यूरोपीय, औपनिवेशिक और उत्तर–औपनिवेशिक—का विश्लेषण करती है और यह दिखाती है कि किस प्रकार प्रत्येक मार्ग विशिष्ट सत्ता-संबंधों, आर्थिक संरचनाओं और सामाजिक परिस्थितियों से आकार ग्रहण करता है।
ऐतिहासिक प्रक्रिया के रूप में राज्य निर्माण
राज्य निर्माण उस दीर्घकालिक प्रक्रिया को संदर्भित करता है, जिसके माध्यम से केंद्रीकृत राजनीतिक सत्ता स्थापित होती है, क्षेत्रीय नियंत्रण सुदृढ़ होता है और शासन की संस्थाएँ स्थिर होती हैं। आलोचनात्मक राजनीतिक सिद्धांत राज्य को एक पूर्ण संरचना मानने के बजाय उसे निरंतर बनने वाली प्रक्रिया के रूप में देखता है—जो संघर्ष, समझौते और दमन से निर्मित होती है।
राज्य निर्माण पर प्रारंभिक अध्ययन मुख्यतः यूरोप पर केंद्रित थे और उन्होंने युद्ध, कर-व्यवस्था और नौकरशाही जैसे आंतरिक कारकों पर ज़ोर दिया। बाद के विद्वानों ने इस यूरो-केंद्रित दृष्टि को चुनौती दी और दिखाया कि औपनिवेशिक शासन और वैश्विक पूँजीवाद ने गैर-यूरोपीय राज्यों को गहराई से प्रभावित किया।
यूरोपीय राज्य निर्माण: युद्ध, पूँजी और नौकरशाही
यूरोपीय राज्य निर्माण की शास्त्रीय व्याख्या में युद्ध की केंद्रीय भूमिका मानी जाती है। Charles Tilly का प्रसिद्ध कथन है कि “युद्ध ने राज्य को बनाया और राज्य ने युद्ध को।” लगातार युद्धों ने शासकों को संसाधन जुटाने, स्थायी सेनाएँ खड़ी करने और प्रशासनिक क्षमताएँ विकसित करने के लिए बाध्य किया।
कर-प्रणालियाँ, क़ानूनी संस्थाएँ और नौकरशाही युद्ध-व्यवस्था को बनाए रखने के लिए विकसित हुईं, जो बाद में नागरिक शासन तक फैल गईं। इस प्रकार यूरोपीय राज्य दमन और सहमति—दोनों के संयोजन से विकसित हुआ और धीरे-धीरे वैधता अर्जित करता गया।
महत्वपूर्ण यह है कि यूरोपीय राज्य निर्माण आंतरिक प्रक्रियाओं के माध्यम से हुआ और पूँजीवाद के उदय के साथ-साथ आगे बढ़ा। राज्य-सत्ता और पूँजीवादी बाज़ारों का सुदृढ़ीकरण एक-दूसरे को मज़बूत करता गया।
यूरोपीय राज्य में वैधता और नागरिकता
यूरोपीय राज्यों में समय के साथ प्रजा को नागरिकों में बदलने की प्रक्रिया शुरू हुई। क़ानूनों के संहिताकरण, प्रतिनिधित्व और कल्याणकारी नीतियों के माध्यम से राजनीतिक अधिकारों का विस्तार हुआ—हालाँकि यह विस्तार वर्ग, जेंडर और नस्लीय बहिष्करणों के साथ असमान रूप से हुआ।
इसके बावजूद यूरोपीय मॉडल को संप्रभुता, विधि-शासन और नागरिकता से जोड़कर देखा गया। यही मॉडल बाद में औपनिवेशिक समाजों पर थोप दिया गया—जबकि उनके ऐतिहासिक अनुभव बिल्कुल अलग थे।
औपनिवेशिक राज्य: दमन और भिन्नता के माध्यम से शासन
औपनिवेशिक राज्य निर्माण की तर्क-प्रणाली यूरोपीय मॉडल से मूलतः भिन्न थी। औपनिवेशिक राज्य का उद्देश्य जनता को एकीकृत करना या नागरिकता पैदा करना नहीं, बल्कि संसाधनों का दोहन और नियंत्रण बनाए रखना था। शासन का आधार दमन, निगरानी और क़ानूनी अपवादवाद (legal exceptionalism) था।
औपनिवेशिक प्रशासन ने केंद्रीकृत सत्ता को अप्रत्यक्ष शासन के साथ जोड़ा—स्थानीय अभिजात वर्ग के माध्यम से शासन करते हुए अंतिम नियंत्रण अपने हाथ में रखा। क़ानून न्याय का सार्वभौमिक माध्यम नहीं, बल्कि प्रभुत्व का औज़ार बना और शासकों तथा शासितों के बीच नस्ली भेद को वैध ठहराया।
इस प्रकार औपनिवेशिक राज्य एक बाह्य रूप से आरोपित सत्ता था, जिसे स्थानीय समाजों में वैधता प्राप्त नहीं थी।
दोहन की संरचना के रूप में औपनिवेशिक राज्य
यूरोपीय राज्यों के विपरीत, औपनिवेशिक राज्य किसी सामाजिक अनुबंध या आंतरिक वर्ग-सुलह से उत्पन्न नहीं हुए। वे महानगरीय (metropolitan) हितों की सेवा के लिए बनाए गए थे और संसाधनों, श्रम और राजस्व के प्रवाह को सुनिश्चित करते थे।
औपनिवेशिक नौकरशाहियाँ सत्तावादी, सैन्यीकृत और जन-जवाबदेही से कटी हुई थीं। स्वतंत्रता के बाद भी ये संस्थागत विरासतें उत्तर–औपनिवेशिक शासन को गहराई से प्रभावित करती रहीं।
उत्तर–औपनिवेशिक राज्य निर्माण: विरासत और विरोधाभास
उत्तर–औपनिवेशिक राज्य औपनिवेशिक शासन के पतन से उभरे, लेकिन उन्होंने औपनिवेशिक प्रशासनिक ढाँचों को विरासत में पाया। स्वतंत्रता का अर्थ अतीत से पूर्ण विच्छेद नहीं था; बल्कि औपनिवेशिक संस्थाएँ और राष्ट्रवादी आकांक्षाएँ साथ-साथ मौजूद रहीं।
Hamza Alavi के अनुसार, उत्तर–औपनिवेशिक राज्य घरेलू वर्गों से सापेक्षतः स्वायत्त लेकिन वैश्विक पूँजीवाद में गहराई से निहित होते हैं। राज्य विकास-योजना, संचय और राजनीतिक नियंत्रण का केंद्रीय स्थल बन जाता है।
इससे लोकतांत्रिक वादों और सत्तावादी प्रथाओं के बीच तनाव उत्पन्न होता है।
राष्ट्रवाद, विकास और उत्तर–औपनिवेशिक राज्य
राष्ट्रवादी आंदोलनों ने उत्तर–औपनिवेशिक राज्यों को वैधता प्रदान की। स्वतंत्रता को लोकप्रिय संप्रभुता और आत्म-शासन के रूप में प्रस्तुत किया गया। किंतु विविध जातीय, भाषाई और धार्मिक संरचनाओं वाले समाजों में राष्ट्र-निर्माण एक जटिल कार्य सिद्ध हुआ।
विकास के लक्ष्यों ने भी राज्य निर्माण को प्रभावित किया। राज्य ने आर्थिक योजना, औद्योगिकीकरण और कल्याण में केंद्रीय भूमिका निभाई। लेकिन सीमित संसाधन, वैश्विक निर्भरता और आंतरिक असमानताएँ इन प्रयासों की सीमाएँ बन गईं।
परिणामस्वरूप उत्तर–औपनिवेशिक राज्य अक्सर विकासात्मक हस्तक्षेप और दमनकारी शासन के बीच झूलते रहे।
राज्य, समाज और अनौपचारिकता
उत्तर–औपनिवेशिक राज्य निर्माण की एक प्रमुख विशेषता औपचारिक और अनौपचारिक सत्ता के बीच धुँधली सीमाएँ हैं। क़ानूनी संस्थाओं के साथ-साथ संरक्षण नेटवर्क, स्थानीय शक्ति-केंद्र और समझौते आधारित शासन भी सक्रिय रहते हैं।
Partha Chatterjee के अनुसार, उत्तर–औपनिवेशिक शासन भेदित नागरिकता (differentiated citizenship) के माध्यम से संचालित होता है, जहाँ बड़ी आबादी को पूर्ण नागरिक के बजाय प्रबंधित की जाने वाली जनसंख्या के रूप में देखा जाता है।
यह दृष्टि उत्तर–औपनिवेशिक राज्यों को “कमज़ोर” यूरोपीय राज्यों के रूप में देखने की धारणा को चुनौती देती है।
तुलनात्मक अंतर्दृष्टियाँ: यूरो-केंद्रितता से आगे
यूरोपीय, औपनिवेशिक और उत्तर–औपनिवेशिक मार्गों की तुलना यह स्पष्ट करती है कि राज्य निर्माण का कोई एक सार्वभौमिक मॉडल नहीं है। यूरोपीय राज्य आंतरिक युद्ध और पूँजीवादी विकास से उभरे; औपनिवेशिक राज्य दोहन और नियंत्रण के उपकरण थे; और उत्तर–औपनिवेशिक राज्य संप्रभुता, निर्भरता और संस्थागत विरासत का मिश्रण हैं।
आलोचनात्मक सिद्धांत राज्य निर्माण को समझने में ऐतिहासिक विशिष्टता, सत्ता-संबंध और वैश्विक असमानता पर ज़ोर देता है।
निष्कर्ष: राज्य निर्माण पर पुनर्विचार
राज्य निर्माण हिंसा, अर्थव्यवस्था और सामाजिक संघर्ष से निर्मित एक असमान और विवादित प्रक्रिया है। यूरोपीय, औपनिवेशिक और उत्तर–औपनिवेशिक राज्य मात्रा में नहीं, बल्कि प्रकृति में भिन्न हैं।
इन मार्गों की समझ समकालीन शासन, वैधता और संकट के विश्लेषण के लिए आवश्यक है। यह हमें यूरोपीय आदर्श के आधार पर सभी राज्यों को परखने की प्रवृत्ति से सावधान करती है और आधुनिक राज्य की ऐतिहासिक एवं आलोचनात्मक समझ विकसित करने की ओर प्रेरित करती है।
संदर्भ (References)
- Tilly, Charles. Coercion, Capital and European States
- Alavi, Hamza. “The State in Post-Colonial Societies”
- Chatterjee, Partha. The Politics of the Governed
- Migdal, Joel. State in Society
- Skocpol, Theda. States and Social Revolutions