चुनावों की वैधता और प्रतिनिधित्व
लोकतांत्रिक व्यवस्था में राजनीतिक दल और चुनावी राजनीति प्रतिनिधि शासन की बुनियाद होते हैं। किंतु जम्मू और कश्मीर के संदर्भ में चुनाव और राजनीतिक प्रतिनिधित्व कभी भी केवल नियमित लोकतांत्रिक प्रक्रियाएँ नहीं रहे। यहाँ चुनावों की वैधता (legitimacy) और प्रतिनिधित्व का प्रश्न लगातार विवाद, संदेह और राजनीतिक टकराव से घिरा रहा है।
ऐतिहासिक हस्तक्षेप, लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं में व्यवधान, संघर्ष की परिस्थितियाँ और सत्ता–समाज के बीच अविश्वास ने चुनावों को लोक-सहमति के साधन की बजाय कई बार विवादित राजनीतिक घटनाओं में बदल दिया।
जम्मू और कश्मीर में राजनीतिक दलों का विकास
जम्मू और कश्मीर में राजनीतिक दलों का उदय रियासती शासन, जन–आंदोलनों और 1947 के बाद की संवैधानिक व्यवस्थाओं की पृष्ठभूमि में हुआ। अन्य भारतीय राज्यों के विपरीत, यहाँ दल–व्यवस्था का विकास—
- निरंकुश शासन की विरासत
- क्षेत्रीय और पहचान-आधारित राजनीति
- केंद्र–राज्य तनाव
- लोकतांत्रिक संस्थाओं के बार-बार निलंबन
के बीच हुआ।
इस कारण राजनीतिक दल समाज और राज्य के बीच सेतु बनने के बजाय कई बार सत्ता-संरचना का विस्तार प्रतीत हुए।
चुनाव और लोकतांत्रिक वैधता की अवधारणा
लोकतांत्रिक सिद्धांत में चुनाव दो प्रमुख कार्य करते हैं—
- राजनीतिक सत्ता को वैधता प्रदान करना
- जन-इच्छा का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना
जम्मू और कश्मीर में चुनावों का उद्देश्य था—
- जनता की सहमति को संस्थागत रूप देना
- राजतंत्र के बाद लोकतांत्रिक शासन को स्थापित करना
- राज्य को संवैधानिक ढाँचे में एकीकृत करना
परंतु चुनाव तभी वैध माने जा सकते हैं, जब उन्हें स्वतंत्र, निष्पक्ष और विश्वसनीय समझा जाए।
चुनावी वैधता का संकट
जम्मू और कश्मीर में चुनावों की वैधता को बार-बार चुनौती मिली है। इसके प्रमुख कारण रहे—
- चुनावों में धांधली और हेरफेर के आरोप
- प्रशासनिक और राजनीतिक हस्तक्षेप
- संघर्ष के समय कम मतदान प्रतिशत
- चुनाव बहिष्कार और विरोध
जब चुनावों को नियंत्रित या थोपा हुआ माना जाता है, तब वे लोकतांत्रिक सहमति पैदा करने के बजाय राजनीतिक अलगाव को गहरा करते हैं। यही कारण है कि यहाँ चुनाव अक्सर वैधता का स्रोत बनने में विफल रहे।
प्रतिनिधित्व और सहमति का प्रश्न
प्रतिनिधित्व का अर्थ केवल निर्वाचित सरकार का गठन नहीं, बल्कि यह विश्वास भी है कि चुने गए प्रतिनिधि वास्तव में जन-आकांक्षाओं को व्यक्त करते हैं। जम्मू और कश्मीर में यह प्रश्न लगातार उठता रहा है—
- क्या निर्वाचित प्रतिनिधि जनता की वास्तविक इच्छा का प्रतिनिधित्व करते हैं?
- क्या चुनाव विरोध और असहमति को समाहित कर पाते हैं?
- क्या मतदान मौजूदा राजनीतिक व्यवस्था की स्वीकृति को दर्शाता है?
अक्सर चुनावी भागीदारी को व्यावहारिक या रणनीतिक निर्णय के रूप में देखा गया, न कि राजनीतिक व्यवस्था के प्रति पूर्ण समर्थन के रूप में।
राजनीतिक दल और विखंडित प्रतिनिधित्व
यहाँ के राजनीतिक दल प्रायः—
- क्षेत्रीय विभाजनों (कश्मीर घाटी, जम्मू, लद्दाख)
- धार्मिक और सांस्कृतिक पहचानों
- भिन्न राजनीतिक आकांक्षाओं
का प्रतिनिधित्व करते रहे हैं।
यद्यपि यह विविधता लोकतंत्र की स्वाभाविक विशेषता है, परंतु इससे एकीकृत प्रतिनिधित्व का निर्माण कठिन हो गया। कई बार दलों ने वैचारिक राजनीति की बजाय सत्ता और संरक्षण को प्राथमिकता दी, जिससे उनकी विश्वसनीयता कमज़ोर हुई।
संघर्ष की स्थिति में चुनाव
संघर्षग्रस्त समाज में चुनाव कराना स्वाभाविक रूप से कठिन होता है। जम्मू और कश्मीर में—
- सैन्यीकरण
- सुरक्षा प्रतिबंध
- राजनीतिक गतिविधियों पर सीमाएँ
ने चुनावी वातावरण को प्रभावित किया।
ऐसी परिस्थितियों में चुनाव अक्सर प्रक्रियात्मक लोकतंत्र तक सीमित रह गए, जहाँ लोकतांत्रिक रूप तो मौजूद था, परंतु उसकी आत्मा कमज़ोर थी।
केंद्र की भूमिका और चुनावी राजनीति
केंद्र सरकार के हस्तक्षेप ने भी चुनावों की वैधता पर प्रभाव डाला। बार-बार—
- सरकारों का गिराया जाना
- गठबंधन निर्माण में हस्तक्षेप
- संस्थागत स्वायत्तता का क्षरण
ने यह धारणा मज़बूत की कि चुनाव स्वतंत्र जन-इच्छा की अभिव्यक्ति नहीं हैं। इससे प्रतिनिधि संस्थाओं में जनता का विश्वास कम हुआ।
परिसीमन और प्रतिनिधित्व की समानता
निर्वाचन क्षेत्रों के परिसीमन (Delimitation) का प्रश्न भी प्रतिनिधित्व से जुड़ा रहा है।
जनसंख्या और क्षेत्रीय संतुलन को लेकर विवादों ने यह संदेह पैदा किया कि क्या चुनावी ढाँचा न्यायसंगत प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करता है।
चुनाव बनाम वैकल्पिक राजनीतिक अभिव्यक्ति
जम्मू और कश्मीर में चुनावी राजनीति के साथ-साथ—
- जन–आंदोलन
- विरोध प्रदर्शन
- बहिष्कार और असहयोग
जैसे वैकल्पिक राजनीतिक माध्यम भी सक्रिय रहे हैं। इससे स्पष्ट होता है कि चुनाव यहाँ राजनीतिक वैधता का एकमात्र स्रोत नहीं रहे।
लोकतंत्र, प्रतिनिधित्व और संघीय विश्वास
चुनावों की वैधता तभी स्थापित होती है, जब—
- संस्थाएँ स्वायत्त हों
- चुनाव परिणामों का सम्मान हो
- असहमति के लिए स्थान हो
- लोकतांत्रिक प्रक्रियाएँ निरंतर चलें
संघीय विश्वास के क्षरण ने प्रतिनिधित्व की विश्वसनीयता को कमजोर किया और चुनावों को संदेह के घेरे में रखा।
निष्कर्ष
जम्मू और कश्मीर में चुनावों और राजनीतिक प्रतिनिधित्व की वैधता ऐतिहासिक रूप से नाज़ुक और विवादित रही है। चुनावी राजनीति ने लोकतंत्र की भाषा और संरचना तो प्रदान की, लेकिन वह हमेशा वास्तविक जन-सहमति उत्पन्न करने में सफल नहीं हो सकी।
यह अनुभव दर्शाता है कि लोकतंत्र को केवल चुनावों तक सीमित नहीं किया जा सकता। चुनाव तभी वैध और प्रभावी होते हैं, जब वे विश्वास, स्वायत्तता और प्रतिनिधित्व से जुड़े हों।
जम्मू और कश्मीर की राजनीति में मुख्य समस्या चुनावों की अनुपस्थिति नहीं, बल्कि विश्वसनीय प्रतिनिधित्व की कमी रही है—और यही कमी आज भी क्षेत्र की लोकतांत्रिक राजनीति को आकार देती है।
संदर्भ (References)
- Bose, Sumantra. Kashmir: Roots of Conflict, Paths to Peace
- Schofield, Victoria. Kashmir in Conflict
- Zutshi, Chitralekha. Languages of Belonging
- Weiner, Myron. The Indian Paradox
- Election Commission of India – जम्मू और कश्मीर पर रिपोर्ट्स