विधायिका (Legislature)
भूमिका
विधायिका किसी भी लोकतांत्रिक राजनीतिक व्यवस्था की केंद्रीय संस्था होती है। यह वह मंच है जहाँ जन-संप्रभुता को कानून और सार्वजनिक नीति का रूप दिया जाता है। संवैधानिक लोकतंत्र में विधायिका केवल कानून बनाने वाला निकाय नहीं है, बल्कि प्रतिनिधित्व, विमर्श, उत्तरदायित्व और राजनीतिक समाजीकरण की एक महत्वपूर्ण संस्था है। भारत में विधायिका संवैधानिक संरचना का एक प्रमुख स्तंभ है और प्रतिनिधि लोकतंत्र के प्रति देश की प्रतिबद्धता को दर्शाती है।

भारतीय विधायिका को केवल एक संवैधानिक संस्था के रूप में नहीं, बल्कि एक राजनीतिक संस्था के रूप में समझा जाना चाहिए, जो ऐतिहासिक परंपराओं, सामाजिक विविधता, दलीय प्रतिस्पर्धा और कार्यपालिका के बढ़ते प्रभुत्व से प्रभावित होती रही है। समय के साथ इसकी भूमिका में परिवर्तन हुआ है, जो शासन, संघवाद और लोकतांत्रिक अपेक्षाओं में व्यापक बदलावों को प्रतिबिंबित करता है।
विधायिका की अवधारणा
सैद्धांतिक स्तर पर विधायिका जन-संप्रभुता का संस्थागत रूप है। इसकी वैधता चुनावों से प्राप्त होती है और यह जनता की सामूहिक प्रतिनिधि के रूप में कार्य करती है। शास्त्रीय राजनीतिक सिद्धांतों में, विशेषकर संसदीय प्रणालियों में, विधायिका को राज्य का सर्वोच्च अंग माना गया है, क्योंकि कार्यपालिका उसी से उत्पन्न होती है और उसी के प्रति उत्तरदायी रहती है।
विधायिका के कार्य बहुआयामी होते हैं। कानून निर्माण इसका सबसे प्रत्यक्ष कार्य है, किंतु विमर्श और निगरानी की भूमिका उतनी ही महत्वपूर्ण है। बहसों और चर्चाओं के माध्यम से विधायिका वह मंच प्रदान करती है जहाँ विभिन्न हितों और दृष्टिकोणों को व्यक्त किया जाता है और उनके बीच समन्वय स्थापित किया जाता है। यही विमर्शात्मक स्वरूप लोकतांत्रिक शासन को अधिनायकवादी शासन से अलग करता है।
भारतीय संवैधानिक व्यवस्था में विधायिका
भारतीय संविधान संघ स्तर पर द्विसदनीय विधायिका की व्यवस्था करता है, जिसमें लोकसभा और राज्यसभा शामिल हैं, जबकि राज्यों में एकसदनीय या द्विसदनीय विधानमंडलों का प्रावधान किया गया है। यह संरचना लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व और संघीय सिद्धांतों के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास है।
लोकसभा प्रत्यक्ष रूप से जनता का प्रतिनिधित्व करती है और लोकतांत्रिक सिद्धांतों की अभिव्यक्ति है। इसके विपरीत, राज्यसभा राज्यों का प्रतिनिधित्व करती है और एक पुनर्विचारक सदन के रूप में कार्य करती है, जो निरंतरता और विशेषज्ञता प्रदान करता है। दोनों सदन मिलकर संसद का निर्माण करते हैं, जो संविधान द्वारा निर्धारित सीमाओं के भीतर विधायी शक्ति का प्रयोग करती है।
प्रतिनिधित्व और विधायिका
प्रतिनिधित्व विधायिका की नैतिक और लोकतांत्रिक आधारशिला है। भारत जैसे विविधतापूर्ण समाज में विधायिका से अपेक्षा की जाती है कि वह सामाजिक बहुलता, क्षेत्रीय विविधता और राजनीतिक प्रतिस्पर्धा को प्रतिबिंबित करे। सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार ने व्यापक राजनीतिक सहभागिता को संभव बनाया है, जिससे विधायिका समाज की जटिल संरचना का दर्पण बनती है।
प्रतिनिधित्व केवल संख्यात्मक या वर्णनात्मक नहीं होता, बल्कि सारगर्भित भी होना चाहिए। जनप्रतिनिधियों से अपेक्षा की जाती है कि वे जनहित के मुद्दों को उठाएँ, विभिन्न हितों के बीच मध्यस्थता करें और नीति निर्माण में सक्रिय भूमिका निभाएँ। प्रतिनिधित्व की गुणवत्ता काफी हद तक दलीय व्यवस्था, चुनावी प्रतिस्पर्धा और विधायिका के आंतरिक संस्थागत मानकों पर निर्भर करती है।
विधायी कार्य और प्रक्रियाएँ
विधायिका का कानून निर्माण कार्य केवल विधेयकों को पारित करने तक सीमित नहीं है। इसमें एजेंडा निर्धारण, विधेयकों की जाँच, संशोधन और व्यापक विमर्श शामिल हैं। संसदीय बहसें नीतियों के सार्वजनिक औचित्य को सामने लाती हैं, जिससे लोकतांत्रिक वैधता सुदृढ़ होती है।
वित्तीय नियंत्रण विधायिका का एक अत्यंत महत्वपूर्ण कार्य है। कराधान और व्यय की स्वीकृति देकर विधायिका कार्यपालिका पर नियंत्रण स्थापित करती है। यह सिद्धांत इस धारणा पर आधारित है कि सार्वजनिक धन पर नियंत्रण लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व का मूल तत्व है।
कार्यपालिका की निगरानी प्रश्नकाल, प्रस्तावों, बहसों और संसदीय समितियों के माध्यम से की जाती है। संसदीय समितियाँ विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि वे दलगत राजनीति से अपेक्षाकृत मुक्त होकर विधायी और प्रशासनिक कार्यों की गहन जाँच करती हैं।
विधायिका और कार्यपालिका का संबंध
संसदीय प्रणाली में विधायिका और कार्यपालिका के बीच संबंध सहयोग और तनाव दोनों से युक्त होता है। कार्यपालिका विधायिका से ही उत्पन्न होती है और उसके प्रति उत्तरदायी होती है, किंतु व्यवहार में कार्यपालिका का प्रभुत्व विधायिका की स्वायत्तता को सीमित कर देता है।
भारत में शक्ति के केंद्रीकरण, कठोर दलीय अनुशासन और अध्यादेशों के बढ़ते प्रयोग ने विधायिका की भूमिका को कमजोर करने की आशंका उत्पन्न की है। यद्यपि औपचारिक उत्तरदायित्व के तंत्र मौजूद हैं, पर उनकी प्रभावशीलता राजनीतिक इच्छाशक्ति और संस्थागत संस्कृति पर निर्भर करती है।
भारतीय विधायिका के समक्ष चुनौतियाँ
विधायिका के कार्यकरण में कई संरचनात्मक और राजनीतिक चुनौतियाँ विद्यमान हैं। बार-बार होने वाले व्यवधान, बहस की गिरती गुणवत्ता और बैठक दिनों में कमी ने विधायी प्रभावशीलता पर प्रश्नचिह्न लगाए हैं। शासन की बढ़ती जटिलता ने कार्यपालिका और नौकरशाही पर निर्भरता भी बढ़ा दी है।
एक अन्य महत्वपूर्ण चुनौती दक्षता और विमर्श के बीच संतुलन की है। विकास और त्वरित निर्णय के नाम पर यदि विधायी जाँच और बहस को दरकिनार किया जाता है, तो लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व कमजोर पड़ता है।
समकालीन शासन में विधायिका की भूमिका
समकालीन शासन में वैश्वीकरण, तकनीकी परिवर्तन और कार्यपालिका-केन्द्रित नीति निर्माण ने विधायिका की भूमिका को पुनर्परिभाषित किया है। विधायिकाओं से अब अपेक्षा की जाती है कि वे जटिल नीतिगत मुद्दों पर सूचित और दीर्घकालिक दृष्टिकोण अपनाएँ।
इन चुनौतियों के बावजूद, विधायिका लोकतांत्रिक वैधता का एक अनिवार्य स्रोत बनी हुई है। इसका विमर्शात्मक स्वरूप शासन में पारदर्शिता और सार्वजनिक उत्तरदायित्व सुनिश्चित करता है, जो लोकतंत्र की स्थिरता के लिए आवश्यक है।
निष्कर्ष
विधायिका केवल कानून बनाने वाली संस्था नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक शासन की आधारभूत संरचना है। भारत में यह प्रतिनिधित्व, उत्तरदायित्व और विमर्श जैसे संवैधानिक आदर्शों को मूर्त रूप देती है। यद्यपि कार्यपालिका का बढ़ता प्रभुत्व और संस्थागत सीमाएँ इसकी भूमिका को चुनौती देती हैं, फिर भी इसकी नैतिक और संवैधानिक महत्ता अपरिवर्तित बनी हुई है।
भारतीय लोकतंत्र का भविष्य काफी हद तक विधायिका की सुदृढ़ता पर निर्भर करता है। विधायी प्रक्रियाओं को सशक्त करना, विमर्श की गुणवत्ता बढ़ाना और संस्थागत गरिमा को पुनर्स्थापित करना लोकतांत्रिक शासन के लिए अनिवार्य है।
संदर्भ / Suggested Readings
- Granville Austin – The Indian Constitution: Cornerstone of a Nation
- एम. पी. जैन – Indian Constitutional Law
- डी. डी. बसु – Introduction to the Constitution of India
- नीरजा गोपाल जयाल – Democracy in India
- सुभाष सी. कश्यप – Parliamentary Democracy in India
- बी. आर. आंबेडकर – Constituent Assembly Debates
FAQs
1. लोकतंत्र में विधायिका को केंद्रीय संस्था क्यों माना जाता है?
क्योंकि यह जनता का प्रतिनिधित्व करती है, कानून बनाती है और कार्यपालिका को उत्तरदायी बनाती है।
2. भारत में द्विसदनीय व्यवस्था का क्या महत्व है?
यह लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व और संघीय संतुलन दोनों को सुनिश्चित करती है।
3. विधायिका कार्यपालिका को कैसे नियंत्रित करती है?
प्रश्नकाल, बहसों, संसदीय समितियों और वित्तीय नियंत्रण के माध्यम से।
4. आज भारतीय विधायिका के सामने प्रमुख चुनौतियाँ क्या हैं?
कार्यपालिका का प्रभुत्व, व्यवधान, विमर्श की गिरती गुणवत्ता और संस्थागत कमजोरियाँ।