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    औपचारिक समानता ऑर अवसर की समानता

    समानता सामाजिक, आर्थिक, नैतिक व राजनीतिक दर्शन संबंधी मूल संकल्पनाओं में, समानता की संकल्पना से आधिक भ्रामक और विस्मयकारी कोई और नहीं, क्योंकि यह न्याय, स्वतंत्रता, अधिकार, स्वामित्व, आदि सदृश अन्य सभी संकल्पनाओं में गण्य है। गत दो हजार वर्षों के दौरान, यूनानवासियों, प्राचीन यूनानी दर्शनशास्त्र के अध्येताओं, ईसाई पादरियों द्वारा समानता के अनेक आयामों का विस्तारपूर्वक प्रतिवादन किया गया, जिन्होंने भिन्न-भिन्न रूप से और सामूहिक रूप…

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    तुलनात्मक संघवाद (Comparative Federalism)

    परिचय संघवाद आधुनिक राज्यों में राजनीतिक सत्ता के वितरण, क्षेत्रीय विविधता के प्रबंधन और बहुलतावादी समाजों के समायोजन का एक महत्वपूर्ण संस्थागत ढाँचा है। तुलनात्मक संघवाद विभिन्न देशों में संघीय प्रणालियों का अध्ययन करता है, ताकि यह समझा जा सके कि केंद्र और राज्यों/क्षेत्रों के बीच शक्ति का विभाजन कैसे किया जाता है, ये व्यवस्थाएँ…

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    नागरिक समाज (Civil Society)

    भूमिका आधुनिक राजनीतिक सिद्धांत और लोकतांत्रिक व्यवहार में नागरिक समाज राज्य, बाजार और निजी जीवन (परिवार/समुदाय) के बीच स्थित एक केंद्रीय क्षेत्र के रूप में उभरता है। यह उन स्वैच्छिक संगठनों, सामाजिक आंदोलनों, गैर-सरकारी संगठनों, पेशेवर निकायों, धार्मिक/आस्था-आधारित समूहों और अनौपचारिक नेटवर्कों का समुच्चय है जो हितों का अभिव्यक्तिकरण करते हैं, नागरिकों को संगठित करते…

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    विमर्शी लोकतंत्र क्या है

     विचारणात्मक लोकतंत्र (विमर्शी लोकतंत्र ) विचारणात्मक लोकतंत्र या विचार-विमर्शमूलक लोकतंत्र के सिद्धांत को 1990 के दशक के आरंभिक वर्षों से विशेष लोकप्रियता मिली है। इसके प्रवर्तकों में जे. कोहेन एवं – जे. रॉजर्स (ऑन डेमोक्रेसी: टुवार्ड ए ट्रांस्फार्मेशन ऑफ़ – अमेरिकन सोसायटी)(1983) और एस.एल. हली (नेचुरल रीजन्सः पर्सनैलिटी एंड पॉलिटी) (1989) का विशेष – स्थान है।…

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    मानव अधिकारों के प्रति राज्य की प्रतिक्रिया:

    पुलिस, प्रशासन, सेना और अर्धसैनिक बलों की भूमिका (भारतीय संदर्भ) मानव अधिकारों के संदर्भ में राज्य की प्रतिक्रिया यह निर्धारित करती है कि अधिकार केवल संवैधानिक घोषणाएँ रहेंगे या नागरिकों के जीवन में वास्तविक रूप से लागू होंगे। आधुनिक राज्य में पुलिस, नागरिक प्रशासन, सेना और अर्धसैनिक बल क़ानून-व्यवस्था, सुरक्षा और शासन के प्रमुख उपकरण…

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    न्यायपालिका (Judiciary)

    भूमिका न्यायपालिका संवैधानिक लोकतंत्र का एक केंद्रीय स्तंभ है और विधि के शासन, अधिकारों की रक्षा तथा संविधान की सर्वोच्चता सुनिश्चित करने में निर्णायक भूमिका निभाती है। आधुनिक लोकतांत्रिक राज्यों में न्यायपालिका केवल विवाद निपटाने वाली संस्था नहीं होती, बल्कि संवैधानिक मूल्यों की संरक्षक और राजनीतिक सत्ता के प्रयोग पर नियंत्रण रखने वाला अंग भी…