मानव अधिकारों के प्रति राज्य की प्रतिक्रिया:
पुलिस, प्रशासन, सेना और अर्धसैनिक बलों की भूमिका
(भारतीय संदर्भ)
मानव अधिकारों के संदर्भ में राज्य की प्रतिक्रिया यह निर्धारित करती है कि अधिकार केवल संवैधानिक घोषणाएँ रहेंगे या नागरिकों के जीवन में वास्तविक रूप से लागू होंगे। आधुनिक राज्य में पुलिस, नागरिक प्रशासन, सेना और अर्धसैनिक बल क़ानून-व्यवस्था, सुरक्षा और शासन के प्रमुख उपकरण हैं। इन्हीं संस्थाओं के पास वैध बल-प्रयोग का अधिकार होता है, इसलिए वे मानव अधिकारों के संरक्षक भी हैं और कई बार उल्लंघनकर्ता भी।
भारतीय संदर्भ में राज्य शक्ति और मानव अधिकारों के बीच संबंध जटिल है। एक ओर Constitution of India जीवन, स्वतंत्रता और गरिमा की गारंटी देता है, वहीं दूसरी ओर सुरक्षा, अनुशासन और व्यवस्था के नाम पर अधिकारों पर अंकुश भी देखने को मिलता है। इस स्थिति में सुरक्षा बनाम स्वतंत्रता का तनाव लगातार बना रहता है।
राज्य और मानव अधिकार: वैचारिक परिप्रेक्ष्य
आधुनिक मानव अधिकार सिद्धांत में राज्य को मुख्य कर्तव्य-धारक (duty bearer) माना जाता है। राज्य के पास—
- वैध बल प्रयोग का एकाधिकार
- क़ानून बनाने और लागू करने की शक्ति
- नागरिकों को अधिकार उल्लंघन से बचाने की जिम्मेदारी
होती है। मानव अधिकार राज्य शक्ति को नकारते नहीं, बल्कि उसे संवैधानिक, विधिक और नैतिक सीमाओं में बाँधते हैं।
भारतीय संविधान इस संतुलन को मौलिक अधिकारों, न्यायिक समीक्षा और जवाबदेही तंत्र के माध्यम से स्थापित करता है।
पुलिस की भूमिका और मानव अधिकार
मानव अधिकारों के संरक्षक के रूप में पुलिस
पुलिस राज्य की सबसे प्रत्यक्ष और दृश्य संस्था है। अपराध नियंत्रण, जाँच और सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखना उसके प्रमुख दायित्व हैं, जो सीधे—
- जीवन और व्यक्तिगत सुरक्षा के अधिकार
- क़ानून के समक्ष समानता
- न्याय तक पहुँच
से जुड़े हैं। आदर्श स्थिति में पुलिस नागरिकों को भय-मुक्त वातावरण प्रदान करती है।
मानव अधिकार उल्लंघन और पुलिस
व्यवहार में पुलिस पर मानव अधिकार उल्लंघनों के आरोप भी लगते रहे हैं, जैसे—
- हिरासत में हिंसा और मृत्यु
- अवैध गिरफ़्तारी और निरोध
- यातना और ज़बरदस्ती स्वीकारोक्ति
- हाशिए के समूहों के साथ भेदभावपूर्ण व्यवहार
ये उल्लंघन गंभीर हैं क्योंकि ये राज्य की अभिरक्षा में होते हैं। इसके पीछे राजनीतिक हस्तक्षेप, प्रशिक्षण की कमी, कार्यभार और दंडहीनता जैसे संरचनात्मक कारण होते हैं।
नागरिक प्रशासन की भूमिका
अधिकारों के क्रियान्वयन में प्रशासन
नागरिक प्रशासन मानव अधिकारों को नीतियों और सेवाओं के माध्यम से व्यावहारिक रूप देता है। शिक्षा, स्वास्थ्य, भोजन, आवास और सामाजिक सुरक्षा जैसे अधिकारों की प्राप्ति प्रशासन की दक्षता पर निर्भर करती है।
इस दृष्टि से प्रशासन आर्थिक और सामाजिक अधिकारों के क्रियान्वयन में केंद्रीय भूमिका निभाता है।
प्रशासनिक विफलता और अधिकार हनन
प्रशासनिक उदासीनता भी मानव अधिकार उल्लंघन का रूप ले सकती है—
- योजनाओं में देरी और अपवर्जन
- भ्रष्टाचार और मनमानी
- न्यायालयों के आदेशों का पालन न करना
ऐसी स्थितियों में अधिकार क़ानून में मौजूद रहते हैं, पर जीवन में अनुपस्थित हो जाते हैं।
सेना और मानव अधिकार
राष्ट्रीय सुरक्षा में सेना की भूमिका
सेना का मुख्य कार्य बाहरी ख़तरों से देश की रक्षा करना है। कुछ परिस्थितियों में उसे आंतरिक सुरक्षा में भी तैनात किया जाता है।
मानव अधिकार दृष्टिकोण से सेना राष्ट्रीय सुरक्षा और अनुशासन के विशेष ढाँचे में कार्य करती है, जहाँ पारदर्शिता और नागरिक निगरानी सीमित होती है।
मानव अधिकार संबंधी चिंताएँ
आंतरिक सुरक्षा में तैनाती के दौरान सेना पर—
- अत्यधिक बल प्रयोग
- नागरिक हताहत
- तलाशी और निरोध में मनमानी
जैसे आरोप लगते रहे हैं। चुनौती यह है कि सैन्य आवश्यकता और नागरिक अधिकारों के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।
मानव अधिकार सिद्धांत यह मानता है कि असाधारण परिस्थितियों में भी न्यूनतम मानवीय मानक बनाए रखना अनिवार्य है।
अर्धसैनिक बल और मानव अधिकार
आंतरिक सुरक्षा में अर्धसैनिक बल
अर्धसैनिक बल पुलिस और सेना के बीच की कड़ी हैं। इनकी तैनाती—
- विद्रोह-रोधी अभियानों
- सीमा सुरक्षा
- दंगों और अशांति नियंत्रण
में की जाती है। समय के साथ इनकी भूमिका काफी विस्तृत हो गई है।
अधिकार उल्लंघन की चुनौतियाँ
अर्धसैनिक बलों से जुड़े मानव अधिकार सरोकारों में शामिल हैं—
- भीड़ नियंत्रण में अत्यधिक बल प्रयोग
- जवाबदेही तंत्र की कमजोरी
- नागरिक क्षेत्रों में लंबी तैनाती
इनकी मिश्रित भूमिका कई बार जवाबदेही और अधिकार क्षेत्र को अस्पष्ट बना देती है।
क़ानूनी ढाँचा और जवाबदेही
भारतीय विधिक व्यवस्था राज्य शक्ति को नियंत्रित करने के लिए कई सुरक्षा उपाय प्रदान करती है—
- संविधान के मौलिक अधिकार
- न्यायिक समीक्षा और जनहित याचिका
- वैधानिक मानव अधिकार संस्थाएँ
Supreme Court of India ने गिरफ़्तारी, हिरासत, यातना और बल-प्रयोग से जुड़े दिशा-निर्देश देकर यह स्पष्ट किया है कि राज्य के अधिकारी क़ानून से ऊपर नहीं हैं।
सुरक्षा, आपातकाल और मानव अधिकार
मानव अधिकारों के संदर्भ में एक बड़ी चुनौती तब आती है जब—
- आपात स्थिति
- आतंकवाद-रोधी अभियान
- आंतरिक संघर्ष
होते हैं। इन स्थितियों में राज्य असाधारण शक्तियों का प्रयोग करता है।
मानव अधिकार दृष्टिकोण सुरक्षा की आवश्यकता को स्वीकार करता है, पर यह भी स्पष्ट करता है कि—
- शक्ति का प्रयोग अनुपातिक हो
- क़ानूनी प्रक्रिया का पालन हो
- यातना जैसे अधिकार उल्लंघन किसी भी स्थिति में स्वीकार्य नहीं हैं
कुछ अधिकार अविच्छेद्य (non-derogable) होते हैं।
मानव अधिकार प्रशिक्षण और संस्थागत सुधार
राज्य की मानव अधिकार प्रतिक्रिया को प्रभावी बनाने के लिए आवश्यक है—
- पुलिस और सुरक्षा बलों का मानव अधिकार प्रशिक्षण
- स्पष्ट संचालन प्रक्रिया और नियम
- स्वतंत्र निगरानी और शिकायत तंत्र
- पीड़ितों की सुरक्षा और प्रतिकार
संस्थागत सुधार के बिना राज्य की दमनकारी शक्तियाँ लोक-सेवा में परिवर्तित नहीं हो सकतीं।
लोकतंत्र, विधि का शासन और राज्य शक्ति
पुलिस, प्रशासन, सेना और अर्धसैनिक बलों का आचरण लोकतंत्र की गुणवत्ता का प्रतिबिंब है। जब शक्ति जवाबदेही से मुक्त हो जाती है, तब मानव अधिकार उल्लंघन सामान्य बन जाते हैं।
लोकतांत्रिक राज्य की पहचान शक्ति के अभाव से नहीं, बल्कि शक्ति पर विधिक और नैतिक नियंत्रण से होती है।
निष्कर्ष
मानव अधिकारों के प्रति राज्य की प्रतिक्रिया एक विरोधाभास को प्रकट करती है—वही संस्थाएँ जो अधिकारों की रक्षा के लिए बनाई गई हैं, वही उनका उल्लंघन भी कर सकती हैं।
भारत में संवैधानिक प्रावधान, न्यायिक निगरानी और मानव अधिकार संस्थाएँ एक मज़बूत आधार प्रदान करती हैं, परंतु प्रशिक्षण, जवाबदेही और संस्थागत संस्कृति में कमियाँ अब भी बनी हुई हैं।
अंततः मानव अधिकारों की रक्षा राज्य को कमज़ोर करने से नहीं, बल्कि राज्य शक्ति को सभ्य, नियंत्रित और जवाबदेह बनाने से संभव है। एक मानव अधिकार-सम्मत राज्य वही है जिसमें बल का प्रयोग सदैव न्याय, गरिमा और क़ानून के अधीन हो।
संदर्भ (References)
- Constitution of India
- Baxi, Upendra. The Future of Human Rights
- Austin, Granville. The Indian Constitution: Cornerstone of a Nation
- National Human Rights Commission Reports
- Supreme Court of India के हिरासत और पुलिस सुधार संबंधी निर्णय