भारत और इज़राइल में समाज की प्रकृति: बहुसांस्कृतिक समाज और बहुलतावाद की अवधारणा
(Nature of Society in India and Israel: Concept of Multicultural Society and Pluralism)
आधुनिक राजनीति के अध्ययन में बहुसांस्कृतिक समाज (Multicultural Society) की अवधारणा अत्यंत महत्वपूर्ण बन चुकी है, विशेष रूप से उन समाजों के संदर्भ में जहाँ गहरी सामाजिक, धार्मिक, जातीय और सांस्कृतिक विविधता मौजूद है। तुलनात्मक राजनीति में बहुसांस्कृतिकता केवल एक वर्णनात्मक श्रेणी नहीं है, बल्कि यह एक मानकात्मक और राजनीतिक ढाँचा भी है, जो पहचान, नागरिकता, समानता और लोकतांत्रिक शासन से जुड़े मूलभूत प्रश्न उठाता है।
India और Israel—दोनों को प्रायः बहुसांस्कृतिक समाज कहा जाता है, किंतु इनकी सामाजिक विविधता की प्रकृति, उसे जन्म देने वाली ऐतिहासिक प्रक्रियाएँ और उसे प्रबंधित करने की राजनीतिक रणनीतियाँ काफ़ी भिन्न हैं।
यह इकाई बहुसांस्कृतिक समाज और बहुलतावाद की अवधारणाओं को स्पष्ट करती है तथा इनके माध्यम से भारत और इज़राइल की सामाजिक संरचनाओं को समझने का प्रयास करती है।
बहुसांस्कृतिक समाज की अवधारणा
बहुसांस्कृतिक समाज वह होता है जिसमें एक ही राजनीतिक समुदाय के भीतर अनेक सांस्कृतिक, धार्मिक, भाषायी, जातीय या राष्ट्रीय समूह सह-अस्तित्व में रहते हैं। ऐसे समाज सांस्कृतिक रूप से समरूप नहीं होते और न ही उन्हें किसी एक प्रमुख पहचान में समाहित किया जा सकता है—जब तक कि दमन या बहिष्करण का सहारा न लिया जाए।
राजनीतिक सिद्धांत में बहुसांस्कृतिकता की अवधारणा बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में विशेष रूप से उभरी, जब प्रवासन, अल्पसंख्यक अधिकार आंदोलनों और उत्तर–औपनिवेशिक विविधता ने राष्ट्र-राज्य की एकरूपता की धारणा को चुनौती दी। बहुसांस्कृतिकता यह तर्क देती है कि राजनीतिक एकता के लिए सांस्कृतिक समानता आवश्यक नहीं है; बल्कि लोकतांत्रिक स्थिरता के लिए भिन्नताओं की मान्यता और समायोजन आवश्यक है।
इस अर्थ में बहुसांस्कृतिकता केवल सहिष्णुता तक सीमित नहीं है, बल्कि यह संस्थागत व्यवस्थाओं, क़ानूनी संरक्षण और राजनीतिक प्रथाओं से जुड़ी हुई है।
बहुलतावाद: सामाजिक तथ्य और राजनीतिक सिद्धांत
बहुलतावाद (Pluralism) समाज में अनेक समूहों, पहचानों और हितों के अस्तित्व को स्वीकार करता है। एक सामाजिक तथ्य के रूप में यह विविधता का वर्णन करता है, जबकि एक राजनीतिक सिद्धांत के रूप में यह इस बात पर ज़ोर देता है कि सार्वजनिक क्षेत्र में विभिन्न पहचानों और दृष्टिकोणों को वैध माना जाए।
राजनीतिक बहुलतावाद एकल और प्रभुत्वशाली राष्ट्रीय संस्कृति की धारणा को अस्वीकार करता है। इसके अनुसार समाज अनेक समुदायों से बना होता है, जिनमें से किसी को भी राष्ट्र की परिभाषा पर एकाधिकार नहीं होना चाहिए। लोकतांत्रिक बहुलतावाद के लिए प्रतिनिधित्व, संवाद और समझौते की संस्थागत व्यवस्थाएँ अनिवार्य हैं।
जहाँ बहुसांस्कृतिकता सांस्कृतिक मान्यता और अधिकारों पर केंद्रित होती है, वहीं बहुलतावाद सत्ता-साझेदारी और राजनीतिक सह-अस्तित्व पर बल देता है। व्यवहार में दोनों अवधारणाएँ एक-दूसरे से गहराई से जुड़ी हैं।
आधुनिक राज्य और बहुसांस्कृतिकता
आधुनिक राष्ट्र-राज्य का उदय बहुसांस्कृतिक समाजों के लिए एक बड़ी चुनौती लेकर आया। ऐतिहासिक रूप से राष्ट्र-राज्य ने एकता के नाम पर सांस्कृतिक समरूपता को बढ़ावा दिया, जिसके परिणामस्वरूप अल्पसंख्यकों का हाशियाकरण हुआ।
बहुसांस्कृतिक समाज इस प्रवृत्ति को चुनौती देते हैं और यह दावा करते हैं कि विविधता राज्य के लिए खतरा नहीं, बल्कि उसकी संरचनात्मक विशेषता है। मुख्य प्रश्न यह नहीं है कि समाज विविध है या नहीं, बल्कि यह है कि राज्य उस विविधता से कैसे निपटता है—समावेशन के माध्यम से या बहिष्करण के ज़रिये।
भारत और इज़राइल इस संदर्भ में दो भिन्न लेकिन शिक्षाप्रद उदाहरण प्रस्तुत करते हैं।
भारत: एक बहुसांस्कृतिक और बहुल समाज
भारत विश्व के सबसे विविध समाजों में से एक है। इसकी बहुसांस्कृतिकता धर्म, भाषा, जाति, नस्ल और क्षेत्र—सभी स्तरों पर दिखाई देती है। हिंदू, मुस्लिम, ईसाई, सिख, बौद्ध, जैन जैसे अनेक धार्मिक समुदायों के साथ-साथ सैकड़ों भाषाएँ और बोलियाँ भारत में सह-अस्तित्व में हैं।
भारतीय बहुलतावाद आधुनिक काल की देन नहीं है, बल्कि इसकी जड़ें ऐतिहासिक सह-अस्तित्व, संवाद और संघर्ष की लंबी परंपरा में निहित हैं। भारत किसी एक सांस्कृतिक केंद्र के चारों ओर विकसित समाज नहीं रहा, बल्कि वह एक सभ्यतागत मोज़ेक के रूप में विकसित हुआ।
स्वतंत्रता के बाद भारतीय संविधान ने धर्मनिरपेक्षता, संघवाद, सांस्कृतिक अधिकारों और अल्पसंख्यक संरक्षण के माध्यम से इस बहुलता को संस्थागत रूप देने का प्रयास किया। इस प्रकार भारत में बहुसांस्कृतिकता लोकतंत्र और संवैधानिकता से गहराई से जुड़ी हुई है।
फिर भी, भारत में बहुसांस्कृतिकता सदैव विवादित रही है। बहुसंख्यक पहचान और अल्पसंख्यक अधिकारों के बीच तनाव तथा राष्ट्रीय एकता की व्याख्या को लेकर संघर्ष निरंतर राजनीतिक विमर्श का हिस्सा रहे हैं।
इज़राइल: एक विशिष्ट प्रकार का बहुसांस्कृतिक समाज
इज़राइल की बहुसांस्कृतिकता की प्रकृति भारत से भिन्न है। इज़राइली समाज मुख्यतः यहूदी समुदाय के भीतर की जातीय और सांस्कृतिक विविधता, तथा एक बड़े अरब–फ़िलिस्तीनी अल्पसंख्यक की उपस्थिति से निर्मित है।
यहूदी जनसंख्या स्वयं यूरोप, मध्य-पूर्व, अफ़्रीका और एशिया से आए विभिन्न समूहों से बनी है, जिनकी सांस्कृतिक परंपराएँ अलग-अलग हैं। इसके साथ ही एक गैर-यहूदी अल्पसंख्यक समुदाय है, जिसकी ऐतिहासिक, भाषायी और राष्ट्रीय पहचान प्रमुख ज़ायोनिस्ट विमर्श से भिन्न है।
इज़राइल में बहुसांस्कृतिकता इसलिए राष्ट्र, धर्म और सुरक्षा के प्रश्नों से अविभाज्य रूप से जुड़ी हुई है। राज्य स्वयं को एक यहूदी राज्य के रूप में परिभाषित करता है, जिससे सांस्कृतिक बहुलता और एक विशिष्ट राष्ट्रीय पहचान के बीच तनाव उत्पन्न होता है।
भारत और इज़राइल में बहुलतावाद और लोकतांत्रिक राजनीति
दोनों देशों में बहुलतावाद लोकतांत्रिक राजनीति को गहराई से प्रभावित करता है। राजनीतिक दल, चुनावी प्रतिस्पर्धा और नीतिगत बहसें अक्सर पहचान-आधारित मुद्दों के इर्द-गिर्द घूमती हैं।
भारत में बहुलतावाद ने क्षेत्रीय दलों, पहचान-आधारित राजनीति, गठबंधन सरकारों और संघीय सौदेबाज़ी को बढ़ावा दिया है। यहाँ विविधता का प्रबंधन समायोजन और विकेंद्रीकरण के माध्यम से किया जाता है।
इज़राइल में बहुलतावाद एक अत्यंत खंडित दल-प्रणाली, गठबंधन राजनीति और धर्म व राष्ट्र से जुड़े तीव्र विवादों के रूप में प्रकट होता है। हालाँकि, गैर-यहूदी अल्पसंख्यकों के संदर्भ में बहुलतावाद की सीमाएँ अधिक स्पष्ट दिखाई देती हैं।
बहुसांस्कृतिकता और बहुलतावाद की चुनौतियाँ
बहुसांस्कृतिक समाजों के सामने निरंतर चुनौतियाँ बनी रहती हैं—एकता और विविधता के बीच संतुलन, बहुसंख्यक प्रभुत्व को रोकना और सभी समूहों के लिए समानता सुनिश्चित करना। जब विविधता को संसाधन के बजाय खतरे के रूप में देखा जाता है, तब बहुसांस्कृतिकता कमजोर पड़ जाती है।
भारत और इज़राइल—दोनों में बहुलता के साथ-साथ गहरी सामाजिक असमानताएँ और राजनीतिक संघर्ष भी मौजूद हैं। इसलिए विविधता का प्रबंधन केवल क़ानूनी मान्यता से नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों और समावेशी राजनीति से संभव है।
निष्कर्ष: तुलनात्मक दृष्टि से बहुसांस्कृतिकता
बहुसांस्कृतिक समाज और बहुलतावाद की अवधारणा भारत और इज़राइल की तुलना के लिए एक सशक्त ढाँचा प्रदान करती है। दोनों समाज गहराई से विविध हैं, किंतु उनके ऐतिहासिक अनुभव, संवैधानिक व्यवस्थाएँ और प्रमुख राष्ट्रीय कथाएँ भिन्न प्रकार की बहुसांस्कृतिक राजनीति को जन्म देती हैं।
भारत में बहुलतावाद को संवैधानिक रूप से राष्ट्र-निर्माण का आधार माना गया है, जबकि इज़राइल में बहुसांस्कृतिक यथार्थ एक सशक्त जातीय–राष्ट्रीय राज्य-परिभाषा के साथ सह-अस्तित्व में है।
इन अंतरों को समझना भारत और इज़राइल में लोकतंत्र, नागरिकता और संघर्ष के विश्लेषण के लिए अनिवार्य है और यह आगे की इकाइयों—राज्य संरचना, दल-राजनीति और समकालीन चुनौतियों—के अध्ययन की आधारभूमि तैयार करता है।
संदर्भ (References)
- Kymlicka, Will. Multicultural Citizenship
- Bhargava, Rajeev. Secularism and Its Critics
- Khilnani, Sunil. The Idea of India
- Smooha, Sammy. “Ethnic Democracy: Israel as an Archetype”
- Parekh, Bhikhu. Rethinking Multiculturalism