नागरिक समाज (Civil Society)
भूमिका
आधुनिक राजनीतिक सिद्धांत और लोकतांत्रिक व्यवहार में नागरिक समाज राज्य, बाजार और निजी जीवन (परिवार/समुदाय) के बीच स्थित एक केंद्रीय क्षेत्र के रूप में उभरता है। यह उन स्वैच्छिक संगठनों, सामाजिक आंदोलनों, गैर-सरकारी संगठनों, पेशेवर निकायों, धार्मिक/आस्था-आधारित समूहों और अनौपचारिक नेटवर्कों का समुच्चय है जो हितों का अभिव्यक्तिकरण करते हैं, नागरिकों को संगठित करते हैं और सत्ता को उत्तरदायी बनाते हैं। समकालीन लोकतंत्रों में नागरिक समाज को लोकतांत्रिक सुदृढ़ीकरण, सामाजिक समावेशन और उत्तरदायी शासन के लिए अनिवार्य माना जाता है।

भारतीय संदर्भ में नागरिक समाज का महत्व विशेष है। देश की बहुलतावादी सामाजिक संरचना, औपनिवेशिक अनुभव और उत्तर-औपनिवेशिक विकासात्मक चुनौतियों ने नागरिक समाज को राज्य का सहयोगी, निगरानीकर्ता और कई बार आलोचक—तीनों भूमिकाओं में सक्रिय रखा है। राष्ट्रवादी आंदोलन से लेकर समकालीन अधिकार-आधारित संघर्षों तक, नागरिक समाज ने राजनीतिक संस्थाओं और प्रक्रियाओं को निरंतर प्रभावित किया है।
नागरिक समाज की वैचारिक समझ
नागरिक समाज की अवधारणा का विकास राजनीतिक चिंतन की विभिन्न धाराओं में हुआ है। शास्त्रीय उदारवादी परंपरा में नागरिक समाज को राज्य-दबाव से मुक्त स्वैच्छिक संघों का क्षेत्र माना गया, जो व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा करता है और सत्ता के केंद्रीकरण पर अंकुश लगाता है। एलेक्सिस द टॉकविल ने स्वैच्छिक संघों को लोकतंत्र की “नागरिक आदतों” का विद्यालय बताते हुए कहा कि वे सहभागिता, विश्वास और सार्वजनिक भावना का निर्माण करते हैं।
मार्क्सवादी दृष्टि ने इस अवधारणा को आलोचनात्मक रूप में देखा। कार्ल मार्क्स के अनुसार नागरिक समाज पूंजीवादी उत्पादन संबंधों में निहित बुर्जुआ हितों का क्षेत्र है, जो वर्ग प्रभुत्व को पुनरुत्पादित करता है। एंटोनियो ग्राम्शी ने इस समझ को पुनर्संयोजित करते हुए नागरिक समाज को वैचारिक संघर्ष का स्थल माना—जहाँ शिक्षा, संस्कृति और संघों के माध्यम से वर्चस्व (hegemony) निर्मित भी होता है और चुनौती भी दी जाती है।
समकालीन सिद्धांत नागरिक समाज को एक विविध, बहुवचन और विवादित क्षेत्र के रूप में देखता है, जो ऐतिहासिक-राजनीतिक परिस्थितियों के अनुसार सत्ता संरचनाओं को मज़बूत भी कर सकता है और प्रश्नांकित भी।
राज्य और नागरिक समाज का संबंध
राज्य और नागरिक समाज का संबंध न तो स्वाभाविक रूप से विरोधी है और न ही पूर्णतः सहकारी। उदार लोकतांत्रिक सिद्धांत में नागरिक समाज से अपेक्षा की जाती है कि वह राज्य-सत्ता की निगरानी करे, उत्तरदायित्व की मांग करे और उन सामाजिक हितों का प्रतिनिधित्व करे जो औपचारिक राजनीतिक संस्थाओं में कम प्रतिनिधित्व पाते हैं। दूसरी ओर, आधुनिक शासन (governance) नागरिक समाज को नीति-निर्माण, सेवा-प्रदान और विकास कार्यक्रमों में साझेदार के रूप में भी स्वीकार करता है।
भारत में यह संबंध विकासात्मक राज्य की विरासत से आकार ग्रहण करता है। शिक्षा, स्वास्थ्य, गरीबी उन्मूलन और पर्यावरण संरक्षण जैसे क्षेत्रों में नागरिक समाज ने राज्य की क्षमता का पूरक बनकर काम किया है। किंतु जब नागरिक समाज प्रभुत्वशाली नीतियों को चुनौती देता है, भ्रष्टाचार उजागर करता है या विकास परियोजनाओं के विरुद्ध जन-आंदोलन खड़ा करता है, तब टकराव भी उभरता है। इस प्रकार नागरिक समाज सहयोग, निगरानी और प्रतिरोध—तीनों आयामों में सक्रिय रहता है।
भारत में नागरिक समाज का ऐतिहासिक विकास
भारतीय नागरिक समाज की जड़ें औपनिवेशिक काल में गहराई से फैली हुई हैं। सामाजिक-धार्मिक सुधार आंदोलनों, प्रेस, शिक्षित सार्वजनिक मंचों और राष्ट्रवादी संगठनों ने औपनिवेशिक सत्ता के विरुद्ध जनमत का निर्माण किया। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस जैसी संस्थाएँ प्रारंभ में नागरिक समाज के मंच के रूप में उभरीं और बाद में राजनीतिक संस्थान बनीं।
स्वतंत्रता के बाद प्रारंभिक दशकों में राज्य-प्रधान विकास मॉडल के कारण नागरिक समाज का स्वायत्त क्षेत्र अपेक्षाकृत सीमित रहा। किंतु 1970 के दशक—विशेषतः आपातकाल (1975–77)—के बाद नागरिक समाज का विस्तार हुआ। नागरिक स्वतंत्रताओं, मानवाधिकारों, पर्यावरण, महिला अधिकारों और आदिवासी प्रश्नों पर आंदोलनों ने लोकतांत्रिक निगरानी की नई परंपरा स्थापित की। एनजीओ और जमीनी आंदोलनों का उदय विकासात्मक विफलताओं और सहभागितामूलक शासन की मांग—दोनों का परिणाम था।
लोकतंत्र, सहभागिता और नागरिक समाज
नागरिक समाज को लोकतंत्र की आधारशिला माना जाता है क्योंकि यह चुनावी राजनीति से परे नागरिक सहभागिता को सक्षम बनाता है। यह मंच हाशिए पर पड़े समूहों को अपनी मांगें रखने, सामूहिक कार्रवाई संगठित करने और सार्वजनिक नीति को प्रभावित करने का अवसर देता है। इससे लोकतंत्र केवल प्रक्रियात्मक न रहकर सारगर्भित बनता है।
फिर भी, नागरिक समाज का आदर्शीकरण जोखिमपूर्ण है। सभी नागरिक समाज संगठन लोकतांत्रिक या प्रगतिशील हों, यह आवश्यक नहीं। कुछ संगठन संकीर्ण हितों का प्रतिनिधित्व कर सकते हैं या सामाजिक असमानताओं को बनाए रख सकते हैं। इसलिए नागरिक समाज की लोकतांत्रिक क्षमता उसकी आंतरिक विविधता, स्वायत्तता और संवैधानिक मूल्यों—समानता, न्याय और बहुलता—के प्रति प्रतिबद्धता पर निर्भर करती है।
शासन, नवउदारवाद और नागरिक समाज
‘सरकार’ से ‘शासन’ की ओर संक्रमण के साथ नागरिक समाज की भूमिका नीति-नेटवर्कों और साझेदारी ढाँचों में बढ़ी है। अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ और विकास एजेंसियाँ नागरिक समाज की भागीदारी को दक्षता, पारदर्शिता और उत्तरदायित्व बढ़ाने का साधन मानती हैं। भारत में ग्रामीण-शहरी शासन, सामाजिक कल्याण और निगरानी तंत्रों में नागरिक समाज की संस्थागत भागीदारी देखी जाती है।
आलोचक चेतावनी देते हैं कि इस प्रक्रिया में नागरिक समाज का अराजनीतिकरण हो सकता है—जहाँ वह प्रतिरोध और विमर्श के बजाय सेवा-प्रदान तक सीमित हो जाए। एनजीओ नियमन, वित्तीय प्रतिबंध और निगरानी से नागरिक समाज की स्वायत्तता पर प्रश्न भी उठते हैं, जिससे ‘सिविक स्पेस’ के सिमटने की चिंता बढ़ती है।
चुनौतियाँ और आलोचनाएँ
समकालीन भारत में नागरिक समाज कई चुनौतियों से घिरा है। प्रतिनिधित्व, उत्तरदायित्व और वैधता—विशेषकर बड़े एनजीओ के संदर्भ में—महत्वपूर्ण प्रश्न हैं। संसाधनों और संगठनात्मक क्षमता की असमानता नागरिक समाज के भीतर ही पदानुक्रम उत्पन्न करती है। इसके अतिरिक्त, राजनीतिक ध्रुवीकरण और वैचारिक विभाजन सामूहिक लोकतांत्रिक भूमिका को कमजोर कर सकते हैं।
निष्कर्ष
नागरिक समाज भारत की राजनीतिक संस्थाओं और प्रक्रियाओं का एक अनिवार्य घटक है। यह सहभागिता, प्रतिरोध, सहयोग और मोलभाव—इन सभी के माध्यम से लोकतंत्र और शासन की गुणवत्ता को आकार देता है। यद्यपि इसकी भूमिका न तो एकरूप से प्रगतिशील है और न ही स्वतः मुक्तिदायी, फिर भी यह सार्वजनिक विमर्श, सामाजिक लामबंदी और संस्थागत उत्तरदायित्व के लिए अपरिहार्य स्थान उपलब्ध कराता है।
एक जीवंत और समावेशी भारतीय लोकतंत्र के लिए नागरिक समाज की स्वायत्तता, विविधता और आलोचनात्मक क्षमता का संरक्षण आवश्यक है। राज्य के विकल्प के रूप में नहीं, बल्कि व्यापक लोकतांत्रिक पारिस्थितिकी तंत्र में संतुलक और सहभागी के रूप में नागरिक समाज को समझना अधिक उपयुक्त है।
संदर्भ / सुझाई गई पुस्तकें
- एलेक्सिस द टॉकविल, Democracy in America
- एंटोनियो ग्राम्शी, Selections from the Prison Notebooks
- जीन कोहेन एवं एंड्र्यू अरातो, Civil Society and Political Theory
- पार्थ चटर्जी, Politics of the Governed
- सुदीप्त कविराज, The Unhappy Consciousness
- निरजा गोपाल जयाल, Democracy and the State in India
FAQs
1. राजनीतिक सिद्धांत में नागरिक समाज क्या है?
राज्य और निजी जीवन के बीच स्थित वह क्षेत्र जहाँ स्वैच्छिक संगठन और आंदोलनों के माध्यम से नागरिक सार्वजनिक जीवन में भाग लेते हैं।
2. लोकतंत्र के लिए नागरिक समाज क्यों महत्वपूर्ण है?
यह सहभागिता, उत्तरदायित्व और प्रतिनिधित्व को सुदृढ़ करता है तथा सत्ता की निगरानी करता है।
3. क्या नागरिक समाज हमेशा लोकतांत्रिक होता है?
नहीं। इसकी भूमिका संदर्भ-निर्भर है और यह असमानताओं को भी पुनरुत्पादित कर सकता है।
4. भारत में नागरिक समाज की प्रमुख चुनौतियाँ क्या हैं?
नियमन, संसाधन-असमानता, राजनीतिक ध्रुवीकरण और प्रतिनिधित्व की वैधता से जुड़े प्रश्न।