सुरक्षा, निगरानी और अपवाद की अवस्था
(Security, Surveillance and the State of Exception)
सुरक्षा आधुनिक राज्य के सबसे शक्तिशाली संगठनात्मक सिद्धांतों में से एक बन चुकी है। समकालीन राजनीति में राज्य आतंकवाद, अपराध, प्रवासन और अव्यवस्था जैसे खतरों से समाज की रक्षा के नाम पर असाधारण शक्तियों को正 ठहराते हैं। आलोचनात्मक राजनीतिक सिद्धांत का तर्क है कि सुरक्षा कोई तटस्थ या केवल रक्षात्मक उद्देश्य नहीं है; बल्कि यह शासन की एक विधि है, जो क़ानून, नागरिकता और रोज़मर्रा के जीवन को रूपांतरित करती है। निगरानी (surveillance) और अपवाद की अवस्था (state of exception) का सामान्यीकरण यह दिखाता है कि आधुनिक राज्य व्यवस्था और सुरक्षा बनाए रखने के दावे के साथ-साथ अपनी शक्ति का विस्तार कैसे करते हैं।
यह इकाई सुरक्षा, निगरानी और अपवाद की अवस्था के आपसी संबंधों का विश्लेषण करती है और यह बताती है कि आपात शक्तियाँ और निगरानी-प्रथाएँ लोकतांत्रिक शासन को किस प्रकार बदल देती हैं।
शासन की विधि के रूप में सुरक्षा
सुरक्षा के पारंपरिक दृष्टिकोण राज्य को बाहरी खतरों से बचाने पर केंद्रित रहे हैं। आलोचनात्मक दृष्टियाँ इस संकीर्ण समझ को चुनौती देती हैं और तर्क देती हैं कि सुरक्षा अंदर से जनसंख्या को शासित करने की तकनीक के रूप में कार्य करती है।
सुरक्षा विमर्श यह निर्धारित करता है कि “खतरा” क्या है और “खतरनाक” कौन है। जैसे ही किसी खतरे की पहचान होती है, असाधारण उपाय स्वीकार्य हो जाते हैं। इस प्रकार सुरक्षा केवल खतरे का जवाब नहीं देती; बल्कि वह जनसंख्या को वर्गीकृत करके, आवागमन को नियंत्रित करके और दमन को वैध ठहराकर असुरक्षा का उत्पादन भी करती है।
इस प्रक्रिया में अधिकार और न्याय की जगह जोखिम-प्रबंधन और निवारण केंद्र में आ जाते हैं।
आधुनिक राज्य और निगरानी
निगरानी समकालीन सुरक्षा प्रथाओं का केंद्रीय तत्व है। आधुनिक राज्य जनसंख्या के प्रबंधन के लिए डेटा-संग्रह, निगरानी और सूचना-प्रौद्योगिकियों पर बढ़ती निर्भरता दिखाते हैं। निगरानी केवल पुलिस या खुफिया एजेंसियों तक सीमित नहीं रहती; यह कल्याण, प्रवासन नियंत्रण, सार्वजनिक स्वास्थ्य और डिजिटल संचार जैसे क्षेत्रों तक फैल जाती है।
फूकोवादी अंतर्दृष्टियों के आधार पर निगरानी को अनुशासनात्मक और बायोपॉलिटिकल सत्ता के रूप में समझा जा सकता है। यह केवल देखने का कार्य नहीं करती, बल्कि देखे जाने की संभावना के माध्यम से व्यवहार को आकार देती है। नागरिक अनुपालन, आत्म-नियमन और पारदर्शिता के मानदंडों को आंतरिक कर लेते हैं।
इस प्रकार निगरानी राज्य और समाज के संबंध को रूपांतरित कर देती है और शासन को निरंतर तथा सर्वव्यापी बना देती है।
अनुशासन से नियंत्रण की ओर
आलोचनात्मक विद्वान यह इंगित करते हैं कि पारंपरिक अनुशासनात्मक संस्थाओं—जैसे जेल और स्कूल—से हटकर अब अधिक व्यापक नियंत्रण की ओर झुकाव बढ़ रहा है। डिजिटल तकनीकें वास्तविक समय की निगरानी, भविष्यवाणी-आधारित पुलिसिंग और एल्गोरिदमिक निर्णय-निर्माण को संभव बनाती हैं।
इन प्रथाओं में सुरक्षा और प्रशासन के बीच की सीमा धुँधली हो जाती है। यात्रा, संचार और उपभोग जैसी सामान्य गतिविधियाँ भी सुरक्षा शासन के दायरे में आ जाती हैं। निगरानी अब केवल अपराधियों को लक्ष्य नहीं बनाती, बल्कि पूरी जनसंख्या को संभावित जोखिम के रूप में देखती है।
यह विस्तार निजता, स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक जवाबदेही पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है।
अपवाद की अवस्था: अवधारणा और उत्पत्ति
अपवाद की अवस्था उस स्थिति को संदर्भित करती है, जिसमें आपातकाल के नाम पर सामान्य क़ानूनी व्यवस्था को निलंबित कर दिया जाता है। परंपरागत रूप से आपात शक्तियों को अस्थायी माना गया था, किंतु आलोचनात्मक सिद्धांतकारों का तर्क है कि आधुनिक शासन में अपवाद सामान्यीकृत हो गया है।
Giorgio Agamben के अनुसार, अपवाद की अवस्था राजनीतिक जीवन के हाशिए से हटकर उसके केंद्र में आ गई है। सुरक्षा के नाम पर राज्य अधिकारों को निलंबित करते हैं, विधिक प्रक्रिया को दरकिनार करते हैं और कार्यपालिका की शक्ति का विस्तार करते हैं—अक्सर बिना किसी स्पष्ट समय-सीमा के।
इस प्रकार अपवाद एक अस्थायी प्रतिक्रिया के बजाय शासन की स्थायी तकनीक बन जाता है।
क़ानून, संप्रभुता और “नग्न जीवन”
एगैंबेन का विश्लेषण क़ानून और संप्रभुता के बीच के विरोधाभासी संबंध को उजागर करता है। संप्रभु सत्ता क़ानून को बचाने के नाम पर उसे निलंबित करने का अधिकार अपने पास रखती है। इस प्रक्रिया में कुछ व्यक्तियों या समूहों को क़ानूनी संरक्षण से बाहर कर दिया जाता है।
एगैंबेन इस स्थिति को “नग्न जीवन” (bare life) कहते हैं—ऐसा जीवन जो जैविक रूप से राज्य के भीतर शामिल होता है, लेकिन राजनीतिक रूप से अधिकारों से वंचित रहता है। निरोध शिविर, आपात क़ानून और आतंकवाद-रोधी व्यवस्थाएँ ऐसे स्थानों के उदाहरण हैं, जहाँ व्यक्ति पूर्ण क़ानूनी सुरक्षा के बिना राज्य-सत्ता के अधीन रहते हैं।
अपवाद की अवस्था आधुनिक संप्रभुता की दमनकारी नींव को उजागर करती है।
सुरक्षा, अपवाद और लोकतंत्र
सुरक्षा और आपात शक्तियों का विस्तार लोकतांत्रिक शासन के लिए गंभीर चुनौतियाँ पैदा करता है। निगरानी और अपवादात्मक उपाय नागरिक स्वतंत्रताओं को कमज़ोर करते हैं, संदेह को सामान्य बनाते हैं और सार्वजनिक निगरानी को सीमित करते हैं।
औपचारिक रूप से लोकतांत्रिक संस्थाएँ कार्यरत रहती हैं, लेकिन कार्यपालिका के विस्तार के साथ उनका सार खोखला हो जाता है। संकट के समय बनाए गए आपात क़ानून अक्सर संकट समाप्त होने के बाद भी बने रहते हैं।
यह प्रश्न उभरता है कि जब अपवाद नियम बन जाए, तो क्या लोकतंत्र जीवित रह सकता है?
सुरक्षा और अपवाद के उत्तर–औपनिवेशिक आयाम
उत्तर–औपनिवेशिक संदर्भों में अपवाद की अवस्था का एक लंबा इतिहास रहा है। औपनिवेशिक शासन स्थायी आपात, विधिक द्वैत और दमनकारी प्रशासन पर आधारित था। कई उत्तर–औपनिवेशिक राज्यों ने इन प्रथाओं को विरासत में पाया।
सुरक्षा क़ानून, निवारक हिरासत और सैन्यीकृत पुलिसिंग का प्रयोग अक्सर हाशिए के समुदायों पर असमान रूप से होता है। इससे स्पष्ट होता है कि सुरक्षा शासन ऐतिहासिक असमानताओं और भेदित नागरिकता को पुनरुत्पादित करता है।
इसलिए सुरक्षा और अपवाद को औपनिवेशिक विरासतों और वैश्विक सत्ता-संबंधों के भीतर रखकर समझना आवश्यक है।
प्रतिरोध और संघर्ष
निगरानी और अपवादात्मक शक्तियों के विस्तार के बावजूद, सुरक्षा शासन निर्विवाद नहीं है। न्यायालय, नागरिक समाज, मीडिया और सामाजिक आंदोलन आपात शक्तियों के सामान्यीकरण को चुनौती देते हैं।
क़ानूनी चुनौतियाँ, डेटा-संरक्षण आंदोलन और राजनीतिक विरोध जैसे रोज़मर्रा के प्रतिरोध सुरक्षा-आधारित वैधता की नाज़ुकता को उजागर करते हैं। ये संघर्ष यह याद दिलाते हैं कि सुरक्षा कोई अपरिहार्य आवश्यकता नहीं, बल्कि एक राजनीतिक चुनाव है।
निष्कर्ष: सुरक्षा, निगरानी और अपवाद का सामान्यीकरण
यह इकाई दर्शाती है कि सुरक्षा, निगरानी और अपवाद की अवस्था आधुनिक राज्य की परस्पर जुड़ी विशेषताएँ हैं। सुरक्षा विमर्श निगरानी को वैध ठहराता है; निगरानी निवारक नियंत्रण को सक्षम बनाती है; और अपवाद की अवस्था असाधारण शक्तियों को क़ानूनी आवरण प्रदान करती है।
आलोचनात्मक राजनीतिक सिद्धांत यह स्पष्ट करता है कि ये प्रथाएँ केवल समाज की रक्षा नहीं करतीं, बल्कि नागरिकता, अधिकार और लोकतंत्र को पुनर्परिभाषित करती हैं। जब अपवाद सामान्य बन जाता है, तो विधि-शासन और मनमानी सत्ता के बीच की सीमा धुँधली हो जाती है।
इन गतिशीलताओं को समझना समकालीन राज्यों के विश्लेषण के लिए अनिवार्य है—विशेषकर ऐसे समय में जब स्थायी संकट, डिजिटल निगरानी और विस्तारित कार्यपालिका शक्ति वैश्विक राजनीति की पहचान बन चुके हैं।
संदर्भ (References)
- Agamben, Giorgio. State of Exception
- Foucault, Michel. Society Must Be Defended
- Foucault, Michel. Security, Territory, Population
- Lyon, David. Surveillance Society
- Bigo, Didier. “Security and Immigration”