क्लाइंटेलिज़्म (Clientelism) और धन (Money)
क्लाइंटेलिज़्म और धन की भूमिका मतदान व्यवहार के अध्ययन में एक अत्यंत महत्वपूर्ण आयाम है, विशेषकर भारत जैसे विकासशील लोकतंत्र में। यद्यपि भारतीय लोकतंत्र संवैधानिक रूप से राजनीतिक समानता, सार्वभौमिक मताधिकार और गुप्त मतदान पर आधारित है, व्यवहार में मतदाताओं के निर्णय कई बार भौतिक लाभ, संरक्षण (patronage) और धन-आधारित लेन-देन से प्रभावित होते हैं।
क्लाइंटेलिज़्म और धन का अध्ययन हमें यह समझने में मदद करता है कि औपचारिक लोकतांत्रिक आदर्शों और वास्तविक चुनावी व्यवहार के बीच किस प्रकार का अंतर मौजूद है।
क्लाइंटेलिज़्म की अवधारणा
क्लाइंटेलिज़्म उस राजनीतिक व्यवस्था को कहा जाता है जिसमें—
- राजनीतिक नेता या दल (patrons)
- व्यक्तिगत या सामूहिक लाभ प्रदान करते हैं
- और बदले में मतदाताओं (clients) से राजनीतिक समर्थन या वोट की अपेक्षा करते हैं
यह संबंध—
- असमान शक्ति-संतुलन पर आधारित होता है
- वैचारिक नहीं बल्कि व्यक्तिगत होता है
- नीति-आधारित न होकर लेन-देन पर आधारित होता है
इस व्यवस्था में मतदान एक नागरिक अधिकार से अधिक व्यावहारिक सौदेबाज़ी का रूप ले लेता है।
मतदान व्यवहार के रूप में क्लाइंटेलिज़्म
क्लाइंटेलिस्ट मतदान में मतदाता—
- दल की विचारधारा या नीति से नहीं
- बल्कि तत्काल लाभ, व्यक्तिगत संपर्क और भविष्य की सहायता की उम्मीद से
मतदान करता है।
क्लाइंटेलिज़्म वहाँ अधिक प्रबल होता है जहाँ—
- गरीबी और असुरक्षा व्यापक हो
- कल्याणकारी सेवाएँ असमान रूप से उपलब्ध हों
- स्थानीय स्तर पर राजनीतिक मध्यस्थ (brokers) प्रभावशाली हों
इस प्रकार क्लाइंटेलिज़्म सामाजिक असमानता और संस्थागत कमजोरी का परिणाम भी है।
भारतीय चुनावों में क्लाइंटेलिज़्म के रूप
भारत में क्लाइंटेलिज़्म विभिन्न रूपों में दिखाई देता है—
- व्यक्तिगत क्लाइंटेलिज़्म: नकद, शराब, उपहार, उपभोक्ता वस्तुओं का वितरण
- समूह-आधारित क्लाइंटेलिज़्म: जाति, समुदाय या बस्ती को सामूहिक लाभ का वादा
- मध्यस्थ-आधारित क्लाइंटेलिज़्म: स्थानीय नेता, दलाल या पार्टी कार्यकर्ता के माध्यम से वोट जुटाना
ये नेटवर्क मतदाताओं को राजनीतिक रूप से निर्भर बना देते हैं।
चुनावी राजनीति में धन की भूमिका
धन भारतीय चुनावों में कई स्तरों पर प्रभाव डालता है—
- चुनावी अभियानों के वित्तपोषण में
- मतदाताओं की लामबंदी में
- मीडिया और प्रचार पर नियंत्रण में
- अवैध प्रलोभन और खरीद-फरोख्त में
मतदाताओं के लिए धन अक्सर प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष लाभ के रूप में प्रकट होता है।
धन और मतदान व्यवहार
धन मतदान व्यवहार को दो तरीकों से प्रभावित करता है—
(1) प्रत्यक्ष प्रभाव
गरीब और असुरक्षित मतदाता कभी-कभी नकद या वस्तुओं के बदले मतदान करते हैं।
(2) अप्रत्यक्ष प्रभाव
धन-संपन्न उम्मीदवार—
- अधिक प्रचार
- बेहतर संगठन
- अधिक मीडिया उपस्थिति
के कारण “जीतने योग्य” प्रतीत होते हैं, जिससे मतदाता उनकी ओर आकर्षित होते हैं।
इस प्रकार धन चुनावों में राजनीतिक असमानता को बढ़ाता है।
गरीबी, तर्कसंगतता और क्लाइंटेलिज़्म
कई विद्वान मानते हैं कि क्लाइंटेलिस्ट मतदान अतार्किक नहीं, बल्कि परिस्थितिजन्य रूप से तर्कसंगत है। जहाँ—
- नीतिगत वादों पर भरोसा कम हो
- शासन की जवाबदेही कमजोर हो
- जीवन की आवश्यकताएँ तात्कालिक हों
वहाँ मतदाता अल्पकालिक लाभ को प्राथमिकता देता है।
इसलिए क्लाइंटेलिज़्म को जीविका-आधारित विवेक के रूप में भी देखा जाता है।
क्लाइंटेलिज़्म बनाम कार्यक्रम-आधारित राजनीति
मतदान व्यवहार के अध्ययन में एक महत्वपूर्ण अंतर किया जाता है—
- क्लाइंटेलिस्ट राजनीति: चयनात्मक, असमान लाभ पर आधारित
- कार्यक्रम-आधारित राजनीति: सार्वभौमिक नीतियों और विचारधारा पर आधारित
क्लाइंटेलिज़्म—
- नीति-आधारित प्रतिस्पर्धा को कमजोर करता है
- राजनीतिक जवाबदेही घटाता है
- संरक्षक–ग्राहक संबंधों को मजबूत करता है
फिर भी भारत में दोनों प्रकार की राजनीति सह-अस्तित्व में पाई जाती हैं।
धन-शक्ति और चुनावी निष्पक्षता
धन की बढ़ती भूमिका चुनावी निष्पक्षता के लिए गंभीर चुनौती है—
- मतदाता की स्वतंत्र पसंद प्रभावित होती है
- कम संसाधन वाले उम्मीदवार हाशिए पर चले जाते हैं
- राजनीति में भ्रष्टाचार और अपराधीकरण बढ़ता है
Election Commission of India ने बार-बार धन-शक्ति को स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों के लिए सबसे बड़ा खतरा बताया है।
नियमन और उसकी सीमाएँ
भारत में धन के नियमन के लिए—
- चुनावी खर्च की सीमा
- खर्च और आय का खुलासा
- अवैध नकदी की जब्ती
जैसे प्रावधान मौजूद हैं।
फिर भी—
- छिपा हुआ खर्च
- प्रतिनिधि (proxy) खर्च
- कमजोर दंडात्मक व्यवस्था
इन उपायों की प्रभावशीलता को सीमित कर देते हैं।
बदलता स्वरूप: पतन या रूपांतरण?
कुछ विद्वानों का मत है कि—
- कल्याणकारी योजनाओं के विस्तार से क्लाइंटेलिज़्म घट रहा है
- मीडिया और जागरूकता से खुले प्रलोभन कम हुए हैं
लेकिन अन्य मानते हैं कि—
- क्लाइंटेलिज़्म अधिक सूक्ष्म और लक्षित हो गया है
अर्थात यह समाप्त नहीं हुआ, बल्कि रूपांतरित हुआ है।
लोकतांत्रिक प्रभाव
क्लाइंटेलिज़्म और धन के लोकतांत्रिक प्रभाव दोहरे हैं—
नकारात्मक प्रभाव
- राजनीतिक समानता का क्षरण
- जवाबदेही में कमी
- अल्पकालिक शासन दृष्टि
सीमित सकारात्मक पक्ष
- वंचित वर्गों की राजनीतिक भागीदारी
- तात्कालिक जरूरतों की पहचान
यही द्वैत इसकी निरंतरता को समझाता है।
निष्कर्ष
क्लाइंटेलिज़्म और धन भारतीय मतदान व्यवहार के महत्वपूर्ण निर्धारक बने हुए हैं। ये हमें दिखाते हैं कि लोकतंत्र केवल संवैधानिक आदर्शों से नहीं, बल्कि सामाजिक-आर्थिक वास्तविकताओं से भी संचालित होता है।
यद्यपि ये प्रवृत्तियाँ कार्यक्रम-आधारित राजनीति और लोकतांत्रिक मूल्यों को कमजोर करती हैं, फिर भी वे मतदाताओं की विवशताओं और रणनीतियों को भी प्रतिबिंबित करती हैं।
इनसे निपटने के लिए केवल कड़े क़ानून पर्याप्त नहीं, बल्कि मजबूत संस्थाएँ, प्रभावी कल्याण, और वास्तविक राजनीतिक जवाबदेही आवश्यक है।
संदर्भ (References)
- Kitschelt, Herbert & Wilkinson, Steven. Patrons, Clients and Policies
- Chandra, Kanchan. Why Ethnic Parties Succeed
- Kothari, Rajni. Politics in India
- Yadav, Yogendra. Understanding Indian Voters
- Election Commission of India – Electoral Reform Reports