भूमि और श्रम
बी. आर. आंबेडकर के राजनीतिक–आर्थिक चिंतन में भूमि और श्रम के प्रश्न अत्यंत केंद्रीय स्थान रखते हैं। आंबेडकर भूमि और श्रम को केवल आर्थिक श्रेणियों के रूप में नहीं देखते थे, बल्कि उन्हें जाति, सत्ता और ऐतिहासिक अन्याय से निर्मित सामाजिक संस्थाएँ मानते थे। उनके अनुसार भूमि पर असमान नियंत्रण और श्रम का शोषण भारतीय समाज में असमानता के सबसे स्थायी आधार रहे हैं। लोकतंत्र और विकास की कोई भी गंभीर परियोजना इन संरचनात्मक समस्याओं को संबोधित किए बिना सफल नहीं हो सकती।
भूमि और श्रम पर आंबेडकर के विचार राजनीतिक अर्थशास्त्र के उनके अध्ययन, ग्राम-समाज की आलोचना और सामाजिक न्याय के प्रति उनकी गहरी प्रतिबद्धता से विकसित हुए। वे स्पष्ट रूप से मानते थे कि यदि राजनीतिक अधिकारों के साथ आर्थिक संरचना में परिवर्तन नहीं किया गया, तो वंचित वर्गों को वास्तविक स्वतंत्रता प्राप्त नहीं हो सकती।
भूमि : सत्ता और असमानता का स्रोत
आंबेडकर भूमि को केवल उत्पादन का साधन नहीं, बल्कि सामाजिक सत्ता और प्रभुत्व का स्रोत मानते थे। भारतीय संदर्भ में भूमि स्वामित्व ऐतिहासिक रूप से उच्च जातियों के हाथों में केंद्रित रहा है, जबकि दलित और निम्न जातियाँ भूमि से वंचित रहकर खेतिहर मज़दूर बनने को विवश हुईं। इस असमान भूमि संरचना ने जाति-आधारित पदानुक्रम और आर्थिक निर्भरता को मज़बूत किया।
आंबेडकर ने भारतीय गाँव की उस रोमांटिक छवि को सिरे से खारिज किया जिसमें उसे आत्मनिर्भर और सामंजस्यपूर्ण इकाई के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। इसके विपरीत, उन्होंने गाँव को उत्पीड़न का केंद्र बताया, जहाँ भूमि पर नियंत्रण श्रम, संसाधनों और सामाजिक जीवन पर नियंत्रण में बदल जाता है। उनके अनुसार दलितों की असुरक्षा और शोषण का प्रमुख कारण भूमिहीनता है।
आंबेडकर का तर्क था कि कृषि क्षेत्र में असमानता कोई संयोग नहीं, बल्कि सामाजिक संरचना द्वारा निर्मित वास्तविकता है। इसलिए लोकतंत्र की सार्थकता के लिए भूमि संबंधों में आमूलचूल परिवर्तन आवश्यक है।
भूमि सुधार और राज्य का हस्तक्षेप
आंबेडकर भूमि संबंधों में राज्य के सक्रिय हस्तक्षेप के प्रबल समर्थक थे। उनका मानना था कि जब निजी भूमि स्वामित्व जाति-व्यवस्था के साथ जुड़ जाता है, तब वह शोषण और असुरक्षा को जन्म देता है। वे उन आधे-अधूरे भूमि सुधारों के आलोचक थे जो प्रभुत्वशाली वर्गों के हितों को चुनौती नहीं देते।
आंबेडकर ने सामूहिक खेती, भूमि पर राज्य स्वामित्व और संसाधनों के पुनर्वितरण जैसे उपायों का समर्थन किया। उनके ये प्रस्ताव भले ही क्रांतिकारी प्रतीत हों, लेकिन उनका उद्देश्य भूमि को प्रभुत्व का साधन नहीं, बल्कि सामाजिक कल्याण का माध्यम बनाना था।
हालाँकि, आंबेडकर मनमाने अधिग्रहण के पक्षधर नहीं थे। वे ज़ोर देते थे कि भूमि सुधार संवैधानिक आधार पर, कानूनी ढाँचे के भीतर और लोकतांत्रिक तरीके से लागू किए जाने चाहिए। उनका लक्ष्य अव्यवस्था नहीं, बल्कि तार्किक नियोजन के माध्यम से सामाजिक न्याय था।
श्रम, जाति और शोषण
आंबेडकर के लिए श्रम का प्रश्न जाति की आलोचना से अलग नहीं था। उनका तर्क था कि जाति-व्यवस्था ने श्रम का ऐसा विभाजन किया जिसमें व्यक्ति को पेशा चुनने की स्वतंत्रता नहीं थी। दलितों के लिए श्रम कोई विकल्प नहीं, बल्कि जन्म से निर्धारित और अपमानजनक स्थिति थी।
आंबेडकर ने “श्रम विभाजन” और “श्रमिकों के विभाजन” के बीच महत्वपूर्ण अंतर किया। आधुनिक अर्थव्यवस्था में कौशल आधारित श्रम विभाजन आवश्यक है, लेकिन जाति आधारित व्यवस्था में श्रमिकों को स्थायी रूप से निम्न और उच्च श्रेणियों में बाँध दिया जाता है। यह व्यवस्था दक्षता, गरिमा और स्वतंत्रता—तीनों को नष्ट करती है।
इस प्रकार भारत में श्रम का शोषण केवल आर्थिक नहीं, बल्कि सामाजिक और नैतिक भी था, जिसे जातिगत पूर्वाग्रह और बहिष्कार लगातार मज़बूत करते रहे।
श्रमिक अधिकार और संरक्षणकारी क़ानून
आंबेडकर श्रमिक अधिकारों और राज्य संरक्षण के प्रबल समर्थक थे। वायसराय की कार्यकारी परिषद में श्रम सदस्य के रूप में उन्होंने कार्यघंटों, न्यूनतम मज़दूरी, सामाजिक सुरक्षा और कार्यस्थल की सुरक्षा से संबंधित कई प्रगतिशील क़ानूनों को आगे बढ़ाया।
वे इस धारणा को अस्वीकार करते थे कि मुक्त बाज़ार श्रमिकों की रक्षा कर सकता है, विशेषकर ऐसे समाज में जहाँ गहरी असमानता विद्यमान हो। उनके अनुसार राज्य का दायित्व है कि वह श्रम संबंधों को विनियमित करे और मानवीय कार्य-परिस्थितियाँ सुनिश्चित करे।
आंबेडकर के लिए श्रमिक अधिकार केवल आर्थिक लाभ नहीं, बल्कि मानव गरिमा और लोकतांत्रिक नागरिकता की शर्तें थे। शोषण से मुक्त हुए बिना श्रमिक सार्वजनिक और राजनीतिक जीवन में सार्थक भागीदारी नहीं कर सकते।
भूमि, श्रम और लोकतंत्र
आंबेडकर ने भूमि और श्रम सुधारों को लोकतंत्र के अस्तित्व से सीधे जोड़ा। उनका मानना था कि ऐसे समाज में लोकतंत्र टिक नहीं सकता जहाँ उत्पादन के साधनों पर अल्पसंख्यक का नियंत्रण हो और बहुसंख्यक आर्थिक रूप से निर्भर और सामाजिक रूप से हाशिए पर हों।
उनके अनुसार आर्थिक असमानता राजनीतिक समानता को खोखला कर देती है। इसलिए भूमि सुधार और श्रम संरक्षण लोकतांत्रिक अनिवार्यता हैं, न कि केवल नीतिगत विकल्प। ये सुधार स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के लिए भौतिक आधार प्रदान करते हैं।
आंबेडकर ने यह भी चेतावनी दी कि यदि कृषि और श्रम से जुड़े प्रश्नों की उपेक्षा की गई, तो लोकतांत्रिक संस्थाएँ कमज़ोर पड़ जाएँगी और सत्ता अभिजात वर्ग के हाथों में सिमट जाएगी।
आर्थिक नागरिकता की अवधारणा
आंबेडकर के चिंतन का एक महत्वपूर्ण पहलू है आर्थिक नागरिकता की अवधारणा। उनके अनुसार राजनीतिक अधिकार तब तक अस्थिर रहते हैं, जब तक उनके साथ आर्थिक सुरक्षा न जुड़ी हो। भूमि तक पहुँच, उचित मज़दूरी, स्थायी रोज़गार और सामाजिक संरक्षण—ये सभी स्वतंत्रता और आत्मसम्मान के लिए आवश्यक हैं।
इस दृष्टि से भूमि और श्रम पर आंबेडकर के विचार कल्याणकारी राज्य, सामाजिक लोकतंत्र और समावेशी विकास की आधुनिक बहसों का पूर्वाभास देते हैं। वे आर्थिक पुनर्संरचना को संवैधानिक लोकतंत्र के साथ जोड़ने का प्रयास करते हैं, ताकि स्वतंत्रता केवल औपचारिक न रहकर वास्तविक बन सके।
निष्कर्ष
भूमि और श्रम पर आंबेडकर का विश्लेषण भारतीय कृषि संरचना और श्रम संबंधों की एक सशक्त आलोचना प्रस्तुत करता है। उन्होंने स्पष्ट किया कि किस प्रकार जाति-आधारित भूमि स्वामित्व और श्रम नियंत्रण ने असमानता, शोषण और सामाजिक बहिष्कार को जन्म दिया। साथ ही उन्होंने भूमि सुधार, श्रमिक अधिकारों और राज्य की जिम्मेदारी पर आधारित एक रूपांतरणकारी दृष्टि भी प्रस्तुत की।
आंबेडकर के अनुसार आर्थिक न्याय के बिना लोकतंत्र अधूरा है। जातिगत प्रभुत्व को तोड़ने और गरिमा, समानता तथा स्वतंत्रता पर आधारित समाज के निर्माण के लिए भूमि और श्रम सुधार अनिवार्य हैं। समकालीन भारत में कृषि संकट, श्रम शोषण और असमान विकास को समझने के लिए उनके विचार आज भी अत्यंत प्रासंगिक हैं।
संदर्भ (References)
- आंबेडकर, बी. आर., जाति का विनाश (Annihilation of Caste)
- आंबेडकर, बी. आर., राज्य और अल्पसंख्यक (States and Minorities)
- आंबेडकर, बी. आर., द प्रॉब्लम ऑफ़ द रुपी (The Problem of the Rupee)
- ओमवेट, गेल, आंबेडकर: एक प्रबुद्ध भारत की ओर
- गोरे, एम. एस., आंबेडकर का राजनीतिक और सामाजिक चिंतन
- तेलतुम्बड़े, आनंद, रिपब्लिक ऑफ़ कास्ट