जेंडर और ‘क्रिटिकल टर्न’: अंतरराष्ट्रीय संबंध कहाँ समझता है
जेंडर और ‘क्रिटिकल टर्न’: अंतरराष्ट्रीय संबंध कहाँ समझता है
(Gender and the ‘Critical Turn’: Where IR Does Understand)
अंतरराष्ट्रीय संबंध (IR) में आया ‘क्रिटिकल टर्न’ परंपरागत, प्रत्यक्षवादी (positivist), राज्य-केंद्रित और समस्या-समाधान उन्मुख दृष्टिकोणों से एक महत्वपूर्ण विचलन को दर्शाता है। नारीवाद, उत्तर-संरचनावाद, उत्तर–औपनिवेशिक सिद्धांत, मार्क्सवाद और क्रिटिकल सिक्योरिटी स्टडीज़ जैसी आलोचनात्मक धाराएँ IR की उन मान्यताओं को चुनौती देती हैं जिन्हें लंबे समय तक स्वाभाविक और तटस्थ माना गया। जेंडर के दृष्टिकोण से देखा जाए तो ‘क्रिटिकल टर्न’ वह बिंदु है जहाँ IR यह समझना शुरू करता है कि वैश्विक राजनीति सामाजिक, ऐतिहासिक और गहराई से जेंडरयुक्त सत्ता-संबंधों द्वारा संरचित होती है।
यह इकाई विश्लेषण करती है कि किस प्रकार ‘क्रिटिकल टर्न’ ने IR में जेंडर विश्लेषण के लिए वैचारिक और पद्धतिगत स्थान बनाया, साथ ही इसकी सीमाओं और अंतर्विरोधों को भी रेखांकित करती है।
मुख्यधारा IR से क्रिटिकल टर्न तक
परंपरागत IR सिद्धांत—यथार्थवाद, उदारवाद और संस्थागतवाद—ने जेंडर को अंतरराष्ट्रीय राजनीति के लिए अप्रासंगिक माना। इन सिद्धांतों का ध्यान राज्य, संप्रभुता, युद्ध और कूटनीति पर केंद्रित रहा, जिन्हें तटस्थ और वस्तुनिष्ठ क्षेत्र समझा गया। जेंडर संबंधों को निजी क्षेत्र से जोड़कर गंभीर विश्लेषण से बाहर रखा गया।
‘क्रिटिकल टर्न’ ने इस बौद्धिक ढाँचे को यह पूछकर चुनौती दी कि ज्ञान कौन पैदा करता है, सिद्धांत किसके हितों की सेवा करता है, और ‘राजनीतिक’ किसे माना जाता है। तटस्थता और वस्तुनिष्ठता के दावों को खारिज करते हुए आलोचनात्मक IR ने नारीवादी विद्वानों को यह दिखाने का अवसर दिया कि वैश्विक राजनीति केवल भौतिक शक्ति की कहानी नहीं, बल्कि सामाजिक पदानुक्रमों, पहचानों और मानदंडों से बनी होती है।
इस अर्थ में ‘क्रिटिकल टर्न’ वह क्षण है जहाँ IR जेंडर को विश्व राजनीति का संरचनात्मक तत्व समझना शुरू करता है।
नारीवाद और ‘राजनीतिक’ का विस्तार
नारीवादी IR विद्वानों के अनुसार ‘क्रिटिकल टर्न’ का सबसे महत्वपूर्ण योगदान यह है कि उसने राजनीतिक की परिभाषा का विस्तार किया। जिन मुद्दों को पहले निजी या गौण माना जाता था—जैसे देखभाल कार्य, सामाजिक पुनरुत्पादन, यौनिकता और दैनिक हिंसा—उन्हें वैश्विक राजनीतिक व्यवस्था के केंद्र में लाया गया।
J. Ann Tickner तर्क देती हैं कि मुख्यधारा IR द्वारा जेंडर को बाहर रखना संयोग नहीं, बल्कि शक्ति और सुरक्षा की पुरुषीकृत धारणाओं का परिणाम है। नारीवादी आलोचना यह दिखाती है कि युद्ध, कूटनीति और अर्थव्यवस्था जेंडर आधारित श्रम-विभाजनों और सामाजिक मानदंडों पर निर्भर करते हैं।
इस हस्तक्षेप के माध्यम से ‘क्रिटिकल टर्न’ IR को यह समझने में मदद करता है कि जेंडर कोई अतिरिक्त चर नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय संबंधों का आधारभूत सिद्धांत है।
उत्तर-संरचनावाद, विमर्श और जेंडर
‘क्रिटिकल टर्न’ के भीतर उत्तर-संरचनावादी दृष्टिकोण भाषा, विमर्श और प्रतिनिधित्व पर ज़ोर देते हैं। जेंडर के संदर्भ में यह बदलाव महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह दिखाता है कि पुरुषत्व और स्त्रीत्व राजनीतिक कथाओं के माध्यम से कैसे निर्मित और सामान्यीकृत होते हैं।
आलोचनात्मक विद्वान यह विश्लेषण करते हैं कि सुरक्षा, संप्रभुता और राष्ट्रीय हित जैसी अवधारणाएँ किस प्रकार पुरुषवादी शब्दावली—शक्ति, स्वायत्तता और तर्कशीलता—में गढ़ी जाती हैं, जबकि स्त्रीत्व को कमजोरी, निर्भरता या भावुकता से जोड़ा जाता है। ये विमर्श नीतिगत विकल्पों को आकार देते हैं और सत्ता के विशिष्ट रूपों को वैध ठहराते हैं।
इस प्रकार जेंडर विश्लेषण को यह समझ मिलती है कि सत्ता केवल बल के माध्यम से नहीं, बल्कि अर्थ और अर्थ-निर्माण के ज़रिये भी कार्य करती है।
क्रिटिकल सिक्योरिटी स्टडीज़ और जेंडर
क्रिटिकल सिक्योरिटी स्टडीज़ इस धारणा को चुनौती देती हैं कि सुरक्षा केवल राज्य के सैन्य खतरों से जुड़ी है। इसके बजाय वे पूछती हैं कि किसकी सुरक्षा प्राथमिकता पाती है और असुरक्षा सामाजिक रूप से कैसे निर्मित होती है।
नारीवादी विद्वान इस आलोचना को आगे बढ़ाते हुए दिखाते हैं कि महिलाओं की असुरक्षाएँ—घरेलू हिंसा, आर्थिक अस्थिरता, विस्थापन और यौन हिंसा—प्रभुत्वशाली सुरक्षा एजेंडों से व्यवस्थित रूप से बाहर रखी जाती हैं। ‘क्रिटिकल टर्न’ IR को सुरक्षा को एक जेंडरयुक्त व्यवहार के रूप में देखने में सक्षम बनाता है, न कि एक तटस्थ नीति-लक्ष्य के रूप में।
यहाँ IR यह समझना शुरू करता है कि तथाकथित ‘हाई पॉलिटिक्स’ रोज़मर्रा की जेंडरयुक्त हिंसा को नज़रअंदाज़ करके ही टिक पाती है।
उत्तर–औपनिवेशिक आलोचनाएँ और अंतर्संबंधिता
‘क्रिटिकल टर्न’ की एक अन्य महत्वपूर्ण धारा—उत्तर–औपनिवेशिक सिद्धांत—जेंडर विश्लेषण को औपनिवेशिक इतिहास और साम्राज्य के संदर्भ में रखती है। नारीवादी विद्वान तर्क देते हैं कि जेंडर को नस्ल, वर्ग, राष्ट्र और औपनिवेशिक सत्ता से अलग करके नहीं समझा जा सकता।
Cynthia Enloe यह दिखाती हैं कि वैश्विक राजनीति वैश्विक दक्षिण की हाशिए पर मौजूद महिलाओं के श्रम और जीवन पर निर्भर करती है, जबकि मुख्यधारा सिद्धांत उन्हें अदृश्य बनाए रखते हैं। उत्तर–औपनिवेशिक नारीवादी दृष्टियाँ यह स्पष्ट करती हैं कि वैश्विक पदानुक्रम एक साथ जेंडरयुक्त और नस्लीकृत होते हैं।
यह अंतर्संबंधी समझ उन प्रमुख तरीकों में से एक है, जिनसे ‘क्रिटिकल टर्न’ IR की जेंडर संबंधी समझ को गहरा करता है।
ज्ञान, आत्मपरकता और नारीवादी पद्धतियाँ
‘क्रिटिकल टर्न’ की एक पहचान आत्मपरकता (reflexivity) है—यह मान्यता कि विद्वान तटस्थ दर्शक नहीं, बल्कि ज्ञान-उत्पादन की प्रक्रिया का हिस्सा होते हैं। नारीवादी IR इस अंतर्दृष्टि को अपनाते हुए यह पूछता है कि कौन किसके लिए बोलता है और किसका ज्ञान मान्य माना जाता है।
नारीवादी पद्धतियाँ जीवित अनुभव, नृवंशविज्ञान, कथाओं और स्टैंडपॉइंट ज्ञानमीमांसा पर ज़ोर देती हैं। ये दृष्टियाँ प्रत्यक्षवादी विधियों के प्रभुत्व को चुनौती देती हैं और तर्क देती हैं कि वैश्विक राजनीति को समझने के लिए हाशिए की आवाज़ों को सुनना आवश्यक है।
इस प्रकार ‘क्रिटिकल टर्न’ IR को जेंडर को विश्लेषणात्मक और नैतिक—दोनों स्तरों पर गंभीरता से लेने में सक्षम बनाता है।
क्रिटिकल टर्न की सीमाएँ
इन प्रगतियों के बावजूद नारीवादी विद्वान चेतावनी देते हैं कि ‘क्रिटिकल टर्न’ को पूरी तरह समावेशी मान लेना गलत होगा। कई आलोचनात्मक IR अध्ययन अब भी जेंडर-अंधे हैं और जेंडर को वर्ग, विमर्श या राज्य-सत्ता के बाद का विषय मानते हैं।
कभी-कभी पुरुषत्व की आलोचना अमूर्त स्तर पर रह जाती है, बिना महिलाओं के जीवित अनुभवों से जुड़े। कुछ मामलों में नारीवादी अवधारणाओं को केवल भाषा में अपनाया जाता है, बिना सैद्धांतिक या संस्थागत पदानुक्रमों को चुनौती दिए।
इसलिए, यद्यपि ‘क्रिटिकल टर्न’ IR को जेंडर समझने में सक्षम बनाता है, वह स्वतः नारीवादी रूपांतरण की गारंटी नहीं देता।
IR कहाँ जेंडर को समझता है
‘क्रिटिकल टर्न’ के माध्यम से IR जेंडर को इन प्रमुख तरीकों से समझ पाता है:
- जेंडर को सत्ता का केंद्रीय तत्व मानना, न कि परिधीय
- सुरक्षा और संप्रभुता को सामाजिक व जेंडरयुक्त निर्माण के रूप में देखना
- ज्ञान-उत्पादन को राजनीतिक और स्थित मानना
- वैश्विक असमानताओं को ऐतिहासिक और अंतर्संबंधी रूप में समझना
ये अंतर्दृष्टियाँ पारंपरिक IR से एक निर्णायक विच्छेद को दर्शाती हैं।
निष्कर्ष : जेंडर, आलोचना और IR का भविष्य
‘क्रिटिकल टर्न’ वह महत्वपूर्ण क्षण है जहाँ अंतरराष्ट्रीय संबंध जेंडर को वैश्विक राजनीति के केंद्र में समझना शुरू करता है। तटस्थता को चुनौती देकर, ‘राजनीतिक’ का विस्तार करके और आत्मपरकता को अपनाकर, आलोचनात्मक दृष्टियाँ नारीवादी विश्लेषण के लिए स्थान बनाती हैं।
फिर भी नारीवादी IR हमें याद दिलाता है कि समझ और रूपांतरण एक नहीं हैं। जेंडर को एक आलोचनात्मक लेंस के रूप में निरंतर प्रयोग में लाना आवश्यक है—ताकि IR के भीतर मौजूद सत्ता, ज्ञान और बहिष्कार पर प्रश्न उठाए जा सकें।
नारीवाद और आलोचनात्मक सिद्धांत के इस निरंतर संवाद में ही अंतरराष्ट्रीय संबंधों की अधिक समावेशी, आत्मचिंतनशील और न्यायपूर्ण समझ की संभावना निहित है।
संदर्भ (References)
- टिकनर, जे. ऐन, Gender in International Relations
- एनलो, सिंथिया, The Curious Feminist
- पीटरसन, वी. स्पाइक, Gendered States
- सिल्वेस्टर, क्रिस्टीन, Feminist Theory and International Relations
- कॉक्स, रॉबर्ट डब्ल्यू., “Social Forces, States and World Orders”