संस्थागतवाद (Institutionalism)
भूमिका
संस्थागतवाद राजनीतिक विश्लेषण की एक मौलिक परंपरा है, विशेषकर तुलनात्मक राजनीति के क्षेत्र में। इस दृष्टिकोण का केंद्रीय तर्क यह है कि राजनीतिक व्यवहार, निर्णय-प्रक्रियाएँ और शासन के परिणाम केवल व्यक्तिगत प्राथमिकताओं या सामाजिक संरचनाओं से नहीं, बल्कि उन संस्थाओं से गहराई से प्रभावित होते हैं जिनके भीतर राजनीतिक क्रिया संपन्न होती है। संस्थाएँ न केवल विकल्पों को सीमित करती हैं, बल्कि प्राथमिकताओं को आकार देती हैं और राजनीतिक प्रक्रियाओं में नियमितता उत्पन्न करती हैं।

संस्थागतवाद का विकास स्थिर और वर्णनात्मक दृष्टिकोण से होकर अधिक गतिशील और सैद्धांतिक रूप से परिष्कृत रूपों तक हुआ है। शास्त्रीय संस्थागतवाद से लेकर ऐतिहासिक, विवेकपूर्ण चयन (rational choice) और समाजशास्त्रीय संस्थागतवाद तक की यात्रा राजनीतिक विज्ञान में व्यापक पद्धतिगत और सैद्धांतिक बदलावों को प्रतिबिंबित करती है।
शास्त्रीय संस्थागतवाद
उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध से बीसवीं सदी के मध्य तक शास्त्रीय संस्थागतवाद राजनीतिक विज्ञान पर हावी रहा। इस दृष्टिकोण ने मुख्यतः औपचारिक संस्थाओं—संविधान, विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका और प्रशासनिक संरचनाओं—का अध्ययन किया। इसका उद्देश्य विभिन्न राजनीतिक प्रणालियों की तुलना उनके कानूनी ढाँचों और संगठनात्मक व्यवस्थाओं के आधार पर करना था।
यह परंपरा मूलतः वर्णनात्मक और मानकात्मक थी। संस्थाओं का मूल्यांकन इस आधार पर किया जाता था कि वे शक्तियों के पृथक्करण, विधि-शासन और प्रतिनिधि शासन जैसे संवैधानिक आदर्शों को किस हद तक साकार करती हैं। उस समय की तुलनात्मक राजनीति मुख्यतः पश्चिमी राजनीतिक प्रणालियों तक सीमित थी।
हालाँकि, शास्त्रीय संस्थागतवाद की आलोचना उसकी स्थिरता और सीमित व्याख्यात्मक क्षमता के कारण हुई। औपचारिक नियमों पर अत्यधिक बल देने के कारण यह यह स्पष्ट नहीं कर पाता था कि संस्थाएँ व्यवहार में कैसे कार्य करती हैं और अनौपचारिक मानदंड सत्ता-संबंधों को कैसे प्रभावित करते हैं।
संस्थागतवाद का पतन और पुनरुत्थान
1950 और 1960 के दशकों में व्यवहारवाद के उदय के साथ संस्थागतवाद का प्रभाव घटा। व्यवहारवादी विद्वानों ने तर्क दिया कि राजनीतिक विश्लेषण का केंद्र व्यक्ति, उनका व्यवहार और दृष्टिकोण होना चाहिए, न कि संस्थाएँ। इस चरण में संस्थाओं को गौण या निर्भर चर के रूप में देखा गया।
परंतु 1970 और 1980 के दशकों में व्यवहारवाद की सीमाओं के प्रति असंतोष बढ़ने लगा। इसके परिणामस्वरूप नए संस्थागतवाद (New Institutionalism) का उदय हुआ, जिसने यह पुनः स्थापित किया कि राजनीतिक व्यवहार को संस्थागत संदर्भों से अलग करके समझना संभव नहीं है।
नया संस्थागतवाद: प्रमुख धाराएँ
नया संस्थागतवाद एक एकीकृत सिद्धांत नहीं, बल्कि दृष्टिकोणों का समूह है, जो संस्थाओं की केंद्रीय भूमिका को स्वीकार करते हुए अलग-अलग सैद्धांतिक मान्यताओं पर आधारित हैं।
ऐतिहासिक संस्थागतवाद
ऐतिहासिक संस्थागतवाद राजनीतिक प्रक्रियाओं के कालिक आयाम पर बल देता है। यह मानता है कि निर्णायक मोड़ों (critical junctures) पर लिए गए संस्थागत निर्णय पथ-निर्भरता (path dependence) उत्पन्न करते हैं, जो भविष्य की राजनीतिक संभावनाओं को सीमित या निर्देशित करते हैं।
इस दृष्टिकोण में संस्थाएँ स्थायी संरचनाएँ हैं जो सत्ता का असमान वितरण करती हैं। कल्याणकारी राज्य, शासन-व्यवस्थाओं और राजनीतिक विकास के तुलनात्मक अध्ययन में इसका विशेष महत्व रहा है।
विवेकपूर्ण चयन संस्थागतवाद (Rational Choice Institutionalism)
इस दृष्टिकोण में संस्थाओं को ऐसे नियमों के समूह के रूप में देखा जाता है जो विवेकपूर्ण, उपयोगिता-अधिकतम करने वाले अभिनेताओं के रणनीतिक अंतःक्रिया को संरचित करते हैं। संस्थाएँ अनिश्चितता को कम करती हैं, लेन-देन लागत घटाती हैं और व्यवहार को प्रोत्साहन-आधारित रूप से दिशा देती हैं।
हालाँकि यह दृष्टिकोण स्पष्ट कारणात्मक तर्क प्रस्तुत करता है, आलोचक मानते हैं कि यह संस्कृति, मानदंड और ऐतिहासिक संदर्भ की भूमिका को कम करके आंकता है।
समाजशास्त्रीय संस्थागतवाद
समाजशास्त्रीय संस्थागतवाद संस्थाओं के सांस्कृतिक और मानकात्मक पक्ष पर जोर देता है। संस्थाएँ केवल नियम नहीं, बल्कि साझा अर्थ, प्रतीक और संज्ञानात्मक ढाँचे हैं जो यह निर्धारित करते हैं कि क्या उचित और वैध माना जाता है।
यह दृष्टिकोण ‘परिणामों की तर्कशीलता’ के बजाय ‘उपयुक्तता के तर्क’ की अवधारणा प्रस्तुत करता है, जिसके अनुसार अभिनेता सामाजिक अपेक्षाओं के अनुरूप व्यवहार करते हैं। यह दृष्टिकोण संगठनात्मक व्यवहार और वैश्विक शासन के अध्ययन में प्रभावशाली रहा है।
तुलनात्मक राजनीतिक विश्लेषण में संस्थागतवाद
संस्थागतवाद तुलनात्मक राजनीति में यह समझने का प्रभावी माध्यम प्रदान करता है कि समान सामाजिक स्थितियों में भी विभिन्न राजनीतिक परिणाम क्यों उत्पन्न होते हैं, या भिन्न समाजों में समान संस्थागत रूप कैसे उभरते हैं। यह संरचना और अभिकर्ता (agency) के बीच सेतु का कार्य करता है।
चुनावी प्रणालियाँ, संघवाद, शासन सुधार और संवैधानिक डिज़ाइन जैसे विषयों के तुलनात्मक अध्ययन में संस्थागत दृष्टिकोण अत्यंत उपयोगी सिद्ध हुआ है।
संस्थागतवाद की आलोचनाएँ
संस्थागतवाद की एक प्रमुख आलोचना संस्थागत निर्धारणवाद है, जिसमें संस्थाओं की स्वायत्तता और प्रभाव को अतिरंजित कर दिया जाता है। इससे सामाजिक संघर्ष, विचारधाराएँ और शक्ति-संबंध पर्याप्त रूप से प्रतिबिंबित नहीं हो पाते।
इसके अतिरिक्त, अंतर्जन्यता (endogeneity) की समस्या भी है, क्योंकि संस्थाएँ स्वयं राजनीतिक प्रक्रियाओं का परिणाम भी होती हैं और कारण भी। कुछ धाराओं पर परिवर्तन की अपेक्षा स्थिरता पर अधिक बल देने और सत्ता-असमानताओं की उपेक्षा का आरोप भी लगाया गया है।
समकालीन प्रासंगिकता
आज के राजनीतिक विश्लेषण में संस्थागतवाद अत्यंत प्रासंगिक है। लोकतांत्रिक क्षरण, संवैधानिक संकट, शासन-क्षमता और नीति-कार्यान्वयन जैसे विषयों को समझने में यह महत्वपूर्ण अंतर्दृष्टि प्रदान करता है। बहु-स्तरीय और वैश्विक शासन की जटिलताओं को समझने के लिए संस्थागत विश्लेषण अनिवार्य हो गया है।
साथ ही, उत्तर-औपनिवेशिक और आलोचनात्मक दृष्टिकोणों के साथ संवाद ने संस्थागतवाद के दायरे को व्यापक और अधिक समावेशी बनाया है।
निष्कर्ष
संस्थागतवाद तुलनात्मक राजनीतिक विश्लेषण की एक केंद्रीय और स्थायी परंपरा है। यह राजनीतिक जीवन की निरंतरता और परिवर्तन—दोनों को समझने के लिए सशक्त उपकरण प्रदान करता है। यद्यपि इसकी कोई एक धारा पूर्ण व्याख्या नहीं देती, फिर भी सामूहिक रूप से ये दृष्टिकोण राजनीति की जटिलता को गहराई से समझने में सहायक हैं।
एमए स्तर के विद्यार्थियों के लिए संस्थागतवाद यह स्पष्ट करता है कि राजनीति केवल व्यक्तियों या संरचनाओं का खेल नहीं, बल्कि उन संस्थागत ढाँचों का परिणाम है जिनमें राजनीतिक क्रिया घटित होती है।
संदर्भ / सुझाई गई पुस्तकें
- मार्च एवं ऑल्सन, Rediscovering Institutions
- पी. ए. हॉल और आर. टेलर, “Political Science and the Three New Institutionalisms”
- डगलस नॉर्थ, Institutions, Institutional Change and Economic Performance
- कैथलीन थेलेन, How Institutions Evolve
- बी. जी. पीटर्स, Institutional Theory in Political Science
FAQs
1. राजनीतिक विज्ञान में संस्थागतवाद क्या है?
यह वह दृष्टिकोण है जो राजनीतिक व्यवहार और परिणामों में औपचारिक व अनौपचारिक संस्थाओं की भूमिका पर बल देता है।
2. नया संस्थागतवाद शास्त्रीय संस्थागतवाद से कैसे भिन्न है?
नया संस्थागतवाद इतिहास, मानदंड और रणनीतिक अंतःक्रिया को भी शामिल करता है, जबकि शास्त्रीय संस्थागतवाद औपचारिक संरचनाओं तक सीमित था।
3. नए संस्थागतवाद की प्रमुख धाराएँ कौन-सी हैं?
ऐतिहासिक, विवेकपूर्ण चयन और समाजशास्त्रीय संस्थागतवाद।
4. तुलनात्मक राजनीति में संस्थागतवाद क्यों महत्वपूर्ण है?
क्योंकि यह विभिन्न संदर्भों में राजनीतिक परिणामों की व्याख्या संस्थागत संरचनाओं के माध्यम से करता है।