वर्ग, विचारधारा और सत्ता : लुई अल्थूसर का सिद्धांत
परिचय (Introduction)
लुई अल्थूसर (Louis Althusser) बीसवीं शताब्दी के प्रमुख मार्क्सवादी राजनीतिक सिद्धांतकार (Marxist Political Theorist) थे, जिन्होंने वर्ग (class), विचारधारा (ideology) और सत्ता (power) के संबंध को एक नए और गहरे दृष्टिकोण से समझाया। उनका योगदान पारंपरिक मार्क्सवाद से अलग था, क्योंकि उन्होंने सत्ता को केवल राज्य, कानून या बल प्रयोग तक सीमित नहीं माना, बल्कि उसे सामाजिक संस्थाओं और विचारधारात्मक प्रक्रियाओं के माध्यम से संचालित होने वाली शक्ति के रूप में देखा।

अल्थूसर का मुख्य प्रश्न यह था कि पूंजीवादी समाज (capitalist society) शोषण और असमानता के बावजूद लंबे समय तक कैसे बना रहता है। उनका उत्तर था—विचारधारा। उनके अनुसार, प्रभुत्व केवल दमन (repression) से नहीं बल्कि सहमति (consent) से भी कायम रहता है, और यह सहमति विचारधारा के माध्यम से उत्पन्न होती है। इसी कारण अल्थूसर का सिद्धांत राजनीतिक सिद्धांत की बहसों में अत्यंत महत्वपूर्ण है।
सैद्धांतिक पृष्ठभूमि : संरचनात्मक मार्क्सवाद (Structural Marxism)
अल्थूसर को प्रायः संरचनात्मक मार्क्सवाद (Structural Marxism) से जोड़ा जाता है। उन्होंने मानवतावादी मार्क्सवाद (Humanist Marxism) को अस्वीकार किया, जो व्यक्ति, चेतना और वर्ग चेतना (class consciousness) पर अधिक जोर देता है। अल्थूसर का तर्क था कि समाज को व्यक्तियों के माध्यम से नहीं, बल्कि संरचनाओं (structures) के माध्यम से समझना चाहिए।
उनके अनुसार समाज विभिन्न स्तरों से मिलकर बना होता है—आर्थिक (economic), राजनीतिक (political) और विचारधारात्मक (ideological)। ये सभी स्तर अपेक्षाकृत स्वायत्त (relatively autonomous) होते हैं, लेकिन अंततः उत्पादन संबंधों (relations of production) की पुनरुत्पत्ति (reproduction) में योगदान करते हैं।
अल्थूसर ने “प्रारंभिक मार्क्स” (early Marx) और “परिपक्व मार्क्स” (mature Marx) के बीच अंतर किया और कहा कि Capital में मार्क्स ने पूंजीवाद का वैज्ञानिक (scientific) विश्लेषण प्रस्तुत किया (Althusser, 1969)। इसी वैज्ञानिक दृष्टिकोण के आधार पर अल्थूसर ने वर्ग, विचारधारा और सत्ता को समझने का प्रयास किया।
अल्थूसर के सिद्धांत में वर्ग (Class)
अल्थूसर ने यह स्वीकार किया कि वर्ग संबंध उत्पादन प्रणाली (mode of production) में निहित होते हैं। किंतु उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि वर्ग प्रभुत्व को केवल आर्थिक शोषण के माध्यम से नहीं समझा जा सकता। वर्ग सत्ता राजनीतिक और विचारधारात्मक संरचनाओं के माध्यम से भी कायम रहती है।
उनके अनुसार, वर्ग चेतना के बिना भी वर्ग संघर्ष वस्तुगत रूप से (objectively) मौजूद रहता है। अर्थात्, व्यक्ति भले ही अपने वर्ग हितों से अवगत न हों, फिर भी वे एक वर्गीय संरचना का हिस्सा होते हैं। यह दृष्टिकोण पारंपरिक मार्क्सवाद से भिन्न है, जो वर्ग चेतना को क्रांति की अनिवार्य शर्त मानता था।
अल्थूसर ने इतिहास को एकमात्र आर्थिक विरोधाभास से संचालित मानने से भी इनकार किया। उन्होंने अधिक-निर्धारण (overdetermination) की अवधारणा दी, जिसके अनुसार सामाजिक परिवर्तन अनेक विरोधाभासों—आर्थिक, राजनीतिक और वैचारिक—के संयुक्त प्रभाव से होता है।
विचारधारा की अवधारणा (Concept of Ideology)
विचारधारा अल्थूसर के सिद्धांत का केंद्रीय तत्व है। पारंपरिक मार्क्सवाद में विचारधारा को अक्सर “झूठी चेतना” (false consciousness) माना गया, लेकिन अल्थूसर ने इस दृष्टिकोण को अपर्याप्त बताया। उनके अनुसार, विचारधारा केवल झूठ या भ्रम नहीं है, बल्कि यह वह ढांचा है जिसके माध्यम से व्यक्ति अपने सामाजिक अस्तित्व को समझते हैं।
अपने प्रसिद्ध निबंध “Ideology and Ideological State Apparatuses” (1971) में अल्थूसर ने विचारधारा को “व्यक्तियों और उनके वास्तविक अस्तित्व की परिस्थितियों के बीच कल्पनात्मक संबंध” (imaginary relationship) के रूप में परिभाषित किया। इसका अर्थ यह है कि विचारधारा वास्तविकता को पूरी तरह छिपाती नहीं है, बल्कि उसे इस तरह प्रस्तुत करती है जिससे मौजूदा सत्ता संबंध वैध और स्वाभाविक प्रतीत हों।
अल्थूसर के अनुसार, विचारधारा हर समाज में अनिवार्य होती है और व्यक्ति इससे बाहर नहीं रह सकता।
वैचारिक राज्य उपकरण (Ideological State Apparatuses – ISAs)
अल्थूसर का सबसे प्रसिद्ध योगदान वैचारिक राज्य उपकरणों (Ideological State Apparatuses) की अवधारणा है। उन्होंने राज्य की शक्ति को दो प्रकार के उपकरणों के माध्यम से संचालित बताया।
पहला है दमनकारी राज्य उपकरण (Repressive State Apparatuses – RSAs), जैसे सेना, पुलिस, न्यायालय और जेल, जो मुख्यतः बल प्रयोग से कार्य करते हैं। दूसरा है वैचारिक राज्य उपकरण (ISAs), जैसे शिक्षा व्यवस्था, परिवार, धर्म, मीडिया, संस्कृति और राजनीतिक संस्थाएँ, जो विचारधारा के माध्यम से काम करती हैं।
अल्थूसर के अनुसार, आधुनिक पूंजीवादी समाजों में शिक्षा प्रणाली सबसे महत्वपूर्ण ISA है, क्योंकि यह आज्ञाकारिता (obedience), अनुशासन (discipline) और पदानुक्रम (hierarchy) को सामान्य और स्वाभाविक बना देती है। इस प्रकार श्रम शक्ति (labour power) का वैचारिक पुनरुत्पादन होता है।
इंटरपेल्लेशन और विषय निर्माण (Interpellation and Subject Formation)
अल्थूसर ने विचारधारा के कार्य को समझाने के लिए इंटरपेल्लेशन (interpellation) की अवधारणा प्रस्तुत की। उनके अनुसार, विचारधारा व्यक्तियों को “पुकारती” है और उन्हें विषय (subjects) में परिवर्तित कर देती है।
जब कोई व्यक्ति स्वयं को “नागरिक”, “छात्र” या “कर्मचारी” के रूप में पहचानता है, तो वह उन सामाजिक अपेक्षाओं और नियमों को स्वीकार कर लेता है जो उस पहचान से जुड़े होते हैं। इस प्रकार प्रभुत्व बलपूर्वक नहीं, बल्कि स्वेच्छा से स्वीकार किया जाता है।
अल्थूसर का यह कथन कि व्यक्ति “हमेशा पहले से ही विषय होते हैं” (always already subjects), उदारवादी व्यक्ति-केंद्रित (liberal individualism) सिद्धांत की सीधी आलोचना है।
सत्ता और राज्य (Power and the State)
अल्थूसर के अनुसार सत्ता केवल राज्य में केंद्रीकृत नहीं होती, बल्कि सामाजिक संस्थाओं और दैनिक व्यवहारों में फैली होती है। राज्य एक वर्गीय राज्य (class state) होता है, जिसका मुख्य कार्य उत्पादन संबंधों की पुनरुत्पत्ति करना होता है।
हालाँकि, यह पुनरुत्पत्ति मुख्यतः दमन के बजाय विचारधारात्मक सहमति के माध्यम से होती है। इस दृष्टिकोण ने सत्ता को अदृश्य और सूक्ष्म (invisible and subtle) प्रक्रिया के रूप में समझने में मदद की।
अल्थूसर के विचारों का प्रभाव बाद के चिंतकों, विशेषकर मिशेल फूको (Michel Foucault), पर भी पड़ा।
आलोचना और प्रत्यालोचना (Criticism and Counter-Criticism)
अल्थूसर की सबसे बड़ी आलोचना यह है कि उनका सिद्धांत मानव एजेंसी (human agency) और प्रतिरोध (resistance) के लिए बहुत कम स्थान छोड़ता है। यदि व्यक्ति हमेशा विचारधारा द्वारा निर्मित होते हैं, तो परिवर्तन कैसे संभव है—यह एक प्रमुख प्रश्न है।
ई.पी. थॉम्पसन ने अल्थूसर पर अनुभवहीन और अमूर्त मार्क्सवाद (abstract Marxism) का आरोप लगाया। मानवतावादी मार्क्सवादियों ने वर्ग चेतना की उपेक्षा की आलोचना की।
इसके प्रत्युत्तर में समर्थकों का तर्क है कि अल्थूसर परिवर्तन की असंभवता नहीं, बल्कि प्रभुत्व की जटिलता को समझाते हैं। विचारधारा की पहचान स्वयं प्रतिरोध का पहला चरण हो सकती है।
समकालीन प्रासंगिकता (Contemporary Relevance)
आज के डिजिटल और मीडिया-प्रधान समाज में अल्थूसर का सिद्धांत अत्यंत प्रासंगिक है। मीडिया, शिक्षा और सोशल नेटवर्क आधुनिक ISAs के रूप में कार्य करते हैं और नागरिकों की राजनीतिक पहचान और सोच को आकार देते हैं।
राष्ट्रवाद, उपभोक्तावाद (consumerism) और पहचान की राजनीति (identity politics) को समझने में इंटरपेल्लेशन की अवधारणा विशेष रूप से उपयोगी है।
DU MA परीक्षाओं के लिए महत्व
दिल्ली विश्वविद्यालय की MA परीक्षाओं में अल्थूसर से संबंधित प्रश्न अक्सर पूछे जाते हैं, जैसे:
- Ideological State Apparatuses की व्याख्या
- Interpellation की अवधारणा
- अल्थूसर की मार्क्सवाद में भूमिका
- आलोचनात्मक मूल्यांकन
यह विषय विश्लेषणात्मक उत्तरों के लिए अत्यंत उपयुक्त है।
निष्कर्ष (Conclusion)
लुई अल्थूसर का वर्ग, विचारधारा और सत्ता का सिद्धांत मार्क्सवादी राजनीतिक सिद्धांत में एक महत्वपूर्ण हस्तक्षेप है। उन्होंने यह स्पष्ट किया कि प्रभुत्व केवल आर्थिक या दमनकारी शक्ति से नहीं, बल्कि विचारधारात्मक प्रक्रियाओं से भी कायम रहता है।
यद्यपि उनके सिद्धांत पर संरचनात्मक निर्धारणवाद (structural determinism) की आलोचना की गई है, फिर भी राजनीतिक सिद्धांत की बहसों में उनका योगदान अत्यंत प्रभावशाली और प्रासंगिक बना हुआ है।
संदर्भ ग्रंथ (References)
- Althusser, Louis (1971). Ideology and Ideological State Apparatuses
- Althusser, Louis (1969). For Marx
- Marx, Karl & Engels, Friedrich (1848). The Communist Manifesto
- Heywood, Andrew (2019). Political Theory: An Introduction
- Eagleton, Terry (1991). Ideology: An Introduction
- Poulantzas, Nicos (1978). State, Power, Socialism