राज्य के नीति-निर्देशक तत्व और मानव अधिकार
(Directive Principles of State Policy and Human Rights)
भारत
भारतीय संविधान में मानव अधिकारों का संवैधानिक ढाँचा केवल मौलिक अधिकारों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें राज्य के नीति-निर्देशक तत्व (Directive Principles of State Policy – DPSPs) भी एक अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। संविधान के भाग–IV में निहित ये सिद्धांत Constitution of India के सामाजिक–आर्थिक दर्शन को अभिव्यक्त करते हैं और भारतीय मानव अधिकार अवधारणा को एक व्यापक, कल्याणकारी तथा परिवर्तनकारी स्वरूप प्रदान करते हैं।
यद्यपि नीति-निर्देशक तत्व न्यायालयों द्वारा प्रत्यक्ष रूप से प्रवर्तनीय नहीं हैं, फिर भी वे शासन की दिशा और मानव अधिकारों की वास्तविक पूर्ति के लिए अनिवार्य माने गए हैं। भारतीय संदर्भ में मानव अधिकारों को समझने के लिए नीति-निर्देशक तत्वों का अध्ययन अत्यंत आवश्यक है।
नीति-निर्देशक तत्वों का दार्शनिक आधार
नीति-निर्देशक तत्वों का दार्शनिक आधार इस विचार में निहित है कि राजनीतिक लोकतंत्र तब तक अधूरा है जब तक सामाजिक और आर्थिक लोकतंत्र स्थापित न हो। संविधान-निर्माताओं का मानना था कि केवल नागरिक और राजनीतिक स्वतंत्रताएँ भारत जैसे असमान समाज में वास्तविक स्वतंत्रता सुनिश्चित नहीं कर सकतीं।
मानव अधिकारों की दृष्टि से नीति-निर्देशक तत्व निम्न मान्यताओं पर आधारित हैं—
- आर्थिक सुरक्षा के बिना स्वतंत्रता अर्थहीन है
- सामाजिक असमानताओं को दूर करने के लिए राज्य का सक्रिय हस्तक्षेप आवश्यक है
- मानवीय गरिमा जीवन की भौतिक परिस्थितियों से जुड़ी हुई है
इस प्रकार DPSPs मानव अधिकारों को नकारात्मक स्वतंत्रताओं से आगे बढ़ाकर राज्य के सकारात्मक दायित्वों में परिवर्तित करते हैं।
नीति-निर्देशक तत्वों की प्रकृति और उद्देश्य
राज्य के नीति-निर्देशक तत्व राज्य को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय की दिशा में मार्गदर्शन प्रदान करते हैं। इनमें प्रमुख रूप से शामिल हैं—
- आजीविका के पर्याप्त साधनों की व्यवस्था
- संपत्ति और संसाधनों के समान वितरण का प्रयास
- श्रमिकों के लिए मानवीय कार्य-स्थितियाँ
- महिलाओं और बच्चों का संरक्षण
- शिक्षा, स्वास्थ्य और सार्वजनिक सहायता का विस्तार
- पंचायतों और विकेंद्रीकरण को बढ़ावा
इन तत्वों का उद्देश्य भारत को एक कल्याणकारी राज्य (Welfare State) के रूप में विकसित करना है, जहाँ मानव अधिकार केवल क़ानूनी स्वतंत्रता न होकर सामाजिक सुरक्षा और सम्मानजनक जीवन का आधार बनें।
नीति-निर्देशक तत्व और सामाजिक–आर्थिक मानव अधिकार
मानव अधिकारों के अंतरराष्ट्रीय विमर्श में नीति-निर्देशक तत्वों को आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकारों के संवैधानिक रूप के रूप में देखा जा सकता है। इनमें—
- काम करने का अधिकार
- समान कार्य के लिए समान वेतन
- शिक्षा और स्वास्थ्य का अधिकार
- वृद्धावस्था, बीमारी और बेरोज़गारी में सहायता
- बच्चों और कमजोर वर्गों का संरक्षण
जैसे अधिकार अंतर्निहित हैं। ये अधिकार इस विचार को स्थापित करते हैं कि जीवन का अधिकार केवल अस्तित्व नहीं, बल्कि सम्मानजनक जीवन का अधिकार है।
मौलिक अधिकार और नीति-निर्देशक तत्वों का संबंध
भारतीय संविधान की एक विशिष्ट विशेषता यह है कि मौलिक अधिकार (भाग–III) और नीति-निर्देशक तत्व (भाग–IV) परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं। प्रारंभिक वर्षों में न्यायालयों ने मौलिक अधिकारों को नीति-निर्देशक तत्वों पर वरीयता दी, क्योंकि वे न्यायालयों द्वारा प्रवर्तनीय थे।
कालांतर में संवैधानिक व्याख्या का दृष्टिकोण बदला और यह स्वीकार किया गया कि—
- मौलिक अधिकार स्वतंत्रता सुनिश्चित करते हैं
- नीति-निर्देशक तत्व उन परिस्थितियों का निर्माण करते हैं जिनमें स्वतंत्रता सार्थक बनती है
यह दृष्टिकोण मानव अधिकारों की अविभाज्यता को स्वीकार करता है।
न्यायिक व्याख्या और मानव अधिकारों का विस्तार
भारतीय न्यायपालिका, विशेषकर Supreme Court of India, ने नीति-निर्देशक तत्वों को मौलिक अधिकारों की व्याख्या में सम्मिलित कर मानव अधिकारों के दायरे को व्यापक बनाया है।
न्यायालयों ने जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार में निम्न को शामिल किया—
- आजीविका का अधिकार
- शिक्षा का अधिकार
- स्वास्थ्य और स्वच्छ पर्यावरण का अधिकार
- आवास और मानवीय कार्य-स्थितियों का अधिकार
इस प्रकार, नीति-निर्देशक तत्वों ने अप्रत्यक्ष रूप से प्रवर्तनीय मानव अधिकारों का रूप ग्रहण कर लिया।
सामाजिक न्याय और वंचित वर्ग
नीति-निर्देशक तत्व विशेष रूप से समाज के कमज़ोर और वंचित वर्गों के संरक्षण पर बल देते हैं। राज्य को निर्देश दिया गया है कि वह—
- अनुसूचित जातियों, जनजातियों और अन्य पिछड़े वर्गों के हितों की रक्षा करे
- आय और अवसर की असमानताओं को कम करे
- श्रमिकों, महिलाओं और बच्चों के अधिकार सुनिश्चित करे
मानव अधिकारों के संदर्भ में यह दृष्टिकोण औपचारिक समानता से आगे बढ़कर वास्तविक और सुधारात्मक न्याय की अवधारणा को सुदृढ़ करता है।
विकास, राज्य और मानव अधिकार
भारत में विकास की अवधारणा नीति-निर्देशक तत्वों के माध्यम से मानव अधिकारों से जुड़ती है। आर्थिक नियोजन, कल्याणकारी योजनाएँ और सामाजिक नीतियाँ इन्हीं तत्वों से वैधता प्राप्त करती हैं।
हालाँकि, विकास परियोजनाओं से विस्थापन, पर्यावरणीय क्षति और आजीविका के संकट जैसे मानव अधिकार प्रश्न भी उत्पन्न होते हैं। इससे यह बहस उभरती है कि विकास मानव-केंद्रित होना चाहिए, न कि अधिकार-विरोधी।
सीमाएँ और आलोचनाएँ
नीति-निर्देशक तत्वों की कुछ सीमाएँ भी हैं—
- न्यायालयों द्वारा प्रत्यक्ष प्रवर्तन का अभाव
- क्रियान्वयन की राजनीतिक इच्छाशक्ति पर निर्भरता
- आर्थिक संसाधनों की कमी
फिर भी, उनकी नैतिक और वैचारिक शक्ति भारतीय मानव अधिकार विमर्श को निरंतर दिशा देती रही है।
भारतीय मानव अधिकार ढाँचे में नीति-निर्देशक तत्वों का महत्व
नीति-निर्देशक तत्व भारतीय मानव अधिकार व्यवस्था को विशुद्ध उदारवादी मॉडल से अलग करते हैं। वे मानव अधिकारों को केवल व्यक्ति और राज्य के बीच संबंध न मानकर एक सामाजिक और विकासात्मक परियोजना के रूप में प्रस्तुत करते हैं।
इस दृष्टि से भारत ने वैश्विक मानव अधिकार विमर्श में सामाजिक–आर्थिक अधिकारों को संवैधानिक स्तर पर स्थापित कर एक महत्वपूर्ण योगदान दिया है।
निष्कर्ष
राज्य के नीति-निर्देशक तत्व भारतीय मानव अधिकार ढाँचे का नैतिक और दार्शनिक आधार हैं। यद्यपि वे न्यायालयों द्वारा प्रत्यक्ष रूप से प्रवर्तनीय नहीं हैं, फिर भी वे मानव गरिमा, समानता और सामाजिक न्याय की प्राप्ति के लिए राज्य को निरंतर मार्गदर्शन प्रदान करते हैं।
मौलिक अधिकारों के साथ मिलकर नीति-निर्देशक तत्व मानव अधिकारों को एक जीवंत, समग्र और परिवर्तनकारी संवैधानिक प्रतिबद्धता में रूपांतरित करते हैं—जो न केवल राज्य की शक्ति को सीमित करती है, बल्कि समाज को अधिक न्यायपूर्ण बनाने का प्रयास भी करती है।
संदर्भ (References)
- Austin, Granville. The Indian Constitution: Cornerstone of a Nation
- Baxi, Upendra. The Future of Human Rights
- Seervai, H.M. Constitutional Law of India
- Sen, Amartya. Development as Freedom
- Constitution of India