राजनीति और प्रशासन द्विभाजन : Politics–Administration Dichotomy
भूमिका (Introduction)
राजनीति और प्रशासन का भेद सार्वजनिक प्रशासन के विकास में एक आधारभूत अवधारणा के रूप में उभरता है। यह आधुनिक राज्य में राजनीतिक सत्ता और प्रशासनिक मशीनरी के संबंध को समझने का प्रारंभिक प्रयास है। इसका मूल उद्देश्य नीति निर्माण (policy formulation) और नीति कार्यान्वयन (policy implementation) के बीच एक स्पष्ट अंतर स्थापित करना है।

हालाँकि इसे कभी-कभी सरल या पुरानी धारणा माना जाता है, राजनीति–प्रशासन भेद ने प्रशासनिक सिद्धांत, नौकरशाही संगठन और तटस्थता, जवाबदेही तथा लोकतांत्रिक शासन पर विचारों को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इसे एक कठोर सिद्धांत के रूप में नहीं, बल्कि विशिष्ट ऐतिहासिक और वैचारिक परिस्थितियों में उभरने वाले विश्लेषणात्मक ढांचे के रूप में समझना चाहिए।
वैचारिक और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
राजनीति–प्रशासन भेद का उद्भव 19वीं सदी के उत्तरार्ध के अमेरिका में हुआ। इस समय अमेरिकी प्रशासनिक प्रणाली को भ्रष्टाचार, पदाधिकार वितरण (spoils system) और अक्षमता ने प्रभावित किया था। सरकारी पदों का वितरण राजनीतिक इनाम के रूप में किया जाता था, जिससे प्रशासनिक अयोग्यता और अस्थिरता उत्पन्न होती थी।
प्रगतिशील युग के सुधारक प्रशासन को राजनीतिक हस्तक्षेप से अलग कर पेशेवर बनाने की कोशिश कर रहे थे। इस संदर्भ में भेद एक वैचारिक उत्तर के रूप में उभरा, जिसका उद्देश्य प्रशासन को तटस्थ और विशेषज्ञ-आधारित गतिविधि के रूप में स्थापित करना था। यह केवल सैद्धांतिक विचार नहीं था, बल्कि नौकरशाही की वैधता और पेशेवर दक्षता को सुनिश्चित करने की रणनीति थी।
वुडरो विल्सन और भेद की शास्त्रीय व्याख्या
वुडरो विल्सन को राजनीति–प्रशासन भेद का मुख्य वास्तुकार माना जाता है। अपने प्रख्यात निबंध “The Study of Administration” (1887) में विल्सन ने कहा कि प्रशासन राजनीति के सही क्षेत्र से बाहर है। उनका तर्क था कि राजनीति सरकार के कार्यों को निर्धारित करती है, जबकि प्रशासन उन्हें कुशलतापूर्वक लागू करता है।
विल्सन ने राजनीति को जनता की इच्छा के रूप में देखा और प्रशासन को तकनीकी प्रक्रिया के रूप में माना, जो उद्देश्यों की तुलना में साधनों पर केंद्रित है। उनका उद्देश्य प्रशासन को राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त करना था ताकि यह व्यवस्थित, तर्कसंगत और पेशेवर ढंग से कार्य कर सके।
विल्सन का तर्क यह भी मानता था कि लोकतांत्रिक जवाबदेही निर्वाचित प्रतिनिधियों द्वारा सुनिश्चित की जा सकती है, जबकि नौकरशाही तटस्थ नीति-कार्यान्वयन के माध्यम से कार्य करती है।
भेद की अवधारणा
राजनीति–प्रशासन भेद नीति निर्माण और कार्यान्वयन के बीच एक कार्यात्मक अंतर प्रस्तुत करता है। राजनीति मूल्य चयन, नीति निर्णय और जनता की इच्छा की अभिव्यक्ति से जुड़ी होती है। इसके विपरीत, प्रशासन कार्यान्वयन, दक्षता, विशेषज्ञता और नियम आधारित कार्रवाई से जुड़ा होता है।
यह भेद यह अस्वीकार नहीं करता कि राजनीति और प्रशासन के बीच संपर्क संभव है, लेकिन भ्रष्टाचार और अक्षमता से बचने के लिए एक नैतिक अलगाव की आवश्यकता को रेखांकित करता है। प्रशासन इस दृष्टि से क्षमता और विशेषज्ञता के माध्यम से वैधता अर्जित करता है, न कि निर्वाचक समर्थन से।
इस अवधारणा ने सार्वजनिक प्रशासन को राजनीति विज्ञान से स्वतंत्र अध्ययन के क्षेत्र के रूप में स्थापित करने का आधार प्रदान किया।
शास्त्रीय प्रशासनिक विचारक और भेद
शास्त्रीय प्रशासनिक विचारकों ने इस भेद को और अधिक पुष्ट किया। फ्रेडरिक डब्ल्यू. टेलर के वैज्ञानिक प्रबंधन (Scientific Management) ने दक्षता, मानकीकरण और तकनीकी तर्कशीलता पर जोर दिया, जिससे यह धारणा मजबूत हुई कि प्रशासन राजनीतिक मूल्यों से स्वतंत्र रूप से कार्य कर सकता है।
मैक्स वेबर के नौकरशाही मॉडल ने इस सोच को और अधिक मजबूती दी। वेबर ने नौकरशाही को पदानुक्रम, नियम, व्यक्तित्वहीनता और मेरिट आधारित भर्ती के माध्यम से एक तर्कसंगत कानूनी-संवैधानिक ढांचा माना। नौकरशाही की तटस्थता, उनके अनुसार, प्रशासनिक निर्णयों की निष्पक्षता और पूर्वानुमेयता सुनिश्चित करती है।
ल्यूथर गुलिक का POSDCORB फ्रेमवर्क प्रशासन को प्रबंधकीय कार्यों के सेट के रूप में देखता है, जो राजनीतिक बहस से अलग है। ये विचार राजनीति–प्रशासन भेद की प्राथमिकता और early administrative thought में इसकी दृढ़ता को दर्शाते हैं।
भेद के अंतर्निहित पूर्वधारणाएँ
राजनीति–प्रशासन भेद निम्न मान्यताओं पर आधारित है:
- नीति निर्माण और नीति कार्यान्वयन स्पष्ट रूप से अलग हो सकते हैं
- प्रशासक तटस्थ और मूल्य-मुक्त रह सकते हैं
- दक्षता प्रशासन का प्राथमिक लक्ष्य है
- लोकतांत्रिक नियंत्रण केवल निर्वाचित प्रतिनिधियों के माध्यम से होता है
ये मान्यताएँ प्रशासन को तकनीकी उपकरण के रूप में देखने का आधार देती हैं, राजनीतिक अभिनेता के रूप में नहीं।
व्यवहारिक और पोस्ट-क्लासिकल आलोचना
जैसा कि व्यवहारिक और पोस्ट-क्लासिकल दृष्टिकोण उभरे, इस भेद की सख्ती पर सवाल उठाए गए। हर्बर्ट साइमन ने यह स्पष्ट किया कि प्रशासनिक निर्णय हमेशा मूल्य-सापेक्ष होते हैं और सीमित तर्कसंगतता (bounded rationality) के भीतर लिए जाते हैं। निर्णय केवल तकनीकी प्रक्रिया नहीं हैं, बल्कि उनमें मूल्य और राजनीतिक संदर्भ शामिल होते हैं।
व्यवहारिक विद्वानों ने भी इस बात पर जोर दिया कि प्रशासक नीति के विभिन्न चरणों में विवेक का प्रयोग करते हैं और उनके निर्णय परिणामों को प्रभावित करते हैं। यह निर्वाचक भेद की धारणा को कमजोर करता है।
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ड्वाइट वाल्डो और तटस्थता की चुनौती
ड्वाइट वाल्डो ने राजनीति–प्रशासन भेद की सबसे प्रभावशाली आलोचना की। उन्होंने The Administrative State में यह तर्क दिया कि दक्षता भी स्वयं एक मूल्य है, और इसे तटस्थ नहीं माना जा सकता।
वाल्डो के अनुसार सार्वजनिक प्रशासन लोकतांत्रिक संदर्भ में कार्य करता है, जो संविधानिक मूल्यों, सामाजिक लक्ष्यों और नैतिक प्रतिबद्धताओं से गहराई से जुड़ा होता है। प्रशासन की राजनीतिक प्रकृति को नकारना इसके वास्तविक सामाजिक प्रभाव को छुपाने जैसा है।
समकालीन शासन और सीमा का धुंधलापन
वर्तमान शासन में राजनीति–प्रशासन भेद काफी हद तक असंगत प्रतीत होता है। नीति निर्माण में विभिन्न नेटवर्क शामिल हैं, जैसे प्रशासनिक अधिकारी, विशेषज्ञ, नागरिक समाज और अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ। प्रशासक नीतियों के डिजाइन, सलाह और कार्यान्वयन में सक्रिय भूमिका निभाते हैं।
साथ ही, राजनीतिक नेतृत्व प्रशासनिक प्रक्रियाओं में प्रदर्शन प्रबंधन, अनुबंध-शासन और सार्वजनिक-निजी साझेदारी के माध्यम से हस्तक्षेप करता है। यह परस्पर अंतर्संबंध कठोर भेद को व्यावहारिक रूप से असंभव बनाता है।
भेद की पुनः व्याख्या
भले ही इसे व्यापक आलोचना का सामना करना पड़ा, राजनीति–प्रशासन भेद पूरी तरह अप्रासंगिक नहीं हुआ। आधुनिक विद्वान इसे अब कठोर empiricism के बजाय नैतिक मार्गदर्शक सिद्धांत के रूप में देखते हैं। यह अत्यधिक राजनीतिक हस्तक्षेप से बचने और पेशेवर अखंडता बनाए रखने के लिए एक चेतावनी का कार्य करता है।
इस अर्थ में, यह आज भी नौकरशाही की तटस्थता, प्रशासनिक नैतिकता और लोकतांत्रिक जवाबदेही पर चर्चा को प्रभावित करता है।
निष्कर्ष (Conclusion)
राजनीति–प्रशासन भेद सार्वजनिक प्रशासन के वैचारिक इतिहास में एक महत्वपूर्ण चरण है। हालांकि इसका कड़ाई से अलगाव का दावा व्यापक रूप से अस्वीकार्य हो गया है, इसका ऐतिहासिक महत्व नौकरशाही पेशेवर बनाने, दक्षता बढ़ाने और प्रशासनिक सुधारों को बढ़ावा देने में है।
भेद को किसी दोषपूर्ण सिद्धांत के रूप में न देखकर इसे उस समय की प्रशासनिक चुनौतियों के प्रति एक संदर्भगत प्रतिक्रिया के रूप में समझना चाहिए। इसका उत्तराधिकार प्रशासन, मूल्य और लोकतांत्रिक शासन के बीच बहसों में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।
References / Suggested Readings
- Woodrow Wilson, The Study of Administration (1887)
- Max Weber, Economy and Society
- Dwight Waldo, The Administrative State
- Herbert A. Simon, Administrative Behavior
- Nicholas Henry, Public Administration and Public Affairs
- Fadia & Fadia, Public Administration
FAQs
Q1. क्या राजनीति–प्रशासन भेद आज भी प्रासंगिक है?
कड़ाई से अलगाव नहीं, लेकिन पेशेवर नौकरशाही और राजनीतिक हस्तक्षेप पर नियंत्रण के नैतिक सिद्धांत के रूप में प्रासंगिक है।
Q2. राजनीति–प्रशासन भेद किसने सबसे पहले प्रस्तावित किया?
वुडरो विल्सन ने 1887 में अपने निबंध The Study of Administration में इसे व्यवस्थित रूप से प्रस्तुत किया।
Q3. भेद की आलोचना क्यों हुई?
प्रशासनिक निर्णयों में विवेक और मूल्य-सापेक्ष निर्णय शामिल होते हैं, जिससे शुद्ध तटस्थता और कठोर अलगाव असंभव होते हैं।