दाँव पर क्या है? बहस की प्रकृति
(What’s at Stake? The Nature of the Debate)
अंतरराष्ट्रीय संबंध (International Relations – IR) में जेंडर पर होने वाली बहस एक बुनियादी प्रश्न उठाती है—जब वैश्विक राजनीति का अध्ययन जेंडर को नज़रअंदाज़ करके किया जाता है, तो हम क्या खो देते हैं? नारीवादी विद्वानों का तर्क है कि परंपरागत IR सिद्धांत—विशेषकर यथार्थवाद (realism) और उदार संस्थागतवाद (liberal institutionalism)—ऐसी जेंडर आधारित मान्यताओं पर खड़े हैं जो राज्य, सैन्य शक्ति और अभिजन निर्णय-निर्माण को प्राथमिकता देती हैं, जबकि स्त्रियों के अनुभवों और सत्ता के दैनिक रूपों को लगभग अदृश्य बना देती हैं। इसलिए यहाँ दाँव पर केवल स्त्रियों को अध्ययन में शामिल करने का प्रश्न नहीं है, बल्कि IR की अवधारणाओं, पद्धतियों और उद्देश्यों का पुनर्विचार है।
यह इकाई इस बहस की प्रकृति को स्पष्ट करती है—क्यों जेंडर IR में मायने रखता है, नारीवादी आलोचनाएँ मुख्यधारा के दृष्टिकोणों को कैसे चुनौती देती हैं, और इस हस्तक्षेप के सैद्धांतिक व राजनीतिक निहितार्थ क्या हैं।
परंपरागत अंतरराष्ट्रीय संबंधों की सीमाएँ
पारंपरिक IR ने राज्यों को तर्कसंगत और एकीकृत इकाइयों के रूप में देखा है, जो अराजक अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में कार्य करती हैं। सुरक्षा, शक्ति और संप्रभुता जैसी अवधारणाओं को वस्तुनिष्ठ और जेंडर-निरपेक्ष माना गया। नारीवादी विद्वान इस तटस्थता को चुनौती देते हैं और तर्क देते हैं कि ये ढाँचे अंतर्निहित रूप से पुरुषवादी (masculinist) हैं—वे स्वायत्तता, आक्रामकता, तर्कशीलता और नियंत्रण जैसे गुणों को महत्व देते हैं, जबकि देखभाल, परस्पर निर्भरता और असुरक्षा को कमतर आँकते हैं।
युद्ध, कूटनीति और ‘उच्च राजनीति’ पर ज़ोर देकर मुख्यधारा का IR सामाजिक पुनरुत्पादन, घरेलू श्रम और दैनिक असुरक्षाओं को हाशिए पर डाल देता है—वह क्षेत्र जहाँ जेंडर आधारित सत्ता-संबंध सबसे स्पष्ट दिखाई देते हैं। परिणामस्वरूप, स्त्रियों और अन्य हाशिए के समूहों के जीवित अनुभव विश्लेषण से बाहर रह जाते हैं, जबकि वैश्विक राजनीति उनके जीवन को गहराई से प्रभावित करती है।
इस प्रकार बहस की शुरुआत बहिष्कार की आलोचना से होती है—कौन और क्या ‘अंतरराष्ट्रीय’ माना जाता है, और किस ज्ञान को वैध समझा जाता है।
जेंडर क्यों मायने रखता है: नारीवादी हस्तक्षेप
नारीवादी IR विद्वानों के अनुसार जेंडर कोई अतिरिक्त चर (add-on variable) नहीं, बल्कि वैश्विक राजनीति का निर्माणकारी तत्व है। जेंडर पहचान, संस्थानों और प्रथाओं—सैन्य संगठन, शांति वार्ताएँ, विकास नीतियाँ और प्रवासन व्यवस्थाएँ—सभी को संरचित करता है।
J. Ann Tickner ने दिखाया है कि IR की केंद्रीय अवधारणाएँ जेंडर से युक्त हैं। उदाहरण के लिए, राष्ट्रीय सुरक्षा को अक्सर सैन्यीकृत पुरुषत्व के माध्यम से परिभाषित किया जाता है, जहाँ क्षेत्रीय रक्षा को मानव सुरक्षा पर वरीयता दी जाती है। इसी तरह, संप्रभुता को स्वायत्तता और नियंत्रण के रूप में कल्पित किया जाता है, जिससे परस्पर निर्भरता और देखभाल अदृश्य हो जाती है।
Cynthia Enloe यह उजागर करती हैं कि वैश्विक राजनीति स्त्रियों के श्रम पर निर्भर करती है—कारखानों की मज़दूर, घरेलू कामगार, नर्सें और यहाँ तक कि सैनिकों की पत्नियाँ—लेकिन इन भूमिकाओं को राजनीतिक दृश्यता नहीं मिलती। नारीवादी विश्लेषण उन छिपे हुए जेंडरयुक्त श्रम को सामने लाता है जो अंतरराष्ट्रीय व्यवस्थाओं को टिकाए रखते हैं।
ज्ञान, सत्ता और ज्ञानमीमांसीय दाँव
इस बहस का एक केंद्रीय पक्ष ज्ञान-उत्पादन से जुड़ा है। नारीवादी विद्वान इस दावे को चुनौती देते हैं कि IR मूल्य-निरपेक्ष और पूर्णतः वस्तुनिष्ठ हो सकता है। उनके अनुसार, ज्ञान की वैधता सत्ता-संबंधों—जिनमें जेंडर पदानुक्रम भी शामिल हैं—से आकार लेती है।
‘स्टैंडपॉइंट एपिस्टेमोलॉजी’ को केंद्र में रखकर नारीवादी IR यह आग्रह करता है कि हाशिए की दृष्टियाँ—विशेषकर वैश्विक दक्षिण की स्त्रियों की—युद्ध, विकास और सुरक्षा के बारे में ऐसे महत्वपूर्ण अंतर्दृष्टि प्रदान करती हैं जिन्हें अभिजन-केंद्रित सिद्धांत नज़रअंदाज़ कर देते हैं। इससे यूरोप-केंद्रित और राज्य-केंद्रित आख्यानों का प्रभुत्व चुनौती में पड़ता है।
अतः यह बहस केवल नए विषय जोड़ने की नहीं, बल्कि IR के जानने और समझाने के तरीकों को रूपांतरित करने की है।
सुरक्षा की पुनर्व्याख्या: राज्यों से लोगों तक
इस बहस का एक सबसे महत्वपूर्ण दाँव सुरक्षा की पुनर्परिभाषा है। नारीवादी विद्वानों का तर्क है कि राज्य की सुरक्षा अपने-आप मानव सुरक्षा में परिवर्तित नहीं होती। सैन्यीकरण सीमाओं की रक्षा कर सकता है, पर स्त्रियों के लिए विस्थापन, यौन हिंसा और आर्थिक असुरक्षा को बढ़ा सकता है।
राज्य से लोगों की ओर ध्यान स्थानांतरित करके नारीवादी IR पारंपरिक सुरक्षा चिंतन के अंतर्विरोधों को उजागर करता है। राष्ट्रीय हित के नाम पर उचित ठहराई गई प्रथाएँ दैनिक असुरक्षाओं को गहरा कर सकती हैं। यह पुनर्विचार IR के नैतिक क्षितिज को विस्तृत करता है और वैश्विक राजनीति को दैनिक जीवन से जोड़ता है।
राजनीति, मानकता और मुक्ति
मुख्यधारा IR प्रायः स्वयं को वर्णनात्मक (descriptive) बताता है, न कि मानकात्मक (normative)। नारीवादी IR इस विभाजन को अस्वीकार करता है और तर्क देता है कि प्रत्येक सिद्धांत में निहित मूल्य होते हैं। नारीवादी परियोजना स्पष्ट रूप से मानकात्मक और मुक्ति-उन्मुख है—वह न केवल दुनिया की व्याख्या करना चाहती है, बल्कि अन्यायपूर्ण संरचनाओं को बदलना भी चाहती है।
इससे सिद्धांत और राजनीति के संबंध पर महत्वपूर्ण बहस खड़ी होती है। आलोचक नारीवादी IR को सक्रियतावाद कहते हैं। नारीवादी विद्वान प्रत्युत्तर देते हैं कि जेंडर आधारित अन्याय की अनदेखी करना भी स्वयं में एक राजनीतिक विकल्प है। यहाँ दाँव पर यह प्रश्न है कि IR नैतिक प्रश्नों से दूरी बनाए रखे या उनसे सीधे जुड़कर काम करे।
नारीवादी IR के भीतर विविधताएँ
यह बहस केवल मुख्यधारा बनाम नारीवादी के बीच नहीं, बल्कि नारीवाद के भीतर भी है। उदार, उग्र, उत्तर–औपनिवेशिक और अंतर्संबंधी (intersectional) नारीवाद सत्ता, एजेंसी और प्रतिरोध को भिन्न-भिन्न ढंग से समझते हैं। विशेष रूप से उत्तर–औपनिवेशिक नारीवाद ‘स्त्रियों के अनुभव’ को सार्वभौमिक बनाने से सावधान करता है और जेंडर को नस्ल, वर्ग, राष्ट्र और साम्राज्य के साथ जुड़ा हुआ दिखाता है।
ये आंतरिक बहसें नारीवादी IR को समृद्ध बनाती हैं और बहुविध नारीवादों को सामने लाती हैं, न कि किसी एकल नारीवादी स्वर को।
निष्कर्ष : अंतरराष्ट्रीय संबंधों का पुनर्संयोजन
जेंडर पर होने वाली बहस में दाँव पर स्वयं अंतरराष्ट्रीय संबंधों की परिभाषा है—उसके विषय, अवधारणाएँ, पद्धतियाँ और उद्देश्य। नारीवादी IR मुख्यधारा सिद्धांतों की जेंडरयुक्त नींव को उजागर करता है और दिखाता है कि वैश्विक राजनीति किस प्रकार दैनिक प्रथाओं और असमानताओं के माध्यम से संचालित होती है।
यह ज़ोर देकर कि जेंडर मायने रखता है, नारीवादी विद्वान IR को केवल राज्यों और युद्धों तक सीमित अनुशासन से आगे बढ़ाकर सत्ता, न्याय और जीवित अनुभव से जुड़ा क्षेत्र बनाते हैं। इस प्रकार यह बहस अंतरराष्ट्रीय संबंधों के विश्लेषणात्मक और नैतिक दायरे का विस्तार करने वाला एक निर्णायक हस्तक्षेप है।
संदर्भ (References)
- टिकनर, जे. ऐन, जेंडर इन इंटरनेशनल रिलेशन्स: फ़ेमिनिस्ट पर्सपेक्टिव्स ऑन अचीविंग ग्लोबल सिक्योरिटी
- एनलो, सिंथिया, बनानाज़, बीचेज़ एंड बेसिस
- सिल्वेस्टर, क्रिस्टीन, फ़ेमिनिस्ट थ्योरी एंड इंटरनेशनल रिलेशन्स
- पीटरसन, वी. स्पाइक, जेंडर्ड स्टेट्स
- हूपर, चार्लोट, मैनली स्टेट्स