युद्ध और शांति आंदोलनों में महिलाएँ
युद्ध और शांति आंदोलनों में महिलाएँ
(Women in War and Peace Movements)
युद्ध और शांति आंदोलनों में महिलाओं की भागीदारी इस धारणा को चुनौती देती है कि युद्ध करना और शांति स्थापित करना केवल पुरुषों का क्षेत्र है। नारीवादी विद्वानों का तर्क है कि महिलाएँ केवल संघर्ष की निष्क्रिय पीड़ित नहीं होतीं, बल्कि सक्रिय राजनीतिक कर्ता होती हैं, जिनके अनुभव, श्रम और सक्रियता ने युद्ध और शांति—दोनों को आकार दिया है। युद्ध और शांति आंदोलनों में महिलाओं की भूमिका का अध्ययन यह दिखाता है कि वैश्विक राजनीति में भागीदारी, मान्यता और वैधता किस प्रकार जेंडर द्वारा संरचित होती है।
यह इकाई सशस्त्र संघर्षों और शांति आंदोलनों में महिलाओं की भूमिका का विश्लेषण करती है और बताती है कि उनकी सहभागिता युद्ध, सुरक्षा और राजनीतिक परिवर्तन की जेंडरयुक्त प्रकृति को कैसे उजागर करती है।
युद्ध में महिलाएँ : केवल पीड़िता की छवि से आगे
पारंपरिक अंतरराष्ट्रीय संबंधों में युद्ध के संदर्भ में महिलाओं को अक्सर विस्थापन, यौन हिंसा और हानि की पीड़िता के रूप में चित्रित किया जाता है। यद्यपि ये अनुभव वास्तविक और महत्वपूर्ण हैं, नारीवादी विद्वान चेतावनी देते हैं कि महिलाओं की युद्धकालीन भूमिका को केवल पीड़ितत्व तक सीमित करना भ्रामक है।
महिलाएँ विभिन्न संघर्षों में लड़ाकों, सहायक कर्मियों, संगठकों और समुदायों को बनाए रखने वाली कर्ताओं के रूप में शामिल रही हैं। औपनिवेशिक-विरोधी आंदोलनों, क्रांतिकारी संघर्षों और गृहयुद्धों में उन्होंने हथियार उठाए, खुफिया जानकारी जुटाई, रसद संभाली और जनसमर्थन संगठित किया। इसके बावजूद, संघर्षोत्तर काल में उनकी भूमिकाएँ अक्सर पुरुष-केंद्रित राजनीतिक सत्ता की बहाली के साथ अदृश्य कर दी जाती हैं।
नारीवादी विश्लेषण महिलाओं की विविध भूमिकाओं को पहचानने पर ज़ोर देता है—बिना हिंसा का महिमामंडन किए और बिना संरचनात्मक बाधाओं की अनदेखी किए।
युद्ध में श्रम का जेंडरयुक्त विभाजन
युद्ध एक विशिष्ट जेंडरयुक्त श्रम-विभाजन पैदा करता है। पुरुषों को योद्धा और रक्षक के रूप में गढ़ा जाता है, जबकि महिलाओं को देखभाल, पुनरुत्पादन और सहायक भूमिकाएँ सौंपी जाती हैं। इन भूमिकाओं को अक्सर “प्राकृतिक” बताया जाता है, जिससे उनका राजनीतिक महत्व छिप जाता है।
Cynthia Enloe दिखाती हैं कि महिलाओं का श्रम—घर संभालना, घायलों की देखभाल, कारखानों में काम करना या मनोबल बनाए रखना—युद्ध प्रयासों के लिए अनिवार्य है। फिर भी, इस श्रम को शायद ही कभी राजनीतिक या रणनीतिक माना जाता है।
यह अदृश्यता इस धारणा को मज़बूत करती है कि युद्ध केवल रणभूमि पर लड़ा जाता है, जबकि वास्तविकता में उसे संभव बनाने वाला अधिकांश काम दैनिक जीवन में होता है।
महिला लड़ाके और युद्धोत्तर हाशियाकरण
कई संघर्षों में महिलाओं ने सीधे लड़ाकों के रूप में भाग लिया है। इसके बावजूद, युद्ध के बाद की प्रक्रियाएँ—जैसे निरस्त्रीकरण और पुनर्वास—अक्सर पुरुष लड़ाकों को ध्यान में रखकर बनाई जाती हैं, जिससे महिला लड़ाके अदृश्य हो जाती हैं।
हथियार उठाने वाली महिलाओं को जेंडर मानदंडों का उल्लंघन करने के कारण सामाजिक कलंक का सामना भी करना पड़ता है। नागरिक जीवन में उनकी वापसी प्रायः चुप्पी और बहिष्कार से चिह्नित होती है, क्योंकि राष्ट्रवादी कथाएँ पारंपरिक स्त्रीत्व को पुनः स्थापित कर देती हैं।
ये प्रवृत्तियाँ दिखाती हैं कि युद्ध जेंडर भूमिकाओं को अस्थायी रूप से चुनौती दे सकता है, लेकिन शांति अक्सर पितृसत्तात्मक सामान्यता को बहाल कर देती है।
शांति कार्यकर्ता के रूप में महिलाएँ
विश्वभर में शांति आंदोलनों में महिलाओं की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। शांति सक्रियता ने महिलाओं को राजनीतिक भागीदारी का वह स्थान दिया, जहाँ औपचारिक संस्थानों ने उन्हें अक्सर बाहर रखा।
महिलाओं के शांति आंदोलन प्रायः संवाद, सुलह और सामाजिक न्याय पर बल देते हैं, न कि सैन्य विजय पर। लापता लोगों की माताएँ, परमाणु-विरोधी कार्यकर्ता और जमीनी शांति नेटवर्क—सभी ने युद्ध की मानवीय कीमतों को सामने रखकर सैन्यवाद को चुनौती दी है।
Cynthia Cockburn के अनुसार, महिलाओं की शांति सक्रियता पितृसत्ता, राष्ट्रवाद और सैन्यवाद के अंतर्संबंधों को उजागर करती है और दैनिक जीवन में निहित सुरक्षा की वैकल्पिक कल्पनाएँ प्रस्तुत करती है।
मातृत्व की राजनीति और नैतिक प्राधिकार
कई शांति आंदोलनों में महिलाओं की मातृत्व पहचान को राजनीतिक साधन के रूप में इस्तेमाल किया गया है। यह “मातृत्व की राजनीति” महिलाओं को नैतिक प्राधिकार देती है, जिससे वे उन संदर्भों में भी हिंसा के विरुद्ध बोल पाती हैं जहाँ प्रत्यक्ष राजनीतिक असहमति जोखिमपूर्ण होती है।
हालाँकि यह रणनीति सशक्तिकरण प्रदान कर सकती है, नारीवादी विद्वान इसकी सीमाओं की ओर भी संकेत करते हैं। यह पारंपरिक जेंडर भूमिकाओं को मज़बूत कर सकती है और उन महिलाओं को बाहर कर सकती है जो मातृत्व पहचान में फिट नहीं बैठतीं।
इस प्रकार शांति सक्रियता में महिलाओं को जेंडर भूमिकाओं का रणनीतिक उपयोग और उन्हें चुनौती देने—दोनों के बीच संतुलन साधना पड़ता है।
शांति प्रक्रियाओं पर नारीवादी आलोचना
नारीवादी विद्वान औपचारिक शांति प्रक्रियाओं की आलोचना करते हैं, क्योंकि उनमें महिलाओं की आवाज़ें अक्सर हाशिए पर रहती हैं। शांति वार्ताएँ प्रायः पुरुष राजनीतिक और सैन्य अभिजात वर्ग के वर्चस्व में होती हैं, भले ही संघर्ष के दौरान महिलाओं ने केंद्रीय भूमिकाएँ निभाई हों।
इस बहिष्कार के ठोस परिणाम होते हैं। जिन शांति समझौतों में जेंडरयुक्त अनुभवों को शामिल नहीं किया जाता, वे यौन हिंसा, विस्थापन और आर्थिक असुरक्षा जैसे मुद्दों को संबोधित करने में विफल रहते हैं—जिससे दीर्घकालिक स्थिरता प्रभावित होती है।
नारीवादी IR का तर्क है कि समावेशी शांति प्रक्रियाएँ न केवल अधिक न्यायपूर्ण होती हैं, बल्कि अधिक टिकाऊ भी।
वैश्विक नारीवादी शांति आंदोलन
अंतरराष्ट्रीय नारीवादी नेटवर्कों ने स्थानीय संघर्षों को युद्ध, सैन्यवाद और परमाणु हथियारों के विरुद्ध वैश्विक अभियानों से जोड़ा है। ये आंदोलन IR के राज्य-केंद्रित तर्क को चुनौती देते हुए सीमाओं के पार एकजुटता पर बल देते हैं।
महिलाओं की अंतरराष्ट्रीय शांति सक्रियता यह दिखाती है कि राजनीतिक एजेंसी केवल राज्यों और औपचारिक संस्थानों तक सीमित नहीं होती, बल्कि अधोराज्य (transnational) स्तर पर भी कार्य करती है।
जेंडर लेंस से युद्ध और शांति पर पुनर्विचार
युद्ध और शांति आंदोलनों में महिलाओं का अध्ययन IR की केंद्रीय अवधारणाओं पर पुनर्विचार के लिए बाध्य करता है। युद्ध केवल रणनीति और युद्धकला का प्रश्न नहीं, बल्कि सामाजिक संबंधों और जेंडरयुक्त श्रम में निहित प्रक्रिया है। शांति केवल युद्ध की अनुपस्थिति नहीं, बल्कि न्याय, मान्यता और सामाजिक रूपांतरण की सतत प्रक्रिया है।
J. Ann Tickner के अनुसार, टिकाऊ शांति के लिए उन संरचनात्मक असमानताओं को संबोधित करना आवश्यक है जो हिंसा को जन्म देती हैं।
निष्कर्ष : महिलाएँ, एजेंसी और रूपांतरणकारी राजनीति
युद्ध और शांति आंदोलनों में महिलाओं की भागीदारी वैश्विक राजनीति के पारंपरिक, पुरुष-केंद्रित आख्यानों की सीमाएँ उजागर करती है। महिलाएँ न तो स्वभावतः अहिंसक होती हैं और न ही केवल पीड़ित; वे जटिल राजनीतिक कर्ता हैं, जो सीमित विकल्पों के बीच निर्णय लेती हैं।
नारीवादी IR महिलाओं की एजेंसी को रेखांकित करते हुए उन जेंडरयुक्त संरचनाओं की आलोचना करता है जो युद्ध और शांति को आकार देती हैं। महिलाओं के अनुभवों और सक्रियता को केंद्र में रखकर यह दृष्टि अंतरराष्ट्रीय संबंधों के विश्लेषणात्मक दायरे का विस्तार करती है और अधिक समावेशी व रूपांतरणकारी सुरक्षा एवं शांति की ओर संकेत करती है।
संदर्भ (References)
- एनलो, सिंथिया, Bananas, Beaches and Bases
- कॉकबर्न, सिंथिया, From Where We Stand: War, Women’s Activism and Feminist Analysis
- टिकनर, जे. ऐन, Gender in International Relations
- सिल्वेस्टर, क्रिस्टीन, War as Experience
- युवाल-डेविस, नीरा, Gender and Nation