नागरिकता अधिकार
नागरिकता अधिकार राज्य और व्यक्ति के बीच संबंध का मूल आधार होते हैं। जम्मू और कश्मीर के संदर्भ में नागरिकता केवल एक कानूनी दर्जा नहीं थी, बल्कि यह इतिहास, पहचान, स्वायत्तता और राजनीतिक विश्वास से गहराई से जुड़ी हुई अवधारणा बन गई। भारत के अन्य राज्यों के विपरीत, जम्मू और कश्मीर में नागरिकता अधिकार केवल भारतीय संविधान से नहीं, बल्कि राज्य के अपने संविधान और स्थायी निवासी (Permanent Resident) की अवधारणा से भी निर्धारित होते थे।
इसी कारण जम्मू और कश्मीर में नागरिकता एक स्तरीकृत, विशिष्ट और विवादग्रस्त अवधारणा के रूप में विकसित हुई।
नागरिकता: वैचारिक परिप्रेक्ष्य
राजनीतिक सिद्धांत में नागरिकता का अर्थ किसी राजनीतिक समुदाय की औपचारिक सदस्यता से है। इसके अंतर्गत तीन प्रमुख आयाम शामिल होते हैं—
- नागरिक अधिकार – जीवन, स्वतंत्रता और विधि के समक्ष समानता
- राजनीतिक अधिकार – मतदान, प्रतिनिधित्व और शासन में भागीदारी
- सामाजिक–आर्थिक अधिकार – आजीविका, सुरक्षा और कल्याण
नागरिकता अधिकारों के साथ-साथ दायित्वों की भी अपेक्षा करती है। यह राज्य और नागरिकों के बीच पारस्परिक विश्वास पर आधारित संबंध को दर्शाती है।
जम्मू और कश्मीर में नागरिकता इस सामान्य परिभाषा से आगे बढ़कर क्षेत्रीय पहचान और स्वायत्तता का प्रतीक बन गई।
भारतीय संविधान के अंतर्गत नागरिकता
Constitution of India के अनुसार नागरिकता एक एकीकृत और समान दर्जा है, जो पूरे भारत में लागू होता है। भारतीय नागरिकों को—
- क़ानून के समक्ष समानता
- देश में कहीं भी आने–जाने और निवास करने की स्वतंत्रता
- राजनीतिक सहभागिता का अधिकार
- मौलिक अधिकारों का संरक्षण
प्राप्त है।
इस दृष्टि से जम्मू और कश्मीर के निवासी भी पूर्ण भारतीय नागरिक थे और उन्हें संसद में प्रतिनिधित्व तथा सर्वोच्च न्यायालय तक पहुँच प्राप्त थी।
परंतु राज्य स्तर पर यह समान नागरिकता विशेष संवैधानिक प्रावधानों के कारण सीमित और विशिष्ट हो जाती थी।
राज्य संविधान और स्थायी निवासी की अवधारणा
Constitution of Jammu and Kashmir ने स्थायी निवासी (Permanent Residents) की अवधारणा को परिभाषित किया। यही अवधारणा राज्य में नागरिकता अधिकारों का आधार बनी।
स्थायी निवासियों को निम्न विशेष अधिकार प्राप्त थे—
- भूमि और अचल संपत्ति का स्वामित्व
- राज्य सरकार की नौकरियों में प्राथमिकता
- राज्य में स्थायी निवास का अधिकार
- कुछ शैक्षिक और सामाजिक लाभ
इन प्रावधानों का उद्देश्य राज्य की आर्थिक संरचना, जनसांख्यिकीय संतुलन और सांस्कृतिक पहचान की रक्षा करना था।
नागरिकता अधिकार और राज्य स्वायत्तता
जम्मू और कश्मीर में नागरिकता अधिकारों को राज्य की स्वायत्तता से गहराई से जोड़ा गया। स्थायी निवासी व्यवस्था के माध्यम से—
- बाहरी जनसंख्या के बड़े पैमाने पर बसने को रोका गया
- भूमि और संसाधनों पर स्थानीय नियंत्रण बनाए रखा गया
- क्षेत्रीय पहचान को संवैधानिक सुरक्षा दी गई
इस प्रकार नागरिकता अधिकार स्वशासन और राजनीतिक आश्वासन का उपकरण बन गए।
राजनीतिक अधिकार और लोकतांत्रिक भागीदारी
नागरिकता का एक महत्वपूर्ण पक्ष राजनीतिक अधिकार है। जम्मू और कश्मीर के नागरिकों को—
- राज्य और राष्ट्रीय चुनावों में मतदान का अधिकार
- निर्वाचित संस्थाओं में प्रतिनिधित्व
- राजनीतिक दलों और आंदोलनों में भागीदारी
प्राप्त थी।
किन्तु चुनावी प्रक्रियाओं में व्यवधान, राजनीतिक हस्तक्षेप और संस्थागत संकटों ने नागरिकता और लोकतांत्रिक भागीदारी के बीच संबंध को कमजोर किया।
इससे नागरिकों के लिए अधिकार अक्सर औपचारिक रह गए, जबकि वास्तविक राजनीतिक प्रभाव सीमित रहा।
लिंग और नागरिकता अधिकार
नागरिकता अधिकारों के भीतर भी आंतरिक असमानताएँ मौजूद थीं, विशेषकर लैंगिक आधार पर। लंबे समय तक—
- महिलाओं को स्थायी निवासी दर्जा स्थानांतरित करने में बाधाएँ
- संपत्ति और रोज़गार से जुड़े अधिकारों पर प्रतिबंध
का सामना करना पड़ा।
न्यायिक हस्तक्षेपों के बाद इनमें सुधार हुआ, परंतु यह बहस दर्शाती है कि नागरिकता किस प्रकार पितृसत्तात्मक मान्यताओं से प्रभावित हो सकती है।
पहचान, नागरिकता और राजनीतिक संबद्धता
जम्मू और कश्मीर में नागरिकता केवल कानूनी सदस्यता नहीं थी, बल्कि—
- सांस्कृतिक पहचान
- ऐतिहासिक स्मृति
- राजनीतिक आकांक्षाओं
से जुड़ी हुई थी।
राष्ट्रीय नागरिकता और क्षेत्रीय पहचान के बीच तनाव ने नागरिकता को राजनीतिक संघर्ष का केंद्र बना दिया।
संघर्ष, सुरक्षा और नागरिकता
लंबे समय से चले आ रहे संघर्ष और सैन्यीकरण ने नागरिकता के अनुभव को और जटिल बना दिया।
- नागरिक स्वतंत्रताओं पर प्रतिबंध
- निगरानी और सुरक्षा क़ानून
- विस्थापन और पलायन
ने नागरिकता को कई बार काग़ज़ी अधिकार तक सीमित कर दिया, जहाँ कानूनी दर्जा तो था, पर अधिकारों का पूर्ण उपभोग नहीं।
विशेष नागरिकता प्रावधानों का क्षरण
समय के साथ राज्य की विशिष्ट नागरिकता व्यवस्था में कमी आई—
- केंद्रीय क़ानूनों के विस्तार से
- संवैधानिक आदेशों के माध्यम से
- बढ़ते केंद्रीय हस्तक्षेप के कारण
इससे राष्ट्रीय नागरिकता और क्षेत्रीय सुरक्षा के बीच संतुलन बदल गया और संवैधानिक विश्वास पर प्रश्न खड़े हुए।
संघीय दृष्टिकोण से नागरिकता
संघवाद के दृष्टिकोण से जम्मू और कश्मीर भिन्नीकृत नागरिकता (Differentiated Citizenship) का उदाहरण था, जहाँ समान राष्ट्रीय नागरिकता के साथ क्षेत्र-विशेष अधिकार मौजूद थे।
ऐसी व्यवस्थाएँ विविधता को संभाल सकती हैं, पर वे तब कमजोर हो जाती हैं जब—
- लोकतांत्रिक वैधता कमज़ोर हो
- संस्थागत स्वायत्तता घटे
- राजनीतिक संवाद टूट जाए
निष्कर्ष
जम्मू और कश्मीर में नागरिकता अधिकार एक स्थिर संवैधानिक तथ्य नहीं, बल्कि एक निरंतर राजनीतिक प्रक्रिया रहे हैं। इतिहास, पहचान और स्वायत्तता ने नागरिकता को साधारण कानूनी दर्जे से आगे बढ़ाकर राजनीतिक मोलभाव का क्षेत्र बना दिया।
यद्यपि विशेष नागरिकता प्रावधानों का उद्देश्य स्थानीय हितों और पहचान की रक्षा करना था, परंतु लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं की कमजोरी और शासन की असंगतियों ने उनकी वैधता को क्षति पहुँचाई।
जम्मू और कश्मीर का अनुभव यह दर्शाता है कि नागरिकता तभी सार्थक होती है, जब वह क़ानूनी अधिकारों, वास्तविक राजनीतिक भागीदारी और मानवीय गरिमा—तीनों को एक साथ सुनिश्चित करे। अंततः नागरिकता राज्य और समाज के बीच विश्वासपूर्ण संबंध की अभिव्यक्ति होनी चाहिए, न कि केवल संवैधानिक लेबल।
संदर्भ (References)
- Constitution of India
- Constitution of Jammu and Kashmir, 1957
- Noorani, A.G. Article 370: A Constitutional History of Jammu and Kashmir
- Bose, Sumantra. Kashmir: Roots of Conflict, Paths to Peace
- T.H. Marshall, Citizenship and Social Class