जेंडर, संघर्ष और बलात् प्रवासन
जेंडर, संघर्ष और बलात् प्रवासन
(Gender, Conflict and Forced Migration)
बलात् प्रवासन (Forced Migration) समकालीन वैश्विक राजनीति में हिंसक संघर्षों का सबसे प्रत्यक्ष और गंभीर परिणाम है। युद्ध, गृहयुद्ध, जातीय हिंसा और राजनीतिक दमन के कारण लाखों लोग अपने घरों से विस्थापित होकर सीमाओं के पार या अपने ही देशों के भीतर शरण लेने को मजबूर होते हैं। नारीवादी विद्वानों का तर्क है कि बलात् प्रवासन कोई जेंडर-निरपेक्ष प्रक्रिया नहीं है; बल्कि संघर्ष और विस्थापन को महिलाएँ, पुरुष और जेंडर अल्पसंख्यक अलग-अलग तरीकों से अनुभव करते हैं, क्योंकि समाज पहले से ही असमान सत्ता-संबंधों से संरचित होता है।
यह इकाई जेंडर, संघर्ष और बलात् प्रवासन के आपसी संबंधों का विश्लेषण करती है और दिखाती है कि नारीवादी अंतरराष्ट्रीय संबंध (IR) किस प्रकार शरणार्थियों, सुरक्षा और मानवीय शासन की पारंपरिक समझ का विस्तार करता है।
जेंडरयुक्त प्रक्रिया के रूप में संघर्ष
हिंसक संघर्ष स्वयं एक जेंडरयुक्त प्रक्रिया है। युद्ध उन समाजों में लड़े जाते हैं जहाँ पहले से ही जेंडर असमानताएँ मौजूद होती हैं, और वही असमानताएँ यह निर्धारित करती हैं कि कौन लड़ता है, कौन पलायन करता है और कौन जीवन को बचाए रखने का बोझ उठाता है।
अक्सर पुरुषों को जबरन भर्ती, हिरासत या हत्या का सामना करना पड़ता है, जबकि महिलाएँ यौन हिंसा, विस्थापन और देखभाल की ज़िम्मेदारियों के जोखिम में होती हैं। नारीवादी विद्वान बताते हैं कि संघर्ष सामाजिक मानदंडों को निलंबित नहीं करता, बल्कि कई बार पितृसत्तात्मक नियंत्रण को और तीव्र कर देता है।
इसलिए बलात् प्रवासन को समझने के लिए यह देखना आवश्यक है कि संघर्ष जेंडर-विशिष्ट असुरक्षाएँ और जीवित रहने की रणनीतियाँ कैसे पैदा करता है।
तटस्थ श्रेणियों से आगे : बलात् प्रवासन
मुख्यधारा IR और शरणार्थी अध्ययन अक्सर शरणार्थियों और आंतरिक रूप से विस्थापित व्यक्तियों (IDPs) को समरूप समूह मानते हैं और आँकड़ों, सीमाओं तथा कानूनी दर्जे पर ध्यान केंद्रित करते हैं। नारीवादी IR इस दृष्टिकोण की आलोचना करता है, क्योंकि यह छिपा देता है कि विस्थापन को जेंडर कैसे आकार देता है।
पलायन के दौरान महिलाएँ अक्सर बच्चों, बुज़ुर्गों और घायलों की ज़िम्मेदारी उठाती हैं, जिससे उनकी गतिशीलता सीमित हो जाती है और शोषण का खतरा बढ़ता है। दूसरी ओर, पुरुषों को सुरक्षा प्रोफाइलिंग, भर्ती के डर या सीमा-नियंत्रण के कारण रोक दिया जाता है। इस प्रकार जेंडर यह तय करता है कि कौन, कैसे और किस कीमत पर पलायन कर पाता है।
बलात् प्रवासन केवल स्थान-परिवर्तन नहीं, बल्कि जेंडरयुक्त सत्ता-संबंधों में निहित एक सामाजिक प्रक्रिया है।
जेंडर आधारित हिंसा और विस्थापन
बलात् प्रवासन का सबसे गंभीर जेंडरयुक्त परिणाम जेंडर आधारित हिंसा है। यौन हिंसा को अक्सर युद्ध की रणनीति के रूप में इस्तेमाल किया जाता है—आबादी को आतंकित करने और विस्थापन को मजबूर करने के लिए। पलायन के दौरान और शरणार्थी शिविरों में भी महिलाएँ और लड़कियाँ उत्पीड़न, तस्करी और शोषण के प्रति अत्यंत संवेदनशील रहती हैं।
नारीवादी विद्वानों के अनुसार यह हिंसा आकस्मिक नहीं, बल्कि संघर्ष और सैन्यीकरण से संरचनात्मक रूप से जुड़ी होती है। सामाजिक सुरक्षा के ढहने, सशस्त्र उपस्थिति और दंडमुक्ति की स्थितियाँ मिलकर गहरी असुरक्षा पैदा करती हैं।
परंपरागत सुरक्षा ढाँचे इन अनुभवों को मानवीय “समस्याओं” के रूप में देखते हैं, न कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति के केंद्रीय प्रश्नों के रूप में।
महिलाएँ, देखभाल कार्य और जीविका रणनीतियाँ
विस्थापन महिलाओं पर देखभाल कार्य का बोझ कई गुना बढ़ा देता है। अस्थिर परिस्थितियों में उन्हें भोजन, आश्रय, स्वास्थ्य और शिक्षा की व्यवस्था करनी पड़ती है। यह श्रम समुदायों के अस्तित्व के लिए अनिवार्य है, फिर भी नीति-निर्माण में अक्सर अदृश्य रहता है।
साथ ही, विस्थापन कुछ सीमित अवसरों पर एजेंसी भी खोलता है। कई महिलाएँ परिवार की मुखिया बनती हैं, अनौपचारिक अर्थव्यवस्थाओं में प्रवेश करती हैं और सामुदायिक सहयोग नेटवर्क खड़े करती हैं। नारीवादी IR इस असुरक्षा और एजेंसी के द्वंद्व को रेखांकित करता है और शरणार्थी महिलाओं को केवल निष्क्रिय पीड़ित मानने से इंकार करता है।
पुरुषत्व, संघर्ष और विस्थापन
नारीवादी विश्लेषण यह भी देखता है कि बलात् प्रवासन पुरुषों और पुरुषत्व को कैसे प्रभावित करता है। संघर्ष पुरुषों की “पालनकर्ता” और “संरक्षक” की सामाजिक भूमिकाओं को बाधित करता है। विस्थापन में बेरोज़गारी, दर्जे की हानि और सुरक्षा-खतरे के रूप में अपराधीकरण आम है।
ये दबाव आघात (trauma) और कुंठा पैदा कर सकते हैं, जिनके परिणाम कभी-कभी विस्थापित समुदायों के भीतर हिंसा के रूप में सामने आते हैं। पुरुषों पर पड़ने वाले जेंडर प्रभावों को पहचानना रूढ़ छवियों को चुनौती देता है और विस्थापन की समग्र समझ विकसित करता है।
शरणार्थियों का सिक्यूरिटाइज़ेशन और जेंडरयुक्त नियंत्रण
समकालीन वैश्विक राजनीति में बलात् प्रवासन का बढ़ता हुआ सिक्यूरिटाइज़ेशन देखा जाता है। शरणार्थियों को राष्ट्रीय सुरक्षा, सामाजिक एकता और आर्थिक स्थिरता के लिए खतरे के रूप में चित्रित किया जाता है, जिससे सीमा-सैन्यीकरण, हिरासत और कठोर शरण नीतियाँ वैध ठहराई जाती हैं।
नारीवादी विद्वान बताते हैं कि इसका प्रभाव जेंडरयुक्त होता है। महिलाओं की आवाजाही को “संरक्षण” के नाम पर सीमित किया जाता है, जबकि पुरुषों को संदेह और निगरानी का सामना करना पड़ता है। इस प्रकार जेंडर रूढ़ियाँ यह तय करती हैं कि कौन संरक्षण का पात्र माना जाएगा और कौन अपराधीकृत होगा।
सिक्यूरिटाइज़ेशन सुरक्षा देने के बजाय असुरक्षा को गहरा करता है।
मानवीय शासन और जेंडर
मानवीय सहायता प्रणालियाँ अक्सर तटस्थता का दावा करती हैं, किंतु नारीवादी आलोचनाएँ दिखाती हैं कि वे जेंडर पदानुक्रमों को पुनरुत्पादित करती हैं। शरणार्थी शिविरों की योजना कई बार महिलाओं की सुरक्षा, गोपनीयता और निर्णय-निर्माण में भागीदारी को नज़रअंदाज़ कर देती है।
नीतियाँ महिलाओं को राजनीतिक विषय के बजाय आश्रित के रूप में देखती हैं, जिससे पितृसत्तात्मक शासन मजबूत होता है। नारीवादी IR का तर्क है कि वास्तविक संरक्षण के लिए महिलाओं की भागीदारी, नेतृत्व और शांति-निर्माण में शामिल होना अनिवार्य है।
उत्तर–औपनिवेशिक नारीवादी दृष्टिकोण
उत्तर–औपनिवेशिक नारीवादी विद्वान बलात् प्रवासन को औपनिवेशिक इतिहासों, साम्राज्यवादी हस्तक्षेपों और वैश्विक असमानताओं के संदर्भ में रखते हैं। विस्थापन पैदा करने वाले कई संघर्ष बाहरी हस्तक्षेपों और हथियारों के प्रवाह से जुड़े होते हैं।
वैश्विक दक्षिण की महिलाओं को अक्सर असहाय पीड़िता के रूप में दिखाया जाता है, जबकि पश्चिमी राज्य स्वयं को उद्धारक के रूप में प्रस्तुत करते हैं। नारीवादी आलोचनाएँ इन कथाओं को उजागर करती हैं और स्थानीय प्रतिरोध व एजेंसी को सामने लाती हैं।
संरक्षण और सुरक्षा पर पुनर्विचार
नारीवादी IR राज्य-केंद्रित सुरक्षा से हटकर लोग-केंद्रित संरक्षण की वकालत करता है। इसमें विस्थापन के मूल कारणों—असमानता, सैन्यीकरण और बहिष्करण—को संबोधित करना शामिल है, न कि केवल सीमाओं पर ध्यान देना।
जेंडर-संवेदनशील दृष्टियाँ कानूनी अधिकारों, सुरक्षित प्रवासन मार्गों, आजीविका तक पहुँच और निर्णय-निर्माण में भागीदारी पर ज़ोर देती हैं। इस दृष्टि में सुरक्षा, गरिमा और सामाजिक न्याय से अलग नहीं है।
निष्कर्ष : अंतरराष्ट्रीय संबंधों में बलात् प्रवासन का जेंडरीकरण
जेंडर, संघर्ष और बलात् प्रवासन गहराई से जुड़े हुए हैं। विस्थापन संघर्ष से लेकर पलायन और पुनर्वास तक हर चरण में जेंडरयुक्त हिंसा, श्रम, पहचान और सत्ता-संबंधों से आकार लेता है।
नारीवादी IR यह स्पष्ट करता है कि बलात् प्रवासन को केवल आँकड़ों और सीमाओं के माध्यम से नहीं समझा जा सकता। जेंडरयुक्त अनुभवों और एजेंसी को केंद्र में रखकर नारीवादी दृष्टियाँ अंतरराष्ट्रीय संबंधों के विश्लेषणात्मक और नैतिक दायरे का विस्तार करती हैं और विस्थापन के प्रति अधिक न्यायपूर्ण और टिकाऊ प्रतिक्रियाओं की ओर संकेत करती हैं।
संदर्भ (References)
- टिकनर, जे. ऐन, Gender in International Relations
- एनलो, सिंथिया, Bananas, Beaches and Bases
- पीटरसन, वी. स्पाइक, Gendered States
- ट्रू, जैकी, The Political Economy of Violence against Women
- युवाल-डेविस, नीरा, Gender and Nation