राजनीतिक दल और दल प्रणाली: गठन, विकास और रूपांतरण
परिचय
राजनीतिक दल आधुनिक प्रतिनिधि लोकतंत्र की सबसे महत्वपूर्ण और स्थायी संस्थाओं में से एक हैं। वे समाज और राज्य के बीच सेतु का कार्य करते हैं—सामाजिक हितों को व्यक्त करना, मांगों का समेकन करना, नेतृत्व का चयन करना और राजनीतिक प्रतिस्पर्धा को संरचित करना राजनीतिक दलों के प्रमुख कार्य हैं। तुलनात्मक राजनीतिक विश्लेषण में दलों और दल प्रणाली का अध्ययन इसलिए केंद्रीय महत्व रखता है क्योंकि उनकी संरचना और प्रतिस्पर्धा का स्वरूप लोकतांत्रिक स्थिरता, शासन क्षमता और नीतिगत परिणामों को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित करता है।

तुलनात्मक राजनीति में दलों को स्थिर इकाइयों के रूप में नहीं, बल्कि ऐतिहासिक परिस्थितियों, सामाजिक विभाजनों और संस्थागत ढाँचों के प्रभाव में निरंतर विकसित होने वाली संस्थाओं के रूप में देखा जाता है। दल प्रणाली, समय के साथ दलों के बीच स्थापित होने वाले नियमित और संरचित संबंधों को प्रतिबिंबित करती है।
राजनीतिक दल की अवधारणा
राजनीतिक दल को सामान्यतः ऐसे संगठित समूह के रूप में परिभाषित किया जाता है जो चुनावी प्रतिस्पर्धा के माध्यम से सत्ता प्राप्त करने या उसमें भागीदारी का प्रयास करता है। किंतु इस न्यूनतम परिभाषा से आगे बढ़कर दल लोकतंत्र में कई महत्वपूर्ण कार्य करते हैं—राजनीतिक समाजीकरण, वैचारिक अभिव्यक्ति, हितों का समेकन और शासन को स्थायित्व प्रदान करना।
तुलनात्मक दृष्टिकोण यह दर्शाता है कि राजनीतिक दल सामाजिक संदर्भों से गहराई से जुड़े होते हैं। कुछ दल अभिजात वर्ग द्वारा संचालित संसदीय समूहों के रूप में उभरते हैं, जबकि अन्य वर्ग, धर्म या जातीय आधार पर संगठित जन-आधारित आंदोलन के रूप में विकसित होते हैं। इन विभिन्न रूपों का संबंध राजनीतिक विकास के अलग-अलग चरणों से होता है।
सामाजिक विभाजन और दल गठन
राजनीतिक दलों के गठन की एक प्रभावशाली व्याख्या सामाजिक विभाजन (social cleavage) सिद्धांत के माध्यम से की जाती है, जिसे सिमोर मार्टिन लिपसेट और स्टीन रोक्कन से जोड़ा जाता है। इस दृष्टिकोण के अनुसार, राजनीतिक दल समाज में मौजूद स्थायी विभाजनों—जैसे वर्ग, धर्म, भाषा, जातीयता और क्षेत्र—से उत्पन्न होते हैं। जब ये सामाजिक संघर्ष राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का रूप ले लेते हैं, तब दल प्रणाली का निर्माण होता है।
लिपसेट–रोक्कन का “फ्रीज़िंग परिकल्पना” यह तर्क देती है कि पश्चिमी यूरोप की दल प्रणालियाँ राष्ट्रीय और औद्योगिक क्रांतियों से उत्पन्न विभाजनों के इर्द-गिर्द स्थिर हो गई थीं। यद्यपि समकालीन परिवर्तन इस परिकल्पना को चुनौती देते हैं, फिर भी यह दल प्रणाली को समझने का एक महत्वपूर्ण आधार प्रदान करती है।
संस्थागत कारक और दल प्रणाली
दल प्रणाली के स्वरूप को निर्धारित करने में संस्थागत कारकों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। निर्वाचन प्रणाली विशेष रूप से निर्णायक प्रभाव डालती है। बहुमतवादी निर्वाचन प्रणाली सामान्यतः द्विदलीय प्रतिस्पर्धा को प्रोत्साहित करती है, जबकि अनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली बहुदलीय व्यवस्था को बढ़ावा देती है। इस संबंध को मौरिस डुवर्जे के प्रसिद्ध नियमों में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है।
इसके अतिरिक्त, संघीय संरचना, संवैधानिक व्यवस्था और कार्यपालिका–विधायिका संबंध भी दलों की संख्या, संगठन और वैचारिक स्वरूप को प्रभावित करते हैं। तुलनात्मक अध्ययन यह दर्शाता है कि संस्थागत ढाँचे सामाजिक विभाजनों को या तो तीव्र कर सकते हैं या उन्हें सीमित कर सकते हैं।
दल संगठन का विकास
समय के साथ राजनीतिक दलों की संगठनात्मक संरचना में महत्वपूर्ण परिवर्तन आए हैं। प्रारंभिक दौर में कैडर दल (cadre parties) अभिजात वर्ग तक सीमित थे और उनका संगठन ढीला था। सार्वभौमिक मताधिकार के विस्तार के साथ जन-दलों (mass parties) का उदय हुआ, जिनकी वैचारिक प्रतिबद्धता मजबूत थी और जिनका सामाजिक आधार व्यापक था।
बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में कैच-ऑल दलों (catch-all parties) का विकास हुआ, जिन्होंने वैचारिक कठोरता के बजाय व्यापक चुनावी समर्थन पर ध्यान केंद्रित किया। हाल के वर्षों में कार्टेल दलों की अवधारणा सामने आई है, जो राज्य संसाधनों पर निर्भर होते हैं और इससे लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व पर प्रश्न उठते हैं।
दल प्रणाली के प्रकार
दल प्रणालियों का वर्गीकरण सामान्यतः दलों की संख्या, शक्ति-संतुलन और वैचारिक दूरी के आधार पर किया जाता है। जियोवानी सार्तोरी की वर्गीकरण प्रणाली—प्रमुख दल प्रणाली, द्विदलीय प्रणाली, मध्यम बहुदलीय और ध्रुवीकृत बहुदलीय प्रणाली—तुलनात्मक अध्ययन में अत्यंत प्रभावशाली रही है।
यह वर्गीकरण केवल संख्या पर नहीं, बल्कि प्रतिस्पर्धा के स्वरूप और विपक्ष की भूमिका पर भी बल देता है। स्थिर दल प्रणालियाँ शासन में पूर्वानुमेयता प्रदान करती हैं, जबकि अत्यधिक विखंडन राजनीतिक अस्थिरता को जन्म दे सकता है।
रूपांतरण और असंलग्नता
समकालीन लोकतंत्रों में पारंपरिक दल-समर्थन कमजोर हुआ है। सामाजिक परिवर्तन, वैश्वीकरण और वर्ग आधारित पहचान के क्षरण ने दल प्रणालियों में असंलग्नता (dealignment) और चुनावी अस्थिरता को बढ़ावा दिया है। इसके परिणामस्वरूप नए दलों और आंदोलनों का उदय हुआ है।
लोकलुभावन और राष्ट्रवादी दलों ने पारंपरिक राजनीतिक अभिजात वर्ग के प्रति असंतोष को राजनीतिक समर्थन में परिवर्तित किया है। यह परिवर्तन दल प्रणाली सिद्धांतों के लिए नई चुनौतियाँ प्रस्तुत करता है।
राजनीतिक दल, लोकतंत्र और शासन
राजनीतिक दल लोकतांत्रिक शासन के लिए अनिवार्य बने हुए हैं, किंतु वे वैधता के संकट का भी सामना कर रहे हैं। दलों की सदस्यता में गिरावट, वैचारिक अस्पष्टता और राजनीति के व्यक्तिकरण ने उनके पारंपरिक स्वरूप को बदल दिया है।
फिर भी, तुलनात्मक शोध यह स्पष्ट करता है कि दल जवाबदेही, राजनीतिक समेकन और नीति निरंतरता के लिए आवश्यक हैं। कमजोर दल प्रणालियाँ अक्सर अस्थिर शासन और कमजोर लोकतांत्रिक संस्थाओं से जुड़ी होती हैं।
निष्कर्ष
राजनीतिक दल और दल प्रणाली का तुलनात्मक अध्ययन यह दर्शाता है कि दल सामाजिक विभाजनों, संस्थागत ढाँचों और ऐतिहासिक अनुभवों से निर्मित गतिशील संस्थाएँ हैं। उनका गठन, विकास और रूपांतरण व्यापक सामाजिक-राजनीतिक परिवर्तनों को प्रतिबिंबित करता है।
तुलनात्मक राजनीति के विद्यार्थियों के लिए दल प्रणाली का अध्ययन लोकतांत्रिक स्थिरता, प्रतिनिधित्व और राजनीतिक परिवर्तन को समझने का एक अनिवार्य माध्यम है।
संदर्भ / Suggested Readings
- Maurice Duverger – Political Parties
- Giovanni Sartori – Parties and Party Systems
- Seymour Martin Lipset & Stein Rokkan – Party Systems and Voter Alignments
- Peter Mair – Ruling the Void
- Katz & Mair – “Changing Models of Party Organization”
FAQs
1. राजनीतिक दल और दल प्रणाली में क्या अंतर है?
राजनीतिक दल एक संगठन है, जबकि दल प्रणाली दलों के बीच स्थापित नियमित प्रतिस्पर्धी संबंधों को दर्शाती है।
2. सामाजिक विभाजन दल गठन को कैसे प्रभावित करते हैं?
वे राजनीतिक समर्थन का सामाजिक आधार प्रदान करते हैं, जो दलों के रूप में संगठित होता है।
3. दल प्रणाली में परिवर्तन क्यों होते हैं?
सामाजिक परिवर्तन, संस्थागत सुधार, वैश्वीकरण और पहचान राजनीति इसके प्रमुख कारण हैं।
4. क्या आधुनिक लोकतंत्र में दल अभी भी प्रासंगिक हैं?
हाँ। चुनौतियों के बावजूद दल लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व और शासन के लिए अनिवार्य हैं।