मानव अधिकार – मुद्दे, चुनौतियाँ और समकालीन सरोकार:
दिव्यांगजन (Persons with Disabilities)
(भारतीय संदर्भ)
दिव्यांगजन मानव अधिकार विमर्श में उन वर्गों में शामिल हैं जिन्हें ऐतिहासिक रूप से हाशिए पर रखा गया, अदृश्य बनाया गया और निर्भरता की श्रेणी में रखा गया। दिव्यांगता को लंबे समय तक व्यक्तिगत कमी या चिकित्सकीय समस्या के रूप में देखा गया, जबकि मानव अधिकार दृष्टिकोण इसे सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक संरचनाओं से उत्पन्न समस्या मानता है। यह दृष्टिकोण समानता, गरिमा, स्वायत्तता और सहभागिता जैसे मूल मानव अधिकार प्रश्नों को केंद्र में लाता है।
भारत में संवैधानिक मूल्यों और प्रगतिशील क़ानूनों के बावजूद, दिव्यांगजन आज भी व्यापक भेदभाव और बहिष्करण का सामना करते हैं। उनकी स्थिति औपचारिक अधिकारों और वास्तविक जीवन-अनुभव के बीच की दूरी को उजागर करती है।
दिव्यांगता: मानव अधिकार दृष्टिकोण
मानव अधिकार दृष्टिकोण दिव्यांगता को कल्याण या दया के विषय से हटाकर अधिकार-आधारित विषय बनाता है। इस दृष्टि के अनुसार—
- दिव्यांगता व्यक्ति और समाज के बीच अंतःक्रिया से उत्पन्न होती है
- बाधाएँ (भौतिक, सामाजिक और संस्थागत) ही असली समस्या हैं
- दिव्यांगजन अधिकार-धारी नागरिक हैं, न कि सहायता-निर्भर लाभार्थी
दिव्यांगजनों के लिए लागू प्रमुख मानव अधिकार सिद्धांत हैं—
- समानता और भेदभाव से मुक्ति
- गरिमा और स्वायत्तता का अधिकार
- सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक सहभागिता
- न्याय और अवसरों तक समान पहुँच
यह दृष्टिकोण समाज को “सामान्य” और “उत्पादक” की संकीर्ण परिभाषाओं पर पुनर्विचार करने को बाध्य करता है।
संवैधानिक आधार और दिव्यांग अधिकार
भारत का संवैधानिक ढाँचा दिव्यांगजनों के अधिकारों की नैतिक नींव प्रदान करता है। Constitution of India—
- क़ानून के समक्ष समानता
- भेदभाव का निषेध
- गरिमामय जीवन का अधिकार
- सामाजिक न्याय और कल्याण के उद्देश्य
को सुनिश्चित करता है। यद्यपि संविधान में दिव्यांगता को भेदभाव का स्पष्ट आधार नहीं बनाया गया, फिर भी समानता और गरिमा की व्यापक व्याख्या में दिव्यांगजन सम्मिलित माने गए हैं।
सामाजिक बहिष्करण और दैनिक भेदभाव
दिव्यांगजन शिक्षा, रोज़गार, परिवहन, स्वास्थ्य और सार्वजनिक जीवन के लगभग हर क्षेत्र में भेदभाव का सामना करते हैं—
- विद्यालय और विश्वविद्यालयों में समावेशी सुविधाओं का अभाव
- रोज़गार में अवसरों की कमी और कार्यस्थल पर भेदभाव
- सार्वजनिक स्थलों और परिवहन की दुर्गमता
- सामाजिक कलंक और रूढ़ धारणाएँ
यह बहिष्करण दिव्यांगजनों को निर्भर बनाता है और उनकी स्वतंत्रता तथा गरिमा को क्षति पहुँचाता है।
शिक्षा और विकास का अधिकार
शिक्षा दिव्यांग अधिकारों की पूर्ति का केंद्रीय माध्यम है, परंतु व्यवहार में—
- समावेशी शिक्षा ढाँचे का अभाव
- प्रशिक्षित शिक्षकों और सहायक संसाधनों की कमी
- विशेष संस्थानों पर अत्यधिक निर्भरता
देखी जाती है। मानव अधिकार दृष्टिकोण समावेशी शिक्षा पर बल देता है, जिससे दिव्यांग बच्चों और युवाओं को समाज के मुख्यधारा संस्थानों में समान अवसर मिल सकें।
रोज़गार, आजीविका और आर्थिक अधिकार
आर्थिक आत्मनिर्भरता दिव्यांगजनों की गरिमा और स्वायत्तता के लिए अनिवार्य है। फिर भी—
- बेरोज़गारी और अल्प-रोज़गार की दर अधिक
- कार्यस्थलों पर अनुकूलन (reasonable accommodation) का अभाव
- कौशल विकास के अवसर सीमित
मानव अधिकार दृष्टिकोण दया-आधारित रोज़गार नहीं, बल्कि समान अवसर, पहुँच और अनुकूलन की माँग करता है।
पहुँच (Accessibility): एक मानव अधिकार दायित्व
दिव्यांग अधिकारों का मूल आधार पहुँच है। इसमें शामिल हैं—
- इमारतें, सड़कें और परिवहन
- सूचना और संचार साधन
- डिजिटल सेवाएँ और तकनीक
मानव अधिकार दृष्टि से पहुँच का अभाव स्वयं भेदभाव का रूप है। राज्य का दायित्व है कि वह बाधाएँ हटाए और सार्वभौमिक डिज़ाइन को अपनाए।
स्वास्थ्य, स्वायत्तता और शारीरिक अखंडता
दिव्यांगजन स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुँच, पुनर्वास और सहायक उपकरणों में कठिनाइयों का सामना करते हैं। साथ ही, जबरन संस्थानीकरण, सहमति के बिना उपचार और प्रजनन अधिकारों से वंचन जैसे प्रश्न भी उभरते हैं।
मानव अधिकार यह सुनिश्चित करते हैं—
- सूचित सहमति
- निर्णय लेने की स्वतंत्रता
- संस्थानों के बजाय समुदाय-आधारित देखभाल
क़ानूनी क्षमता, न्याय और सहभागिता
एक महत्वपूर्ण समकालीन मुद्दा है क़ानूनी क्षमता—अर्थात व्यक्ति को क़ानून के समक्ष निर्णय लेने का अधिकार। ऐतिहासिक रूप से दिव्यांगजनों को संरक्षकता व्यवस्थाओं के माध्यम से एजेंसी से वंचित किया गया।
मानव अधिकार दृष्टिकोण मांग करता है—
- क़ानून के समक्ष समान मान्यता
- न्याय तक प्रभावी पहुँच
- राजनीतिक और सार्वजनिक जीवन में सहभागिता
लोकतंत्र तभी पूर्ण है जब दिव्यांगजन निर्णय-प्रक्रियाओं में शामिल हों।
गरीबी, अंतरविभाजन और दिव्यांगता
दिव्यांगता अक्सर गरीबी, जाति, लिंग और ग्रामीण वंचना से जुड़ जाती है। इससे बहिष्करण और अधिक गहरा हो जाता है।
यह अंतरविभाजन दर्शाता है कि दिव्यांग अधिकारों को सामाजिक और आर्थिक न्याय के व्यापक संदर्भ में देखना आवश्यक है।
समकालीन चुनौतियाँ
आज दिव्यांग अधिकारों के सामने नई चुनौतियाँ हैं—
- क़ानूनों का कमजोर क्रियान्वयन
- शहरी और तकनीक-केंद्रित नीतियाँ
- डिजिटल विभाजन
- नीति निर्माण में दिव्यांगजनों की सीमित भागीदारी
ये समस्याएँ अधिकारों को प्रतीकात्मक से वास्तविक बनाने की आवश्यकता को रेखांकित करती हैं।
लोकतंत्र और दिव्यांग अधिकार
दिव्यांगजनों के साथ व्यवहार लोकतंत्र की गुणवत्ता का पैमाना है। मानव अधिकार लोकतंत्र से यह अपेक्षा करते हैं कि वह दिव्यांगजनों को केवल संरक्षण न दे, बल्कि समान नागरिक के रूप में सशक्त करे।
निष्कर्ष
दिव्यांगजन समकालीन मानव अधिकारों की सबसे महत्वपूर्ण सीमाओं में से एक का प्रतिनिधित्व करते हैं। संवैधानिक मूल्य और अंतरराष्ट्रीय मानदंड मज़बूत हैं, परंतु सामाजिक दृष्टिकोण, संरचनात्मक बाधाएँ और कमजोर क्रियान्वयन समानता और गरिमा की प्राप्ति में बाधक बने हुए हैं।
भारतीय अनुभव यह दर्शाता है कि दिव्यांग अधिकार कोई विशेषाधिकार नहीं, बल्कि मानव अधिकार हैं। इनकी वास्तविक प्राप्ति के लिए कल्याण से अधिकार, बहिष्करण से समावेशन और निर्भरता से स्वायत्तता की ओर स्पष्ट परिवर्तन आवश्यक है। दिव्यांगजनों के अधिकारों की रक्षा और संवर्धन न्याय, लोकतंत्र और मानवीय गरिमा की आधारशिला है।
संदर्भ (References)
- Constitution of India
- Sen, Amartya. Development as Freedom
- Nussbaum, Martha. Creating Capabilities
- Oliver, Michael. The Politics of Disablement
- UN Convention on the Rights of Persons with Disabilities