कार्यपालिका (Executive)
भूमिका
कार्यपालिका आधुनिक राज्य की सबसे महत्वपूर्ण और प्रभावशाली संस्थाओं में से एक है। जहाँ विधायिका कानून निर्माण के माध्यम से जन-इच्छा को अभिव्यक्त करती है, वहीं कार्यपालिका उन कानूनों को व्यवहारिक रूप प्रदान करती है। भारत में कार्यपालिका शासन, नीति निर्माण और प्रशासनिक क्रियान्वयन का केंद्रीय माध्यम बन चुकी है और समय के साथ इसकी शक्ति और प्रभाव में निरंतर वृद्धि हुई है।

भारतीय कार्यपालिका को केवल प्रशासनिक तंत्र के रूप में नहीं, बल्कि एक राजनीतिक संस्था के रूप में समझा जाना चाहिए, जो संवैधानिक प्रावधानों, संसदीय परंपराओं और लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व के ढांचे में कार्य करती है। इसकी संरचना और भूमिका पर औपनिवेशिक विरासत और स्वतंत्रता के बाद की संवैधानिक व्यवस्था दोनों का गहरा प्रभाव पड़ा है।
कार्यपालिका की अवधारणा
राजनीतिक सिद्धांत में कार्यपालिका उस अंग को कहा जाता है जो कानूनों के क्रियान्वयन और प्रवर्तन के लिए उत्तरदायी होता है। शक्ति पृथक्करण के सिद्धांत में कार्यपालिका को एक सीमित और नियंत्रित भूमिका दी गई थी, जिससे सत्ता का केंद्रीकरण रोका जा सके। परंतु आधुनिक कल्याणकारी राज्यों में कार्यपालिका की भूमिका अत्यधिक विस्तृत हो गई है।
आधुनिक शासन में कार्यपालिका केवल कानूनों को लागू करने तक सीमित नहीं रहती। नीति निर्माण, प्रशासनिक समन्वय, संकट प्रबंधन और विदेश नीति जैसे कार्य भी इसके अंतर्गत आते हैं। यह विस्तार शासन की जटिलता और त्वरित निर्णय की आवश्यकता का परिणाम है।
भारतीय कार्यपालिका की संवैधानिक संरचना
भारतीय संविधान संघ और राज्य दोनों स्तरों पर संसदीय कार्यपालिका की व्यवस्था करता है। संघ स्तर पर कार्यपालिका की औपचारिक शक्ति राष्ट्रपति में निहित है, परंतु वास्तविक कार्यपालिका शक्ति प्रधानमंत्री के नेतृत्व में मंत्रिपरिषद द्वारा प्रयोग की जाती है। यह व्यवस्था नाममात्र और वास्तविक कार्यपालिका के बीच अंतर को स्पष्ट करती है।
राष्ट्रपति राज्य का संवैधानिक और औपचारिक प्रमुख होता है, जबकि प्रधानमंत्री सरकार का वास्तविक प्रमुख होता है। मंत्रिपरिषद लोकसभा के प्रति सामूहिक रूप से उत्तरदायी होती है, जिससे संसदीय उत्तरदायित्व की सिद्धांतात्मक नींव मजबूत होती है। यह व्यवस्था लोकतांत्रिक वैधता और शासन की निरंतरता दोनों को सुनिश्चित करती है।
राजनीतिक और स्थायी कार्यपालिका
भारतीय कार्यपालिका की एक विशिष्ट विशेषता राजनीतिक कार्यपालिका और स्थायी कार्यपालिका के बीच का अंतर है। राजनीतिक कार्यपालिका में निर्वाचित प्रतिनिधि शामिल होते हैं, जो नीति निर्माण और राजनीतिक दिशा निर्धारित करते हैं। स्थायी कार्यपालिका, अर्थात् सिविल सेवा, उन नीतियों के क्रियान्वयन और प्रशासनिक निरंतरता के लिए उत्तरदायी होती है।
यह विभाजन राजनीतिक उत्तरदायित्व और प्रशासनिक निष्पक्षता के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास करता है। तथापि, व्यवहार में राजनीतिक हस्तक्षेप, प्रशासन का राजनीतिकरण और नौकरशाही विवेक जैसे मुद्दों के कारण दोनों के बीच तनाव उत्पन्न होता रहता है।
नीति निर्माण में कार्यपालिका की भूमिका
समकालीन भारत में नीति निर्माण की प्रक्रिया में कार्यपालिका की भूमिका अत्यंत प्रभावशाली हो गई है। यद्यपि संसद औपचारिक रूप से विधायी शक्ति का प्रयोग करती है, परंतु नीतिगत पहलें प्रायः कार्यपालिका के भीतर से उत्पन्न होती हैं। मंत्रिमंडलीय समितियाँ, मंत्रालयों की बैठकों और नौकरशाही विशेषज्ञता के माध्यम से नीति का स्वरूप तय होता है।
अध्यादेशों, प्रत्यायोजित विधान और कार्यकारी आदेशों का बढ़ता प्रयोग कार्यपालिका के प्रभुत्व को दर्शाता है। यह प्रवृत्ति प्रशासनिक दक्षता को बढ़ाती है, किंतु साथ ही विधायी निगरानी और लोकतांत्रिक विमर्श को कमजोर करने का खतरा भी उत्पन्न करती है।
कार्यपालिका की उत्तरदायित्व और नियंत्रण
लोकतांत्रिक व्यवस्था में कार्यपालिका की शक्ति को नियंत्रित करने के लिए संवैधानिक उत्तरदायित्व तंत्र आवश्यक हैं। भारत में कार्यपालिका विधायिका के प्रति प्रश्नकाल, बहसों, अविश्वास प्रस्ताव और संसदीय समितियों के माध्यम से उत्तरदायी होती है। इसके अतिरिक्त, न्यायिक समीक्षा यह सुनिश्चित करती है कि कार्यपालिका की कार्यवाही संवैधानिक सीमाओं के भीतर रहे।
हालाँकि, इन तंत्रों की प्रभावशीलता राजनीतिक संस्कृति, संस्थागत परंपराओं और विपक्ष की मजबूती पर निर्भर करती है। जब कार्यपालिका अत्यधिक शक्तिशाली हो जाती है, तो उत्तरदायित्व की ये व्यवस्थाएँ औपचारिक बनकर रह जाती हैं।
संघवाद और कार्यपालिका
भारतीय संघवाद की प्रकृति को निर्धारित करने में कार्यपालिका की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। संविधान संघीय ढांचा स्थापित करता है, किंतु संघीय कार्यपालिका को व्यापक शक्तियाँ प्रदान करता है, विशेषकर राष्ट्रीय महत्व के मामलों में। केंद्रीय एजेंसियों का प्रयोग, वित्तीय नियंत्रण और आपातकालीन प्रावधान कार्यपालिका की केंद्रीकरण प्रवृत्ति को दर्शाते हैं।
इससे सहकारी संघवाद और केंद्रीकृत संघवाद के बीच बहस उत्पन्न होती है। राष्ट्रीय एकता और राज्यों की स्वायत्तता के बीच संतुलन बनाए रखना भारतीय शासन की एक स्थायी चुनौती है।
समकालीन चुनौतियाँ और कार्यपालिका का प्रभुत्व
वैश्वीकरण, तकनीकी परिवर्तन और जन अपेक्षाओं में वृद्धि ने कार्यपालिका पर निर्णय लेने का दबाव बढ़ा दिया है। त्वरित और निर्णायक शासन की मांग ने कार्यपालिका की शक्ति को और मजबूत किया है, जिससे विधायिका और अन्य संस्थानों की भूमिका सीमित होती जा रही है।
साथ ही, पारदर्शिता, उत्तरदायित्व और लोकतांत्रिक क्षरण को लेकर चिंताएँ भी बढ़ी हैं। कार्यपालिका की बढ़ती शक्ति के साथ-साथ संवैधानिक नियंत्रण और संस्थागत संतुलन को सुदृढ़ करना अत्यंत आवश्यक हो गया है।
निष्कर्ष
कार्यपालिका भारतीय राजनीतिक व्यवस्था का एक केंद्रीय और गतिशील अंग है। यह संविधान के आदर्शों को व्यवहारिक शासन में रूपांतरित करती है। यद्यपि आधुनिक शासन की आवश्यकताओं ने इसकी शक्ति को विस्तारित किया है, परंतु यह विस्तार लोकतांत्रिक नियंत्रण और संवैधानिक मर्यादाओं के भीतर ही सार्थक हो सकता है।
एक सशक्त लोकतंत्र के लिए ऐसी कार्यपालिका आवश्यक है जो प्रभावी होने के साथ-साथ उत्तरदायी भी हो। कार्यपालिका की दक्षता और लोकतांत्रिक नियंत्रण के बीच संतुलन बनाए रखना ही भारतीय शासन की स्थिरता और वैधता का आधार है।
संदर्भ / Suggested Readings
- Granville Austin – The Indian Constitution: Cornerstone of a Nation
- एम. पी. जैन – Indian Constitutional Law
- डी. डी. बसु – Introduction to the Constitution of India
- सुभाष सी. कश्यप – The Politics of Governance
- नीरजा गोपाल जयाल – Democracy in India
- बी. आर. आंबेडकर – Constituent Assembly Debates
FAQs
1. संसदीय प्रणाली में कार्यपालिका की क्या भूमिका है?
कार्यपालिका नीति निर्माण और क्रियान्वयन करती है तथा विधायिका के प्रति उत्तरदायी रहती है।
2. भारत में वास्तविक कार्यपालिका शक्ति किसके पास होती है?
प्रधानमंत्री के नेतृत्व में मंत्रिपरिषद के पास।
3. राजनीतिक और स्थायी कार्यपालिका में क्या अंतर है?
राजनीतिक कार्यपालिका नीति दिशा तय करती है, जबकि स्थायी कार्यपालिका प्रशासनिक निरंतरता सुनिश्चित करती है।
4. लोकतंत्र में कार्यपालिका का प्रभुत्व क्यों चिंता का विषय है?
क्योंकि अत्यधिक सत्ता केंद्रीकरण विधायी निगरानी और लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व को कमजोर कर सकता है।