ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में राज्य: राज्य और समाज
(जम्मू एवं कश्मीर)
जम्मू और कश्मीर में राज्य और समाज के बीच संबंधों का विकास एक जटिल ऐतिहासिक प्रक्रिया के माध्यम से हुआ है, जिसे भौगोलिक स्थिति, सांस्कृतिक विविधता, राजनीतिक सत्ता के स्वरूप और बाहरी हस्तक्षेपों ने गहराई से प्रभावित किया। भारत के अन्य क्षेत्रों के विपरीत, यहाँ राज्य को केवल एक संवैधानिक या प्रशासनिक इकाई के रूप में नहीं समझा जा सकता। यह एक ऐतिहासिक रूप से निर्मित सत्ता–सम्बंध है, जिसमें वैधता, सहमति और सामाजिक स्वीकृति लगातार विवाद और पुनर्संयोजन के दौर से गुज़री है।
पूर्व-आधुनिक राजसत्ता से लेकर रियासती शासन और फिर एक विवादग्रस्त संवैधानिक लोकतंत्र तक, राज्य का अनुभव समाज के लिए कभी संरक्षक तो कभी दमनकारी रहा है। यही ऐतिहासिक पृष्ठभूमि समकालीन राजनीतिक संघर्ष, वैधता के संकट और जातीय–सांस्कृतिक तनावों को समझने की कुंजी प्रदान करती है।
राज्य और समाज: एक वैचारिक रूपरेखा
राजनीतिक सिद्धांत में राज्य से आशय उस संगठित राजनीतिक सत्ता से है जो किसी निश्चित भू-क्षेत्र पर संप्रभुता का प्रयोग करती है, जबकि समाज में सामाजिक समूह, सांस्कृतिक पहचान, आर्थिक संबंध और दैनिक जीवन शामिल होते हैं। दोनों के बीच संबंध स्थिर नहीं होता; यह समय के साथ बदलता रहता है और निम्न कारकों से आकार लेता है—
- राजनीतिक सत्ता का स्वरूप
- सामाजिक संरचनाएँ और पहचान
- आर्थिक व्यवस्थाएँ
- वैधता और सहमति के स्रोत
जम्मू और कश्मीर में यह संबंध प्रायः सामाजिक समावेशन की बजाय दूरी और असंतुलन से चिह्नित रहा है। समाज ने अक्सर राज्य को प्रतिनिधि संस्था के बजाय एक बाहरी या थोपे गए प्राधिकरण के रूप में अनुभव किया।
पूर्व-आधुनिक काल: राजसत्ता और सामाजिक संरचना
पूर्व-आधुनिक काल में कश्मीर में शासन का स्वरूप राजतंत्रीय था। संप्रभुता राजा के व्यक्ति में निहित रहती थी और उसकी वैधता धार्मिक मान्यताओं, वंश परंपरा तथा सैन्य शक्ति से जुड़ी होती थी। राज्य एक निरपेक्ष संस्था न होकर शासक की व्यक्तिगत सत्ता का विस्तार था।
इस काल में समाज—
- कृषि आधारित था
- धार्मिक समुदायों में संगठित था
- स्थानीय अभिजात वर्ग और मध्यस्थों के प्रभाव में था
सामान्य जनता की शासन में भागीदारी लगभग नगण्य थी। राज्य और समाज के बीच संबंध पदानुक्रमित था, जहाँ सहमति की भूमिका सीमित और विरोध असंगठित था।
डोगरा शासन: औपनिवेशिक–रियासती राज्य (1846–1947)
1846 की अमृतसर संधि के बाद स्थापित डोगरा शासन ने जम्मू और कश्मीर को एक ऐसे रियासती राज्य के रूप में ढाला, जिसमें पूर्व-आधुनिक राजतंत्र और औपनिवेशिक प्रशासनिक पद्धतियों का मिश्रण था।
डोगरा राज्य की प्रमुख विशेषताएँ थीं—
- सत्ता का अत्यधिक केंद्रीकरण
- कठोर कर और भू-राजस्व व्यवस्था
- राजनीतिक अधिकारों का अभाव
- धार्मिक और क्षेत्रीय असमानताएँ
कश्मीरी समाज के बड़े हिस्से, विशेषकर मुस्लिम कृषक समुदाय, के लिए राज्य एक शोषणकारी और पराया तंत्र बन गया। भूमि, श्रम और राजनीतिक बहिष्करण से जुड़े असंतोष ने राज्य–समाज के बीच गहरी खाई पैदा की।
राजनीतिक समाज का उदय और जनmobilization
बीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में शिक्षा, मुद्रण संस्कृति और सामाजिक–धार्मिक सुधार आंदोलनों के प्रभाव से राजनीतिक चेतना का उदय हुआ। समाज अब केवल सामाजिक इकाई न रहकर राजनीतिक समाज के रूप में उभरने लगा।
इस चरण में—
- निरंकुश शासन के विरुद्ध संगठित विरोध हुआ
- नागरिक अधिकारों और प्रतिनिधि संस्थाओं की माँग उठी
- वर्ग और समुदाय के पार जनmobilization दिखाई दी
राज्य को अब केवल शासक नहीं, बल्कि वैधता से वंचित राजनीतिक सत्ता के रूप में चुनौती दी जाने लगी। यह परिवर्तन ‘प्रजा’ से ‘अधिकार–दावेदार नागरिक’ बनने की ऐतिहासिक प्रक्रिया को दर्शाता है।
1947 के बाद: राज्यत्व का नया रूप
1947 की घटनियों ने जम्मू और कश्मीर के राज्य–समाज संबंधों में एक निर्णायक मोड़ उत्पन्न किया। भारत के साथ विलय और उसके बाद बने राजनीतिक–संवैधानिक ढाँचे ने राज्य की संप्रभुता और शासन की प्रकृति को पुनर्परिभाषित किया।
यह राज्य—
- संवैधानिक और लोकतांत्रिक रूप में कल्पित था
- जन–सहमति और प्रतिनिधित्व पर आधारित माना गया
- लोकतांत्रिक संस्थाओं से जुड़ा हुआ था
किन्तु रियासती अतीत की विरासत, अधूरी राजनीतिक आकांक्षाएँ और क्षेत्रीय विविधताएँ राज्य–समाज संबंधों को नाज़ुक और विवादग्रस्त बनाए रहीं। कई सामाजिक वर्गों ने राज्य को बाहरी नियंत्रण से बँधा हुआ माना।
पहचान, समाज और राज्य
जम्मू और कश्मीर में राज्य प्रशासनिक इकाई से अधिक पहचान का प्रतीक बन गया। भाषा, धर्म और क्षेत्रीयता ने समाज के राज्य से संबंध को आकार दिया।
राज्य की धारणा जुड़ी रही—
- स्वायत्तता की आकांक्षा से
- सांस्कृतिक विशिष्टता से
- ऐतिहासिक स्मृतियों से
इस कारण समाज की अपेक्षाएँ अत्यधिक बढ़ गईं और शासन की विफलताएँ शीघ्र ही वैधता के संकट में बदलने लगीं।
वैधता और सहमति का संकट
जम्मू और कश्मीर में राज्य–समाज संबंधों का एक स्थायी प्रश्न रहा है—राजनीतिक वैधता। सीमित भागीदारी, बाधित लोकतांत्रिक प्रक्रियाएँ और स्वायत्तता के क्षरण की धारणा ने इस संकट को गहरा किया।
जब वैधता कमजोर पड़ी, तो समाज ने विरोध, आंदोलनों और अंततः संघर्ष के माध्यम से असहमति प्रकट की। यह ऐतिहासिक प्रवृत्ति बताती है कि यहाँ शासन संबंधी संकट अक्सर व्यापक राजनीतिक टकराव में बदल क्यों जाते हैं।
राज्य: संघर्ष का स्थल
समय के साथ राज्य एक साधारण शासकीय संस्था न रहकर संघर्ष और प्रतिस्पर्धी दृष्टियों का स्थल बन गया—जहाँ पहचान, संप्रभुता और राजनीतिक भविष्य को लेकर टकराव हुआ।
समाज के लिए राज्य—
- आत्म-निर्णय और गरिमा की आशा
- अधूरे वादों से उपजी निराशा
- नियंत्रण और निगरानी का उपकरण
तीनों का प्रतीक बन गया। यह द्वंद्वात्मक अनुभव ऐतिहासिक राज्य–समाज संबंधों की देन है।
निष्कर्ष
जम्मू और कश्मीर में राज्य और समाज का ऐतिहासिक संबंध दूरी, संघर्ष और अस्थिर वैधता से चिह्नित रहा है। पूर्व-आधुनिक राजतंत्र, रियासती निरंकुशता और 1947 के बाद की संवैधानिक व्यवस्थाओं—किसी भी चरण में राज्य को निर्बाध सामाजिक सहमति प्राप्त नहीं हो सकी।
इस ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को समझे बिना समकालीन जातीय संघर्ष, राजनीतिक अलगाव और स्वायत्तता की माँगों को समझना संभव नहीं है। यहाँ राज्य केवल प्रशासनिक संरचना नहीं, बल्कि एक ऐतिहासिक–राजनीतिक अनुभव है, जिसे समाज ने लगातार चुनौती दी, पुनर्परिभाषित किया और नए अर्थ दिए।
मूल चुनौती आज भी यही है कि राज्य को एक ऐसे ढाँचे में बदला जाए जो सामाजिक सहमति, लोकतांत्रिक भागीदारी और ऐतिहासिक न्याय में निहित हो—ताकि राज्य और समाज के बीच संबंध टकराव से सह-अस्तित्व की ओर बढ़ सके।
संदर्भ (References)
- Bose, Sumantra. Kashmir: Roots of Conflict, Paths to Peace
- Zutshi, Chitralekha. Languages of Belonging
- Rai, Mridu. Hindu Rulers, Muslim Subjects
- Schofield, Victoria. Kashmir in Conflict