दलीय व्यवस्था (Party System)
परिचय
आधुनिक प्रतिनिधिक लोकतंत्र में दलीय व्यवस्था राजनीतिक जीवन की केंद्रीय संरचना होती है। राजनीतिक दल समाज और राज्य के बीच मध्यस्थ की भूमिका निभाते हैं तथा सामाजिक हितों को राजनीतिक मांगों और नीतिगत विकल्पों में परिवर्तित करते हैं। बिना सुदृढ़ दलीय व्यवस्था के लोकतंत्र न तो स्थिर रह सकता है और न ही उत्तरदायी शासन सुनिश्चित कर सकता है।

भारत में दलीय व्यवस्था ने न केवल चुनावी राजनीति को आकार दिया है, बल्कि संस्थागत विकास, नीति-निर्माण और संघीय संबंधों को भी गहराई से प्रभावित किया है। भारतीय दलीय व्यवस्था को किसी स्थिर ढांचे के रूप में नहीं, बल्कि एक गतिशील और विकसित होती राजनीतिक संरचना के रूप में समझना आवश्यक है।
दलीय व्यवस्था की वैचारिक समझ
दलीय व्यवस्था केवल राजनीतिक दलों की उपस्थिति को नहीं दर्शाती, बल्कि उनके बीच प्रतिस्पर्धा, सहयोग और शक्ति-संतुलन के पैटर्न को भी परिभाषित करती है। इसमें दलों की संख्या, उनकी वैचारिक स्थिति, संगठनात्मक क्षमता और चुनावी प्रभाव शामिल होते हैं।
मॉरिस ड्यूवर्जर जैसे विद्वानों ने इस बात पर बल दिया कि दलीय व्यवस्था सामाजिक विभाजनों, ऐतिहासिक परिस्थितियों और चुनावी प्रणालियों से गहराई से प्रभावित होती है। दलीय व्यवस्था यह तय करती है कि सत्ता कैसे प्राप्त की जाती है और कैसे प्रयोग में लाई जाती है।
भारतीय दलीय व्यवस्था का विकास
स्वतंत्रता के बाद प्रारंभिक दशकों में भारतीय दलीय व्यवस्था एक प्रभुत्वशाली दल प्रणाली द्वारा संचालित थी। यह व्यवस्था राष्ट्रीय आंदोलन की विरासत, व्यापक संगठनात्मक ढांचे और वैचारिक वैधता पर आधारित थी। इस चरण में राजनीतिक स्थिरता और नीति-निरंतरता प्रमुख विशेषताएँ थीं।
समय के साथ सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन, क्षेत्रीय आकांक्षाएँ और वंचित समूहों की राजनीतिक लामबंदी ने इस व्यवस्था को परिवर्तित किया। एकदलीय प्रभुत्व के क्षय के साथ बहुदलीय प्रतिस्पर्धा और क्षेत्रीय दलों का उदय हुआ, जिसने भारतीय राजनीति को अधिक विकेंद्रीकृत स्वरूप प्रदान किया।
प्रभुत्वशाली दलीय व्यवस्था और उसका क्षय
प्रभुत्वशाली दलीय व्यवस्था ने लोकतांत्रिक संस्थाओं को प्रारंभिक स्थिरता प्रदान की, किंतु यह व्यवस्था नेतृत्व संकट, संगठनात्मक क्षरण और सामाजिक विविधता की बढ़ती राजनीतिक अभिव्यक्ति के कारण कमजोर पड़ने लगी।
इस क्षय ने भारतीय लोकतंत्र में प्रतिस्पर्धा और बहुलता को बढ़ावा दिया। नई राजनीतिक शक्तियों का उभार इस बात का संकेत था कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया अधिक समावेशी और प्रतिनिधिक बन रही है।
बहुदलीय प्रतिस्पर्धा और गठबंधन राजनीति
बहुदलीय व्यवस्था के उदय ने शासन की प्रकृति को मौलिक रूप से बदल दिया। चुनावी परिणाम अक्सर खंडित जनादेश देने लगे, जिससे गठबंधन सरकारें सामान्य राजनीतिक परिघटना बन गईं।
यद्यपि गठबंधन राजनीति को अस्थिरता और नीति-निर्णय में कठिनाई से जोड़ा जाता है, फिर भी इसने संघीय संरचना को मजबूत किया और विविध सामाजिक व क्षेत्रीय हितों को शासन में स्थान दिया।
दलीय व्यवस्था का क्षेत्रीयकरण
समकालीन भारतीय दलीय व्यवस्था की एक प्रमुख विशेषता उसका क्षेत्रीयकरण है। क्षेत्रीय दलों का उभार भाषाई, सांस्कृतिक और आर्थिक पहचानों के राजनीतिकरण से जुड़ा हुआ है।
क्षेत्रीय दलों ने राष्ट्रीय राजनीति में निर्णायक भूमिका निभानी शुरू की है। इससे केंद्र-राज्य संबंधों में नई गतिशीलता आई है और राष्ट्रीय दलों को क्षेत्रीय हितों के प्रति अधिक संवेदनशील होना पड़ा है।
विचारधारा, पहचान और दलीय प्रतिस्पर्धा
भारतीय दलीय व्यवस्था में वैचारिक राजनीति अक्सर पहचान-आधारित लामबंदी के साथ जुड़ी रहती है। जाति, धर्म, भाषा और क्षेत्र जैसे कारक दलीय रणनीतियों का अभिन्न हिस्सा बन गए हैं।
यद्यपि पहचान-आधारित राजनीति की आलोचना की जाती है, फिर भी इसने वंचित और हाशिए पर पड़े समूहों को राजनीतिक प्रतिनिधित्व प्रदान किया है। इस प्रकार दलीय व्यवस्था सामाजिक समावेशन और संघर्ष—दोनों का मंच बन जाती है।
दलीय व्यवस्था और लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व
एक प्रभावी दलीय व्यवस्था लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व सुनिश्चित करने में सहायक होती है। राजनीतिक दल मतदाताओं के लिए विकल्प प्रस्तुत करते हैं, विधायी व्यवहार को संगठित करते हैं और नेतृत्व चयन की प्रक्रिया को नियंत्रित करते हैं।
भारत में राजनीतिक दलों ने जनभागीदारी को व्यापक बनाया है, किंतु आंतरिक लोकतंत्र की कमी और व्यक्तिनिष्ठ नेतृत्व की प्रवृत्ति दलीय संस्थाओं की कमजोरी को दर्शाती है।
समकालीन चुनौतियाँ
भारतीय दलीय व्यवस्था आज अनेक चुनौतियों का सामना कर रही है। धन और मीडिया का बढ़ता प्रभाव, विचारधारात्मक अस्पष्टता और नेतृत्व का केंद्रीकरण दलीय राजनीति को प्रभावित कर रहे हैं।
इन चुनौतियों के बावजूद, भारतीय दलीय व्यवस्था ने समय के साथ स्वयं को अनुकूलित करने की उल्लेखनीय क्षमता प्रदर्शित की है।
निष्कर्ष
भारतीय दलीय व्यवस्था प्रभुत्व से बहुलता तक की यात्रा का परिणाम है। यह व्यवस्था लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व, राजनीतिक एकीकरण और शासन की प्रक्रिया में केंद्रीय भूमिका निभाती है।
दलीय व्यवस्था को समझना भारतीय लोकतंत्र को समझने के लिए अनिवार्य है। इसकी मजबूती और गुणवत्ता भारतीय लोकतंत्र के भविष्य को निर्धारित करेगी।
संदर्भ / सुझाई गई पुस्तकें
- रजनी कोठारी – Politics in India
- मॉरिस ड्यूवर्जर – Political Parties
- योगेंद्र यादव – State of Indian Democracy
- अतुल कोहली – Democracy and Discontent
- क्रिस्टोफ जाफ्रेलो – India’s Silent Revolution
FAQs
1. दलीय व्यवस्था क्या है?
दलीय व्यवस्था राजनीतिक दलों के बीच प्रतिस्पर्धा और सहयोग के संरचित पैटर्न को दर्शाती है।
2. भारतीय दलीय व्यवस्था कैसे विकसित हुई है?
एक प्रभुत्वशाली दल प्रणाली से बहुदलीय और क्षेत्रीय दलों वाली व्यवस्था में।
3. गठबंधन राजनीति का महत्व क्या है?
यह प्रतिनिधित्व और संघीयता को मजबूत करती है।
4. क्षेत्रीय दल भारतीय राजनीति में क्यों महत्वपूर्ण हैं?
क्योंकि वे क्षेत्रीय हितों को राष्ट्रीय राजनीति में प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करते हैं।