स्वायत्तता के रूप में स्वतंत्रता : कांट और मिल
परिचय (Introduction)
स्वतंत्रता (freedom) राजनीतिक सिद्धांत की सबसे केंद्रीय और विवादित अवधारणाओं में से एक है। स्वतंत्रता की विभिन्न व्याख्याओं में स्वायत्तता के रूप में स्वतंत्रता (freedom as autonomy) विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, जिसका विकास इमैनुएल कांट (Immanuel Kant) और जॉन स्टुअर्ट मिल (John Stuart Mill) के विचारों में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। यद्यपि कांट और मिल भिन्न दार्शनिक परंपराओं से संबंधित हैं—कांट नैतिक आदर्शवाद (moral idealism) से और मिल उदार उपयोगितावाद (liberal utilitarianism) से—फिर भी दोनों स्वतंत्रता को केवल बाहरी हस्तक्षेप की अनुपस्थिति नहीं, बल्कि आत्म-शासन (self-governance) के रूप में समझते हैं।

स्वायत्तता की यह अवधारणा राजनीतिक सिद्धांत में इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह स्वतंत्रता को नैतिक और बौद्धिक क्षमता से जोड़ती है। दिल्ली विश्वविद्यालय (DU) के MA Political Science छात्रों के लिए कांट और मिल की तुलना स्वतंत्रता, नैतिक एजेंसी (moral agency), राज्य की भूमिका और सत्ता की सीमाओं को समझने में सहायक है।
सैद्धांतिक पृष्ठभूमि : स्वतंत्रता और स्वायत्तता (Conceptual Background)
राजनीतिक सिद्धांत में स्वतंत्रता को सामान्यतः नकारात्मक स्वतंत्रता (negative liberty), सकारात्मक स्वतंत्रता (positive liberty) और गणतंत्रीय स्वतंत्रता (republican liberty) के रूप में समझा जाता है। स्वायत्तता (autonomy) शब्द ग्रीक भाषा के autos (स्वयं) और nomos (कानून) से बना है, जिसका अर्थ है—स्वयं द्वारा बनाए गए नियमों के अनुसार जीवन जीना।
स्वायत्तता के रूप में स्वतंत्रता का अर्थ यह है कि व्यक्ति तब स्वतंत्र होता है जब वह तर्कसंगत रूप से चुने गए सिद्धांतों के अनुसार कार्य करता है, न कि बाहरी दबाव, परंपरा या आवेग (impulse) के कारण। यह दृष्टिकोण स्वतंत्रता को केवल बंधनों की अनुपस्थिति तक सीमित नहीं करता।
कांट और मिल दोनों ने इस अवधारणा को विकसित किया, किंतु उनके आधार अलग-अलग हैं—कांट के लिए स्वायत्तता नैतिक तर्क (moral reason) से जुड़ी है, जबकि मिल के लिए यह व्यक्तित्व के विकास और आत्म-अभिव्यक्ति से संबंधित है।
इमैनुएल कांट : नैतिक स्वायत्तता के रूप में स्वतंत्रता
इमैनुएल कांट के लिए स्वतंत्रता एक नैतिक अवधारणा है। उनके अनुसार स्वतंत्रता का अर्थ मनमानी करना नहीं, बल्कि तर्क और नैतिक नियम (moral law) के अनुसार कार्य करना है। Groundwork of the Metaphysics of Morals में कांट स्वायत्तता को उस क्षमता के रूप में परिभाषित करते हैं जिसके द्वारा इच्छा (will) स्वयं के लिए नैतिक कानून बनाती है (Kant, 1785)।
कांट का तर्क है कि जब व्यक्ति अपनी इच्छाओं, भावनाओं या बाहरी प्रभावों के आधार पर कार्य करता है, तब वह पराश्रित (heteronomous) होता है, स्वतंत्र नहीं। वास्तविक स्वतंत्रता तभी संभव है जब व्यक्ति कर्तव्य (duty) के आधार पर कार्य करे। इस प्रकार, कांट के लिए स्वतंत्रता और नैतिक अनुशासन एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं।
कांट की स्वायत्तता की अवधारणा अनिवार्य आदेश (categorical imperative) से जुड़ी है, जिसके अनुसार व्यक्ति को केवल उन्हीं नियमों के अनुसार कार्य करना चाहिए जिन्हें वह सार्वभौमिक (universal) बना सकता है। तर्क द्वारा बनाए गए ये सार्वभौमिक नियम व्यक्ति को नैतिक रूप से स्वतंत्र बनाते हैं।
कांट : स्वतंत्रता, कानून और राज्य
कांट ने अपनी नैतिक स्वायत्तता की अवधारणा को राजनीतिक सिद्धांत तक विस्तारित किया। The Metaphysics of Morals में उन्होंने तर्क दिया कि एक न्यायपूर्ण राज्य वही है जो तर्कसंगत और स्वायत्त नागरिकों की स्वतंत्रता का सम्मान करता है (Kant, 1797)।
कांट के अनुसार कानून का पालन स्वतंत्रता का विरोध नहीं है, बशर्ते वह कानून सार्वभौमिक और तर्कसंगत हो। यदि कानून ऐसे सिद्धांतों पर आधारित हैं जिन्हें सभी नागरिक स्वतंत्र और समान व्यक्ति के रूप में स्वीकार कर सकते हैं, तो कानून के प्रति आज्ञाकारिता भी स्वतंत्रता का ही रूप है।
हालाँकि, कांट की आलोचना यह कहकर की जाती है कि उनका सिद्धांत अत्यधिक अमूर्त (abstract) है और सामाजिक-आर्थिक असमानताओं को नजरअंदाज करता है, जो वास्तविक स्वायत्तता को सीमित करती हैं।
जॉन स्टुअर्ट मिल : व्यक्तिगत स्वायत्तता के रूप में स्वतंत्रता
जॉन स्टुअर्ट मिल की स्वतंत्रता की अवधारणा On Liberty में स्पष्ट रूप से प्रस्तुत होती है। मिल के लिए स्वतंत्रता का उद्देश्य व्यक्ति के व्यक्तित्व (individuality) और आत्म-विकास (self-development) को संभव बनाना है (Mill, 1859)। वे मानते हैं कि प्रत्येक व्यक्ति अपने हितों का सबसे अच्छा निर्णायक स्वयं होता है।
मिल ने स्वतंत्रता को प्रयोग (experimentation) और विविधता (diversity) से जोड़ा। उनके अनुसार, समाज की प्रगति तभी संभव है जब व्यक्तियों को जीवन के विभिन्न तरीकों को आज़माने की स्वतंत्रता हो। इस प्रकार, मिल की स्वायत्तता नकारात्मक स्वतंत्रता से आगे बढ़कर रचनात्मक और विकासशील स्वतंत्रता बन जाती है।
हानि सिद्धांत और स्वायत्तता (Harm Principle)
मिल का सबसे प्रसिद्ध योगदान हानि सिद्धांत (harm principle) है। इसके अनुसार, समाज या राज्य को किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता में केवल तभी हस्तक्षेप करना चाहिए जब उसके कार्य दूसरों को हानि पहुँचाते हों। व्यक्ति को उसकी भलाई के नाम पर बाध्य करना अनुचित है।
यह सिद्धांत पितृसत्तात्मक हस्तक्षेप (paternalism) और नैतिक दबाव (moral coercion) के विरुद्ध व्यक्ति की स्वायत्तता की रक्षा करता है। हालाँकि, मिल ने बच्चों और तर्कहीन व्यक्तियों (non-rational individuals) के लिए अपवाद स्वीकार किए, जिससे यह स्पष्ट होता है कि उनकी स्वायत्तता तर्कशीलता पर आधारित है।
कांट और मिल : तुलनात्मक विश्लेषण
कांट और मिल दोनों स्वायत्तता को स्वतंत्रता का आधार मानते हैं, किंतु उनकी व्याख्याएँ भिन्न हैं। कांट की स्वायत्तता नैतिक और सार्वभौमिक है, जबकि मिल की स्वायत्तता व्यक्तिगत और अनुभवात्मक है। कांट के लिए स्वतंत्रता कर्तव्य से जुड़ी है, जबकि मिल के लिए यह आत्म-अभिव्यक्ति और चयन से।
कांट इच्छाओं को संदेह की दृष्टि से देखते हैं, जबकि मिल व्यक्तित्व की विविधता को महत्व देते हैं। फिर भी दोनों इस बात पर सहमत हैं कि स्वतंत्रता का अर्थ असीमित इच्छा-पूर्ति नहीं है, बल्कि तर्कसंगत आत्म-नियंत्रण है।
आलोचना और प्रत्यालोचना (Criticism and Counter-Criticism)
कांट के सिद्धांत की आलोचना उसकी कठोरता और अमूर्तता के लिए की जाती है। नारीवादी चिंतक यह भी कहते हैं कि कांट का “तर्कसंगत व्यक्ति” सामाजिक शक्ति संबंधों की अनदेखी करता है।
मिल की आलोचना यह कहकर की जाती है कि उनका दृष्टिकोण अत्यधिक व्यक्तिवादी है और सामाजिक मूल्यों की भूमिका को कम करके आंकता है। सामुदायिक (communitarian) चिंतकों के अनुसार, व्यक्ति समाज से अलग नहीं होता।
इसके बावजूद, कांट की नैतिक स्वायत्तता मानव गरिमा (human dignity) की मजबूत नींव प्रदान करती है, जबकि मिल का सिद्धांत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक सहिष्णुता को सुदृढ़ करता है।
समकालीन प्रासंगिकता (Contemporary Relevance)
आज के समय में कांट और मिल की स्वायत्तता की अवधारणाएँ मानवाधिकार, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, जैव-नैतिकता (bioethics) और राज्य के पितृसत्तात्मक हस्तक्षेप जैसे मुद्दों में अत्यंत प्रासंगिक हैं। कांट का विचार मानव गरिमा की रक्षा करता है, जबकि मिल का सिद्धांत व्यक्तिगत जीवन-शैली की स्वतंत्रता को वैध ठहराता है।
DU MA परीक्षाओं के लिए महत्व
दिल्ली विश्वविद्यालय की MA परीक्षाओं में यह विषय महत्वपूर्ण है क्योंकि:
- यह नैतिक दर्शन और राजनीतिक सिद्धांत को जोड़ता है
- तुलनात्मक उत्तर लिखने का अवसर देता है
- स्वतंत्रता की अवधारणा को गहराई से समझने में मदद करता है
निष्कर्ष (Conclusion)
स्वायत्तता के रूप में स्वतंत्रता स्वतंत्रता की एक गहन और समृद्ध अवधारणा प्रस्तुत करती है। कांट और मिल दोनों ने यह स्पष्ट किया कि स्वतंत्रता केवल बाहरी बंधनों की अनुपस्थिति नहीं, बल्कि तर्कसंगत आत्म-शासन की क्षमता है। यद्यपि उनके दृष्टिकोण अलग हैं, फिर भी दोनों आधुनिक उदार राजनीतिक सिद्धांत की नींव रखते हैं।
MA Political Science के छात्रों के लिए कांट और मिल का अध्ययन स्वतंत्रता, सत्ता और नैतिकता के बीच संबंध को समझने के लिए अनिवार्य है।
संदर्भ ग्रंथ (References)
- Kant, Immanuel (1785). Groundwork of the Metaphysics of Morals
- Kant, Immanuel (1797). The Metaphysics of Morals
- Mill, John Stuart (1859). On Liberty
- Berlin, Isaiah (1969). Two Concepts of Liberty
- Heywood, Andrew (2019). Political Theory: An Introduction