राज्य का संविधान और शासन संरचनाएँ (जम्मू और कश्मीर)
“संविधान के भीतर संविधान” की अवधारणा जम्मू और कश्मीर की उस विशिष्ट संवैधानिक स्थिति को व्यक्त करती है, जो उसे भारतीय संघ के अन्य राज्यों से अलग बनाती थी। भारत के अन्य राज्यों के विपरीत, जम्मू और कश्मीर को अपना अलग संविधान और विशिष्ट शासन संरचनाएँ प्राप्त थीं। यह व्यवस्था केवल एक कानूनी अपवाद नहीं थी, बल्कि एक राजनीतिक समझौते का परिणाम थी, जिसका उद्देश्य क्षेत्रीय स्वायत्तता, लोकतांत्रिक आकांक्षाओं और संघीय एकीकरण के बीच संतुलन स्थापित करना था।
इस व्यवस्था को समझे बिना जम्मू और कश्मीर में स्वायत्तता, वैधता और संवैधानिक संघर्षों की राजनीति को समझना संभव नहीं है।
राज्य संविधान की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
1947 में भारत के साथ जम्मू और कश्मीर के विलय के बाद यह स्पष्ट किया गया कि राज्य और संघ के बीच संबंध विशेष संवैधानिक प्रावधानों के माध्यम से निर्धारित होंगे। यह समझ निम्न आधारों पर बनी—
- विलय की असाधारण परिस्थितियाँ
- आंतरिक स्वायत्तता का आश्वासन
- क्षेत्रीय राजनीतिक आकांक्षाओं का सम्मान
इसी पृष्ठभूमि में जम्मू और कश्मीर को अपना अलग संविधान बनाने की अनुमति दी गई।
Constitution of Jammu and Kashmir 1957 में लागू हुआ और इसने राज्य की आंतरिक शासन व्यवस्था को औपचारिक रूप प्रदान किया।
“संविधान के भीतर संविधान” का अर्थ
इस अवधारणा का आशय यह है कि—
- जम्मू और कश्मीर Constitution of India के अंतर्गत एक राज्य था,
- लेकिन उसके पास अपनी स्वतंत्र संवैधानिक संहिता थी, जो उसके आंतरिक राजनीतिक ढाँचे को नियंत्रित करती थी।
इस दोहरे संवैधानिक ढाँचे ने जम्मू और कश्मीर को भारतीय संघीय व्यवस्था में एक असाधारण और विशिष्ट इकाई बना दिया। संप्रभुता संघ के पास थी, किंतु आंतरिक मामलों में राज्य को व्यापक स्वायत्तता प्राप्त थी।
राज्य स्वायत्तता का स्वरूप और क्षेत्र
इस संवैधानिक व्यवस्था के अंतर्गत प्रारंभ में भारतीय संसद के अधिकार क्षेत्र को केवल—
- रक्षा
- विदेश नीति
- संचार
तक सीमित रखा गया। अन्य विषयों पर क़ानून तभी लागू हो सकते थे, जब राज्य सरकार की सहमति प्राप्त हो।
इस प्रकार राज्य का संविधान केवल प्रशासनिक दस्तावेज़ नहीं, बल्कि स्वायत्तता का रक्षक चार्टर बन गया।
राज्य शासन की संरचना
राज्य के संविधान ने एक लोकतांत्रिक शासन प्रणाली की स्थापना की, जो निम्न सिद्धांतों पर आधारित थी—
- जन–संप्रभुता
- प्रतिनिधि संस्थाएँ
- विधि का शासन
राज्य की प्रमुख संस्थाएँ थीं—
- विधान सभा, जो जनता द्वारा निर्वाचित होती थी
- मंत्रिपरिषद, जो विधान सभा के प्रति उत्तरदायी थी
- राज्य प्रमुख, जो प्रारंभ में निर्वाचित होता था
यद्यपि संरचनात्मक रूप से ये संस्थाएँ अन्य राज्यों से मिलती-जुलती थीं, परंतु उनकी वैधता और अधिकार राज्य की विशिष्ट संवैधानिक स्थिति से निर्धारित होते थे।
कार्यपालिका की विशेष स्थिति
राज्य के प्रमुख को प्रारंभ में सदर-ए-रियासत (Sadr-i-Riyasat) कहा जाता था, जिन्हें विधान सभा द्वारा चुना जाता था। सरकार के प्रमुख को प्रधानमंत्री कहा जाता था, न कि मुख्यमंत्री।
ये पदनाम राज्य की संवैधानिक विशिष्टता और स्वायत्त पहचान के प्रतीक थे। बाद के वर्षों में इन्हें भारतीय मॉडल के अनुरूप बदल दिया गया, जिससे धीरे-धीरे केंद्रीकरण की प्रक्रिया तेज़ हुई।
विधायी अधिकार और स्वशासन
राज्य विधानमंडल को कई महत्वपूर्ण विषयों पर पूर्ण अधिकार प्राप्त थे, जैसे—
- भूमि और संपत्ति
- स्थानीय शासन
- सामाजिक और आर्थिक नीतियाँ
- धार्मिक और सांस्कृतिक विषय
भारतीय संसद के क़ानून स्वतः राज्य पर लागू नहीं होते थे। इससे राज्य के संविधान की भूमिका वास्तविक स्वशासन के उपकरण के रूप में स्थापित हुई।
न्यायपालिका और संवैधानिक व्याख्या
जम्मू और कश्मीर की अपनी न्यायिक व्यवस्था थी, जिसमें उच्च न्यायालय राज्य के भीतर सर्वोच्च न्यायिक संस्था के रूप में कार्य करता था।
राज्य संविधान और भारतीय संविधान के बीच संबंधों की व्याख्या अक्सर संवैधानिक विवादों का केंद्र रही।
न्यायपालिका ने राज्य स्वायत्तता, संघीय अधिकार और नागरिक स्वतंत्रताओं के बीच संतुलन बनाने का प्रयास किया।
नागरिकता और विशेष अधिकार
राज्य संविधान की एक विशिष्ट विशेषता थी स्थायी निवासी (Permanent Residents) की अवधारणा। इसके अंतर्गत—
- भूमि स्वामित्व
- सरकारी रोजगार
- राज्य में स्थायी निवास
से जुड़े विशेष अधिकार केवल स्थायी निवासियों को दिए गए। इसका उद्देश्य राज्य की जनसांख्यिकीय और सांस्कृतिक पहचान की रक्षा करना था।
शासन संरचनाएँ और लोकतांत्रिक व्यवहार
सैद्धांतिक रूप से राज्य संविधान ने एक मज़बूत लोकतांत्रिक ढाँचा प्रदान किया, किंतु व्यवहार में—
- राजनीतिक हस्तक्षेप
- संस्थागत स्वायत्तता का क्षरण
- लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं में बाधा
ने इस ढाँचे को कमजोर किया। इस प्रकार संवैधानिक वादों और राजनीतिक व्यवहार के बीच अंतर बढ़ता गया।
संवैधानिक क्षरण और केंद्रीकरण
समय के साथ राज्य की स्वायत्तता में कमी आई—
- संघीय क़ानूनों के विस्तार
- संवैधानिक आदेशों के माध्यम से
- केंद्र के बढ़ते हस्तक्षेप के कारण
यद्यपि इसे राष्ट्रीय एकीकरण और स्थिरता के नाम पर उचित ठहराया गया, परंतु समाज के एक बड़े हिस्से ने इसे संवैधानिक क्षरण के रूप में देखा।
संघवाद के सिद्धांत में महत्व
जम्मू और कश्मीर की संवैधानिक व्यवस्था असममित संघवाद (Asymmetrical Federalism) का एक प्रमुख उदाहरण थी। यह दर्शाती है कि विविधता को समायोजित करने के लिए संघीय ढाँचा लचीला हो सकता है।
किन्तु इस प्रयोग ने यह भी दिखाया कि जब लोकतांत्रिक सहमति कमजोर होती है, तो विशेष स्वायत्तता भी अस्थिर हो जाती है।
निष्कर्ष
जम्मू और कश्मीर का राज्य संविधान और उसकी शासन संरचनाएँ भारतीय संवैधानिक इतिहास में संवैधानिक बहुलता का एक अनूठा प्रयोग थीं। “संविधान के भीतर संविधान” की यह व्यवस्था क्षेत्रीय स्वायत्तता, लोकतंत्र और राष्ट्रीय संप्रभुता के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास थी।
हालाँकि, संस्थागत क्षरण और राजनीतिक हस्तक्षेप के कारण यह प्रयोग अपने पूर्ण उद्देश्यों को प्राप्त नहीं कर सका। जम्मू और कश्मीर का अनुभव यह स्पष्ट करता है कि विशेष संवैधानिक दर्जा तभी प्रभावी हो सकता है, जब वह लोकतांत्रिक वैधता, संस्थागत ईमानदारी और संघीय विश्वास से समर्थित हो।
संदर्भ (References)
- Constitution of Jammu and Kashmir, 1957
- Constitution of India
- Noorani, A.G. Article 370: A Constitutional History of Jammu and Kashmir
- Bose, Sumantra. Kashmir: Roots of Conflict, Paths to Peace
- Schofield, Victoria. Kashmir in Conflict