DU MA नोट्स

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    जाति और हिंदू सामाजिक व्यवस्था की आलोचना

    बी. आर. आंबेडकर के सामाजिक और राजनीतिक दर्शन के केंद्र में जाति की तीव्र आलोचना स्थित है। आंबेडकर के लिए जाति कोई साधारण सामाजिक प्रथा या सांस्कृतिक विशेषता नहीं थी, बल्कि यह सत्ता, वर्चस्व और असमानता की एक सुव्यवस्थित व्यवस्था थी, जो भारतीय समाज के प्रत्येक क्षेत्र—सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक और राजनीतिक—को प्रभावित करती थी। हिंदू…

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    धर्म का दर्शन

    बी. आर. आंबेडकर के बौद्धिक चिंतन में धर्म का दर्शन अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रखता है। पारंपरिक धार्मिक दार्शनिकों के विपरीत, जो ईश्वर, आत्मा या मोक्ष जैसे आध्यात्मिक प्रश्नों पर केंद्रित रहते हैं, आंबेडकर ने धर्म को मुख्यतः एक सामाजिक और नैतिक संस्था के रूप में समझा। उनके लिए धर्म का मूल प्रश्न यह नहीं था…

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    भूमि और श्रम

    बी. आर. आंबेडकर के राजनीतिक–आर्थिक चिंतन में भूमि और श्रम के प्रश्न अत्यंत केंद्रीय स्थान रखते हैं। आंबेडकर भूमि और श्रम को केवल आर्थिक श्रेणियों के रूप में नहीं देखते थे, बल्कि उन्हें जाति, सत्ता और ऐतिहासिक अन्याय से निर्मित सामाजिक संस्थाएँ मानते थे। उनके अनुसार भूमि पर असमान नियंत्रण और श्रम का शोषण भारतीय…

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    नियोजन और विकास

    बी. आर. आंबेडकर के आर्थिक और राजनीतिक चिंतन में नियोजन और विकास का प्रश्न अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रखता है। आंबेडकर विकास को केवल आर्थिक वृद्धि या उत्पादन बढ़ाने की प्रक्रिया के रूप में नहीं देखते थे, बल्कि उसे एक गहन सामाजिक और राजनीतिक परियोजना के रूप में समझते थे। उनके अनुसार विकास का वास्तविक उद्देश्य…

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    संविधान, अधिकार और लोकतंत्र

    बी. आर. आंबेडकर के राजनीतिक दर्शन का केंद्रबिंदु संविधान, अधिकार और लोकतंत्र के बीच का गहरा और अविभाज्य संबंध है। भारतीय संविधान के प्रमुख निर्माता के रूप में आंबेडकर ने संविधान को केवल एक कानूनी दस्तावेज़ नहीं, बल्कि सामाजिक रूपांतरण का एक साधन माना। उनके अनुसार संविधान का उद्देश्य भारतीय समाज को न्याय, स्वतंत्रता, समानता…

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    राष्ट्र, राष्ट्रवाद और समावेशी नागरिकता

    बी. आर. आंबेडकर के राजनीतिक चिंतन में राष्ट्र और राष्ट्रवाद का प्रश्न अत्यंत केंद्रीय रहा है, किंतु उनका दृष्टिकोण भारत के प्रचलित राष्ट्रवादी विमर्श से मूलतः भिन्न था। आंबेडकर के लिए राष्ट्र कोई सांस्कृतिक, धार्मिक या भावनात्मक रूप से पहले से मौजूद इकाई नहीं था, और न ही राष्ट्रवाद अपने आप में कोई नैतिक आदर्श।…

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    आंबेडकर के विचारों और चिंतन की दार्शनिक आधारभूमि

    बी. आर. आंबेडकर के विचार आधुनिक भारतीय राजनीतिक और सामाजिक दर्शन की सबसे सशक्त, तार्किक और मौलिक धाराओं में से एक हैं। आंबेडकर केवल सामाजिक अन्याय के विरुद्ध प्रतिक्रिया देने वाले सुधारक नहीं थे, बल्कि वे एक गहरे दार्शनिक चिंतक थे, जिन्होंने उदारवाद, प्रज्ञावाद (Pragmatism), बौद्ध दर्शन, संवैधानिकता और सामाजिक आलोचनात्मक सिद्धांतों को आत्मसात कर…

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    शहरी संस्कृतियाँ

    शहरी संस्कृतियाँ (Urban Cultures) शहरी संस्कृतियाँ संस्कृति और राजनीति के अध्ययन में केंद्रीय स्थान रखती हैं, क्योंकि शहर केवल आबादी या भौतिक बसावट के क्षेत्र नहीं होते, बल्कि वे ऐसे सामाजिक प्रयोगशाला (social laboratories) होते हैं जहाँ सत्ता, पहचान, अर्थव्यवस्था और संस्कृति गहन रूप से एक-दूसरे से जुड़ते हैं। भारत में शहरी स्थान ऐतिहासिक रूप…

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    साहित्य, सिनेमा और राष्ट्रवाद

    (Literature, Cinema and Nationalism) साहित्य और सिनेमा ने राष्ट्रवाद की अवधारणा को गढ़ने, प्रसारित करने और उस पर प्रश्न उठाने में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। ये केवल राजनीतिक घटनाओं के प्रतिबिंब नहीं हैं, बल्कि ऐसे सांस्कृतिक माध्यम हैं जो राष्ट्र की कल्पना को कथाओं, प्रतीकों, भावनाओं और दृश्य छवियों के माध्यम से सजीव बनाते…

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    इकाई I : समाज की अवधारणा

    (Unit I: Conception of Society) Culture and Politics in India पाठ्यक्रम में समाज की अवधारणा एक मूलभूत सैद्धांतिक आधार प्रदान करती है। यहाँ समाज को केवल व्यक्तियों या संस्थाओं के समूह के रूप में नहीं, बल्कि एक ऐतिहासिक रूप से निर्मित, सांस्कृतिक रूप से मध्यस्थित और राजनीतिक रूप से संरचित प्रक्रिया के रूप में समझा…