गुणात्मक (Qualitative) और सर्वेक्षण (Survey) अनुसंधान
चुनावों का अध्ययन केवल मतगणना या परिणामों के विश्लेषण तक सीमित नहीं होता, बल्कि यह उस सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक प्रक्रिया को समझने का प्रयास है, जिसके माध्यम से मतदाता अपने विकल्पों का चयन करते हैं। इसी कारण निर्वाचन अध्ययन में विभिन्न अनुसंधान पद्धतियों का प्रयोग किया जाता है। इनमें सबसे प्रमुख हैं—गुणात्मक अनुसंधान और सर्वेक्षण (मात्रात्मक) अनुसंधान।
ये दोनों पद्धतियाँ अलग–अलग दृष्टिकोण प्रदान करती हैं, परंतु आधुनिक निर्वाचन अध्ययन में इन्हें परस्पर पूरक माना जाता है।
चुनाव: एक अनुभवजन्य अध्ययन का विषय
चुनाव केवल मतदान की एक घटना नहीं होते, बल्कि वे—
- सामाजिक संरचनाओं
- राजनीतिक संस्थाओं
- सांस्कृतिक अर्थों
- ऐतिहासिक अनुभवों
में गहराई से निहित होते हैं।
इसलिए चुनावों का अध्ययन यह समझने का प्रयास करता है कि—
- लोग कैसे मतदान करते हैं
- वे ऐसा क्यों करते हैं
- चुनाव लोकतंत्र में क्या अर्थ रखते हैं
गुणात्मक और सर्वेक्षण अनुसंधान इन प्रश्नों को अलग–अलग तरीकों से संबोधित करते हैं।
गुणात्मक अनुसंधान (Qualitative Research)
गुणात्मक अनुसंधान की प्रकृति और उद्देश्य
गुणात्मक अनुसंधान चुनावों को गहराई, संदर्भ और अर्थ के स्तर पर समझने का प्रयास करता है। इसका मुख्य उद्देश्य संख्यात्मक प्रवृत्तियों के बजाय अनुभवों, धारणाओं और कथाओं का विश्लेषण करना होता है।
यह यह नहीं पूछता कि कितने लोग किसी प्रकार से मतदान करते हैं, बल्कि यह समझने की कोशिश करता है कि लोग क्यों और कैसे राजनीतिक निर्णय लेते हैं।
गुणात्मक निर्वाचन अनुसंधान की विधियाँ
गुणात्मक निर्वाचन अध्ययन में सामान्यतः निम्न विधियों का प्रयोग किया जाता है—
- मतदाताओं, उम्मीदवारों और पार्टी कार्यकर्ताओं के गहन साक्षात्कार
- फोकस ग्रुप चर्चाएँ
- चुनाव अभियानों के दौरान सहभागी अवलोकन
- विशिष्ट निर्वाचन क्षेत्रों या राज्यों के केस अध्ययन
- भाषणों, घोषणापत्रों और मीडिया विमर्श का विश्लेषण
इन विधियों के माध्यम से चुनावों के स्थानीय, सांस्कृतिक और प्रतीकात्मक आयामों को समझा जाता है।
निर्वाचन अध्ययन में गुणात्मक अनुसंधान का योगदान
गुणात्मक अनुसंधान निम्न क्षेत्रों में विशेष योगदान देता है—
- मतदाता की प्रेरणाओं और धारणाओं को समझना
- पहचान-आधारित (जाति, धर्म, क्षेत्र) मतदान का विश्लेषण
- चुनावी अभियानों और रणनीतियों की व्याख्या
- संरक्षणवाद, नेटवर्क और अनौपचारिक राजनीति की पहचान
विशेषकर बहुल और असमान समाजों में यह पद्धति उन अनसुनी आवाज़ों को सामने लाती है, जिन्हें सर्वेक्षण अक्सर पकड़ नहीं पाते।
गुणात्मक अनुसंधान की सीमाएँ
इसके बावजूद, गुणात्मक अनुसंधान की कुछ सीमाएँ भी हैं—
- निष्कर्ष सीमित संदर्भ तक ही लागू होते हैं
- व्यापक सामान्यीकरण कठिन होता है
- शोधकर्ता की व्याख्या का प्रभाव अधिक होता है
हालाँकि विभिन्न स्रोतों की तुलना (triangulation) द्वारा इन सीमाओं को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
सर्वेक्षण अनुसंधान (Survey Research)
सर्वेक्षण अनुसंधान की प्रकृति और उद्देश्य
सर्वेक्षण अनुसंधान आधुनिक निर्वाचन अध्ययन की रीढ़ माना जाता है। इसका उद्देश्य बड़ी संख्या में मतदाताओं से डेटा एकत्र कर व्यापक प्रवृत्तियों और पैटर्न की पहचान करना है।
यह इस धारणा पर आधारित है कि मतदाताओं के दृष्टिकोण और विकल्पों को मापा और विश्लेषित किया जा सकता है।
निर्वाचन सर्वेक्षण के प्रकार
चुनाव अध्ययन में प्रायः निम्न प्रकार के सर्वेक्षण किए जाते हैं—
- चुनाव-पूर्व सर्वेक्षण
- चुनाव-पश्चात सर्वेक्षण
- पैनल सर्वेक्षण (एक ही समूह का समय के साथ अध्ययन)
- एग्ज़िट पोल (मतदान के तुरंत बाद)
इन सर्वेक्षणों में मतदान व्यवहार, दल-प्राथमिकता, मुद्दों पर राय, नेताओं की छवि और सामाजिक पृष्ठभूमि से संबंधित प्रश्न पूछे जाते हैं।
सर्वेक्षण अनुसंधान की विशेषताएँ और योगदान
सर्वेक्षण अनुसंधान के प्रमुख लाभ हैं—
- व्यापक जनसंख्या पर निष्कर्ष लागू करने की क्षमता
- परिकल्पनाओं का सांख्यिकीय परीक्षण
- सामाजिक कारकों और मतदान व्यवहार के बीच संबंधों की पहचान
- विभिन्न चुनावों और देशों की तुलनात्मक तुलना
दल-निष्ठा, मुद्दा-आधारित मतदान और आर्थिक मतदान जैसे सिद्धांतों का विकास मुख्यतः सर्वेक्षण अनुसंधान के माध्यम से हुआ है।
सर्वेक्षण अनुसंधान की चुनौतियाँ
इसके बावजूद सर्वेक्षण अनुसंधान कुछ समस्याओं से भी जूझता है—
- नमूना चयन में पक्षपात
- उत्तर न देने की प्रवृत्ति
- सामाजिक स्वीकार्यता के कारण गलत उत्तर
- जटिल राजनीतिक निर्णयों का सरलीकरण
आलोचकों का कहना है कि सर्वेक्षण कभी-कभी राजनीति के गहरे अर्थों को पकड़ने में विफल रहते हैं।
गुणात्मक बनाम सर्वेक्षण अनुसंधान: एक कृत्रिम विभाजन?
अक्सर इन दोनों पद्धतियों को परस्पर विरोधी के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, परंतु समकालीन निर्वाचन अध्ययन इस द्वंद्व को अस्वीकार करता है।
- गुणात्मक अनुसंधान प्रक्रिया और अर्थ को स्पष्ट करता है
- सर्वेक्षण अनुसंधान प्रवृत्तियों और वितरण को दर्शाता है
दोनों मिलकर चुनावी राजनीति की अधिक समग्र तस्वीर प्रस्तुत करते हैं।
मिश्रित पद्धति (Mixed-Methods) दृष्टिकोण
आधुनिक निर्वाचन अध्ययन में मिश्रित पद्धति का प्रयोग बढ़ रहा है, जिसमें—
- सर्वेक्षण से व्यापक प्रवृत्तियाँ पहचानी जाती हैं
- गुणात्मक अनुसंधान से उनकी व्याख्या की जाती है
उदाहरण के लिए, यदि सर्वेक्षण मतदान में गिरावट दिखाता है, तो गुणात्मक अध्ययन उसके पीछे निराशा, बहिष्करण या अविश्वास जैसे कारणों को उजागर कर सकता है।
वैश्विक दक्षिण और भारतीय संदर्भ में महत्त्व
भारत जैसे समाजों में—
- गुणात्मक अनुसंधान जाति, धर्म, क्षेत्र और स्थानीय सत्ता संरचनाओं को समझने में सहायक है
- सर्वेक्षण अनुसंधान बड़े स्तर पर दलीय परिवर्तन और मतदान प्रवृत्तियों को दर्शाता है
दोनों मिलकर चुनावों को एक साथ जन-आंदोलन और स्थानीय अनुभव के रूप में समझने में सहायता करते हैं।
पद्धति और लोकतंत्र की समझ
अनुसंधान पद्धति का चयन लोकतंत्र की समझ से भी जुड़ा है—
- सर्वेक्षण अनुसंधान व्यवहारवादी और प्रत्यक्षवादी परंपरा से जुड़ा है
- गुणात्मक अनुसंधान व्याख्यात्मक और समालोचनात्मक परंपरा से
लोकतंत्र को केवल प्रक्रिया नहीं, बल्कि जीवित सामाजिक व्यवहार के रूप में समझने के लिए दोनों आवश्यक हैं।
निष्कर्ष
गुणात्मक और सर्वेक्षण अनुसंधान चुनावों के अध्ययन के दो अनिवार्य स्तंभ हैं। जहाँ गुणात्मक पद्धति चुनावों की गहराई, संदर्भ और अर्थ को उजागर करती है, वहीं सर्वेक्षण पद्धति व्यापक प्रवृत्तियों और तुलनात्मक विश्लेषण को संभव बनाती है।
इन दोनों को प्रतिस्पर्धी नहीं, बल्कि पूरक उपकरण के रूप में देखा जाना चाहिए। चुनावों और लोकतंत्र की समग्र समझ के लिए पद्धतिगत बहुलता आवश्यक है, क्योंकि कोई भी एक पद्धति चुनावी राजनीति की जटिलता को पूरी तरह नहीं पकड़ सकती।
संदर्भ (References)
- Lazarsfeld, Paul et al. The People’s Choice
- Campbell, Angus et al. The American Voter
- Norris, Pippa. Electoral Engineering
- Bryman, Alan. Social Research Methods
- Dalton, Russell J. Citizen Politics