पहचान की राजनीति: कश्मीरियत और साम्प्रदायिकता
जम्मू और कश्मीर की राजनीति को समझने के लिए पहचान की राजनीति (Identity Politics) एक केंद्रीय अवधारणा है। यहाँ राजनीतिक विमर्श केवल सत्ता, शासन या विकास तक सीमित नहीं रहा, बल्कि वह गहराई से संस्कृति, धर्म, इतिहास और सामूहिक स्मृति से जुड़ा रहा है। इस संदर्भ में कश्मीरियत और साम्प्रदायिकता पहचान की राजनीति के दो प्रमुख, परस्पर विरोधी और साथ ही परस्पर जुड़े हुए रूप हैं।
जहाँ कश्मीरियत को एक समावेशी, साझा और सांस्कृतिक पहचान के रूप में प्रस्तुत किया गया, वहीं साम्प्रदायिकता ने राजनीति को धार्मिक आधार पर विभाजित और बहिष्करणकारी बनाया। इन दोनों के बीच तनाव ने जम्मू और कश्मीर के सामाजिक–राजनीतिक संघर्षों को गहराई से प्रभावित किया है।
पहचान की राजनीति: एक वैचारिक समझ
पहचान की राजनीति से आशय उस राजनीतिक प्रक्रिया से है, जिसमें लोग अपनी सामूहिक पहचान—जैसे धर्म, भाषा, संस्कृति, जातीयता या क्षेत्र—के आधार पर राजनीतिक माँगें और दावे प्रस्तुत करते हैं।
बहुलतावादी समाजों में पहचान—
- एक ओर सामूहिक एकजुटता और सशक्तिकरण का स्रोत बन सकती है
- तो दूसरी ओर विभाजन, ध्रुवीकरण और संघर्ष का कारण भी बन सकती है
जम्मू और कश्मीर में पहचान की राजनीति का विकास—
- ऐतिहासिक शोषण और शासन अनुभव
- राजनीतिक हाशियेकरण की भावना
- स्वायत्तता और संप्रभुता से जुड़ी बहसों
के संदर्भ में हुआ।
कश्मीरियत: अर्थ और ऐतिहासिक जड़ें
कश्मीरियत को प्रायः कश्मीर घाटी की विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान के रूप में समझा जाता है। यह अवधारणा—
- साझा भाषा और सांस्कृतिक परंपराओं
- सूफी–भक्ति परंपरा
- धार्मिक सह-अस्तित्व की ऐतिहासिक स्मृतियों
से जुड़ी रही है।
कश्मीरियत का मूल भाव यह रहा कि धार्मिक भिन्नताओं के बावजूद कश्मीर का समाज एक साझा सांस्कृतिक संसार में जीता आया है।
ऐतिहासिक रूप से कश्मीरियत केवल संस्कृति नहीं, बल्कि एक सामूहिक अनुभव और भावना थी, जो भूमि, इतिहास और जीवन-शैली से जुड़ी हुई थी।
राजनीतिक विचार के रूप में कश्मीरियत
राजनीतिक स्तर पर कश्मीरियत को—
- निरंकुश शासन के विरोध
- क्षेत्रीय विशिष्टता के दावे
- स्वायत्तता और आत्मसम्मान की राजनीति
के लिए प्रयुक्त किया गया।
यह एक ऐसी पहचान के रूप में उभरी, जो न केवल साम्प्रदायिक राजनीति का प्रतिरोध करती थी, बल्कि अत्यधिक केंद्रीकरण के विरुद्ध भी खड़ी थी।
इस अर्थ में कश्मीरियत एक समावेशी और प्रतिरोधात्मक राजनीतिक विचार थी।
कश्मीरियत की सीमाएँ और अंतर्विरोध
यद्यपि कश्मीरियत को एक समावेशी पहचान के रूप में प्रस्तुत किया गया, परंतु इसकी कुछ सीमाएँ भी स्पष्ट हुईं—
- यह अक्सर घाटी-केंद्रित रही और जम्मू व लद्दाख के अनुभवों को पूरी तरह समाहित नहीं कर सकी
- आंतरिक सामाजिक असमानताओं (वर्ग, लिंग आदि) को नज़रअंदाज़ किया गया
- सांस्कृतिक एकता राजनीतिक सहमति में परिवर्तित नहीं हो सकी
लंबे समय तक चले संघर्ष, हिंसा और विस्थापन ने कश्मीरियत की एकीकृत शक्ति को कमजोर कर दिया।
साम्प्रदायिकता: उद्भव और स्वरूप
साम्प्रदायिकता से आशय उस राजनीति से है, जिसमें धर्म को राजनीतिक पहचान और शक्ति-संगठन का मुख्य आधार बना दिया जाता है।
जम्मू और कश्मीर में साम्प्रदायिकता का उदय—
- औपनिवेशिक वर्गीकरण की विरासत
- सत्ता और संसाधनों तक असमान पहुँच
- असुरक्षा और भय की राजनीति
के कारण हुआ।
साम्प्रदायिक राजनीति जटिल सामाजिक–आर्थिक समस्याओं को धार्मिक विरोधों में बदल देती है और बहुलता के स्थान पर विभाजन को बढ़ावा देती है।
राजनीतिक mobilization और साम्प्रदायिकता
राजनीतिक अस्थिरता और कमजोर लोकतांत्रिक संस्थाओं के दौर में साम्प्रदायिकता ने अधिक प्रभाव डाला।
राजनीतिक शक्तियों ने—
- धार्मिक पहचान को वोट-बैंक में बदला
- विरोधियों को “दूसरे” के रूप में प्रस्तुत किया
- संवाद के स्थान पर ध्रुवीकरण को बढ़ाया
इससे लोकतांत्रिक राजनीति का दायरा संकुचित हुआ और सामाजिक तनाव गहराया।
कश्मीरियत बनाम साम्प्रदायिकता: एक तनावपूर्ण संबंध
कश्मीरियत और साम्प्रदायिकता का संबंध केवल विरोध का नहीं, बल्कि तनाव और अंतर्विरोध का भी है।
कभी कश्मीरियत को साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण के विरुद्ध एक वैकल्पिक पहचान के रूप में प्रस्तुत किया गया, तो कभी कश्मीरियत की व्याख्या स्वयं धार्मिक संदर्भों में की जाने लगी।
यह दर्शाता है कि पहचान स्थिर नहीं होती, बल्कि राजनीतिक परिस्थितियों के अनुसार पुनर्परिभाषित होती रहती है।
संघर्ष, हिंसा और पहचान का रूपांतरण
दीर्घकालिक संघर्ष और सैन्यीकरण ने पहचान की राजनीति को गहराई से प्रभावित किया—
- साझा सांस्कृतिक स्थान सिमटते गए
- भय और अविश्वास ने साम्प्रदायिक पहचान को कठोर बनाया
- सह-अस्तित्व की संभावनाएँ कमजोर पड़ीं
पहचान अब सांस्कृतिक अभिव्यक्ति से अधिक राजनीतिक अस्तित्व और सुरक्षा का प्रश्न बन गई।
पहचान, प्रतिनिधित्व और वैधता
पहचान की राजनीति का सीधा प्रभाव राजनीतिक प्रतिनिधित्व और वैधता पर पड़ा। जब लोकतांत्रिक संस्थाएँ विविध पहचानों को समुचित प्रतिनिधित्व देने में विफल रहीं, तो पहचान-आधारित राजनीति और अधिक उग्र हो गई।
इससे—
- निर्वाचित संस्थाओं की वैधता पर प्रश्न उठे
- लोकतांत्रिक विश्वास कमजोर हुआ
- राजनीति और समाज के बीच दूरी बढ़ी
द्वैत से आगे की राजनीति
जम्मू और कश्मीर की राजनीति को केवल कश्मीरियत बनाम साम्प्रदायिकता के द्वंद्व में बाँधना एक सरलीकरण होगा।
यहाँ पहचानें—
- क्षेत्र
- भाषा
- वर्ग
- लिंग
- ऐतिहासिक अनुभव
से भी निर्मित होती हैं।
एक स्थायी और लोकतांत्रिक समाधान के लिए बहुवचन, संवादात्मक और समावेशी पहचान राजनीति की आवश्यकता है।
निष्कर्ष
जम्मू और कश्मीर में पहचान की राजनीति कश्मीरियत और साम्प्रदायिकता के बीच निरंतर संघर्ष के रूप में उभरी है। कश्मीरियत ने साझा सांस्कृतिक विरासत और सह-अस्तित्व की कल्पना प्रस्तुत की, परंतु संघर्ष और बहिष्करण ने उसकी प्रभावशीलता को सीमित कर दिया। इसके विपरीत, साम्प्रदायिकता ने धार्मिक विभाजनों को राजनीतिक शक्ति में बदलकर समाज को अधिक ध्रुवीकृत किया।
यह अनुभव बताता है कि पहचान राजनीति न तो पूरी तरह सकारात्मक है और न ही स्वभावतः नकारात्मक। उसका प्रभाव इस बात पर निर्भर करता है कि वह लोकतांत्रिक समावेशन और संवाद को बढ़ावा देती है या बहिष्करण और संघर्ष को।
जम्मू और कश्मीर के संदर्भ में चुनौती यही है कि पहचान को संघर्ष का माध्यम बनाने के बजाय उसे लोकतांत्रिक संवाद, सामाजिक न्याय और राजनीतिक मेल-मिलाप का आधार बनाया जाए।
संदर्भ (References)
- Zutshi, Chitralekha. Languages of Belonging: Islam, Regional Identity, and the Making of Kashmir
- Bose, Sumantra. Kashmir: Roots of Conflict, Paths to Peace
- Pandey, Gyanendra. The Construction of Communalism in Colonial North India
- Schofield, Victoria. Kashmir in Conflict