मानव अधिकारों की अवधारणा: वैश्विक और तृतीय विश्व संदर्भ
(The Concept of Human Rights: Global & Third World Context)
मानव अधिकारों की अवधारणा आधुनिक विश्व की सबसे प्रभावशाली नैतिक और राजनीतिक अवधारणाओं में से एक है। इसके मूल में यह विचार निहित है कि कुछ अधिकार ऐसे हैं जो प्रत्येक व्यक्ति को मानव होने के नाते प्राप्त होते हैं—चाहे उसकी राष्ट्रीयता, संस्कृति, धर्म, वर्ग, लिंग या राजनीतिक व्यवस्था कुछ भी हो। समकालीन राजनीतिक सिद्धांत और व्यवहार में मानव अधिकार एक ओर सार्वभौमिक नैतिक सिद्धांत हैं, तो दूसरी ओर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संस्थागत कानूनी मानदंड भी हैं।
हालाँकि मानव अधिकार सार्वभौमिक होने का दावा करते हैं, पर उनके ऐतिहासिक उद्भव, राजनीतिक प्रयोग और सामाजिक अर्थ वैश्विक सत्ता-संबंधों से गहराई से प्रभावित रहे हैं। इसी कारण मानव अधिकारों की वैश्विक (मुख्यतः पश्चिमी-उदारवादी) अवधारणा और तृतीय विश्व (या वैश्विक दक्षिण) के अनुभवों एवं आलोचनाओं के बीच तनाव उत्पन्न हुआ। अतः मानव अधिकारों को समझने के लिए वैश्विक विकास के साथ-साथ तृतीय विश्व के संदर्भ में उनकी आलोचनात्मक व्याख्या आवश्यक है।
मानव अधिकार: अर्थ और मूल सिद्धांत
मानव अधिकार सामान्यतः अविच्छेद्य, सार्वभौमिक और अविभाज्य माने जाते हैं।
- अविच्छेद्य—क्योंकि उन्हें वैध रूप से छीना नहीं जा सकता
- सार्वभौमिक—क्योंकि वे सभी मनुष्यों पर समान रूप से लागू होते हैं
- अविभाज्य—क्योंकि नागरिक–राजनीतिक और आर्थिक–सामाजिक–सांस्कृतिक अधिकार परस्पर निर्भर हैं
आधुनिक मानव अधिकार विमर्श निम्न मूल्यों पर आधारित है—
- मानवीय गरिमा
- समानता और भेदभाव-निषेध
- मनमानी सत्ता से स्वतंत्रता
- संरचनात्मक अन्याय से संरक्षण
इन सिद्धांतों के अनुसार, अधिकार राज्य की कृपा नहीं हैं; बल्कि राज्य कर्तव्य-वाहक (duty bearer) है, जो अधिकारों का सम्मान, संरक्षण और पूर्ति करने के लिए उत्तरदायी होता है।
वैश्विक संदर्भ: मानव अधिकारों का ऐतिहासिक विकास
वैश्विक स्तर पर आधुनिक मानव अधिकारों की अवधारणा का उद्भव मुख्यतः यूरोपीय बौद्धिक और राजनीतिक परंपराओं से जुड़ा रहा। प्रबोधन काल के चिंतकों ने प्राकृतिक अधिकारों, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और तर्कसंगत क़ानून पर ज़ोर दिया। यूरोप और उत्तरी अमेरिका की राजनीतिक क्रांतियों ने इन विचारों को संवैधानिक रूप दिया।
आरंभिक मानव अधिकार मुख्यतः नागरिक और राजनीतिक अधिकारों तक सीमित थे—जैसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, संपत्ति और राजनीतिक सहभागिता। किंतु इन अधिकारों का दायरा सीमित था; उपनिवेशित समाजों, महिलाओं, दासों और निर्धनों को इससे बाहर रखा गया।
द्वितीय विश्व युद्ध के विनाश और नरसंहार के अनुभवों के बाद मानव अधिकारों का अंतरराष्ट्रीयकरण हुआ। इसी संदर्भ में United Nations के तत्वावधान में मानव अधिकारों को वैश्विक नैतिक और कानूनी दायित्व के रूप में स्थापित किया गया।
सार्वभौमिकता और उदार मानव अधिकार ढाँचा
वैश्विक मानव अधिकार व्यवस्था सार्वभौमिकता के सिद्धांत पर आधारित है—अर्थात कुछ अधिकार सभी मनुष्यों के लिए हर जगह लागू होते हैं। इस उदार ढाँचे में विशेष रूप से बल दिया गया—
- व्यक्तिगत स्वायत्तता
- क़ानून के समक्ष समानता
- राजनीतिक स्वतंत्रताएँ
- क़ानून का शासन
यह ढाँचा राज्य की निरंकुशता पर नियंत्रण और व्यक्ति की रक्षा में महत्वपूर्ण रहा है। परंतु इसकी आलोचना यह है कि यह मुख्यतः पश्चिमी ऐतिहासिक अनुभवों और प्राथमिकताओं को प्रतिबिंबित करता है तथा सामूहिक अधिकारों और विकासात्मक वास्तविकताओं को कम महत्व देता है।
तृतीय विश्व संदर्भ: उपनिवेशवाद और मानव अधिकार
तृतीय विश्व में मानव अधिकारों का अनुभव मूलतः उपनिवेशवादी शासन से आकार ग्रहण करता है। उपनिवेशवाद ने अधिकारों का व्यापक उल्लंघन किया, जबकि स्वयं को सभ्यता और क़ानून का वाहक बताया।
इस विरोधाभास ने तृतीय विश्व में मानव अधिकारों के प्रति संदेह पैदा किया। यहाँ मानव अधिकारों का संघर्ष पहले व्यक्तिगत स्वतंत्रताओं के लिए नहीं, बल्कि सामूहिक अधिकारों के लिए था—जैसे:
- आत्मनिर्णय का अधिकार
- राष्ट्रीय स्वतंत्रता
- आर्थिक न्याय
- सामाजिक गरिमा
इस प्रकार तृतीय विश्व में मानव अधिकार एक राजनीतिक और उपनिवेश-विरोधी परियोजना के रूप में उभरे।
विकास, गरीबी और मानव अधिकार (तृतीय विश्व)
तृतीय विश्व मानव अधिकार विमर्श की एक केंद्रीय विशेषता है आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक अधिकारों पर ज़ोर। व्यापक गरीबी और असमानता ने यह स्पष्ट किया कि केवल राजनीतिक स्वतंत्रताएँ पर्याप्त नहीं हैं।
इस दृष्टिकोण के अनुसार—
- जीवन का अधिकार आजीविका के अधिकार से जुड़ा है
- आर्थिक सुरक्षा के बिना राजनीतिक स्वतंत्रता खोखली है
- संरचनात्मक असमानता भी दमन का रूप हो सकती है
इसने अधिकारों की वैश्विक श्रेणीक्रम को चुनौती दी और विकास को मानव अधिकार के रूप में देखने की माँग को मज़बूती दी।
सामूहिक अधिकार और समुदाय का प्रश्न
तृतीय विश्व की एक महत्वपूर्ण देन है सामूहिक अधिकारों पर बल। कई समाजों में व्यक्ति की पहचान समुदाय से गहराई से जुड़ी होती है। इसलिए—
- अल्पसंख्यक अधिकार
- आदिवासी अधिकार
- सांस्कृतिक स्वायत्तता
- सामाजिक संरचनाओं में लैंगिक न्याय
जैसे प्रश्नों के लिए ऐसी मानव अधिकार अवधारणा चाहिए जो व्यक्ति और समुदाय—दोनों को महत्व दे।
मानव अधिकार, संप्रभुता और वैश्विक सत्ता
तृतीय विश्व की आलोचनाएँ यह भी रेखांकित करती हैं कि मानव अधिकारों का प्रवर्तन अक्सर चयनात्मक और राजनीतिक रहा है। मानवीय हस्तक्षेप और प्रतिबंध कई बार वैश्विक सत्ता-संतुलन के उपकरण प्रतीत होते हैं।
इससे एक अधिक न्यायपूर्ण, लोकतांत्रिक और समतामूलक वैश्विक मानव अधिकार व्यवस्था की माँग उभरी, जो ऐतिहासिक अन्याय और विकासात्मक असमानताओं को स्वीकार करे।
समकालीन मानव अधिकार विमर्श में तनाव
आज मानव अधिकार विमर्श निम्न तनावों के बीच कार्य करता है—
- सार्वभौमिक मानदंड बनाम सांस्कृतिक विशिष्टता
- व्यक्तिगत अधिकार बनाम सामूहिक न्याय
- नागरिक–राजनीतिक अधिकार बनाम आर्थिक–सामाजिक अधिकार
- वैश्विक शासन बनाम राष्ट्रीय स्वायत्तता
तृतीय विश्व ने मानव अधिकारों को अस्वीकार नहीं किया, बल्कि उन्हें पुनर्व्याख्यायित और विस्तारित किया है।
निष्कर्ष
मानव अधिकार केवल एक अमूर्त नैतिक सिद्धांत नहीं, बल्कि ऐतिहासिक रूप से विकसित राजनीतिक अवधारणा हैं। वैश्विक संदर्भ में वे निरंकुशता और युद्ध की प्रतिक्रिया के रूप में उभरे; तृतीय विश्व में वे उपनिवेश-विरोध, विकास और सामाजिक न्याय से जुड़े।
इसलिए मानव अधिकारों की समग्र समझ के लिए एक ऐसी संदर्भ-संवेदनशील और समावेशी अवधारणा आवश्यक है, जो सार्वभौमिक मानवीय गरिमा के साथ-साथ वैश्विक दक्षिण की ऐतिहासिक वास्तविकताओं को भी मान्यता दे।
संदर्भ (References)
- Donnelly, Jack. Universal Human Rights in Theory and Practice
- Sen, Amartya. Development as Freedom
- Upendra Baxi. The Future of Human Rights
- Hunt, Lynn. Inventing Human Rights
- United Nations. Universal Declaration of Human Rights