बहुसांस्कृतिक परिवेश में लोकतांत्रिक राजनीति: भारत और इज़राइल
(Democratic Politics in a Multicultural Milieu: India and Israel)
बहुसांस्कृतिक समाजों में लोकतांत्रिक राजनीति केवल नियमित चुनावों और औपचारिक संस्थाओं तक सीमित नहीं होती। ऐसे समाजों में लोकतंत्र को विभिन्न सांस्कृतिक, धार्मिक, जातीय और भाषायी समूहों के बीच निरंतर संवाद, समझौते और टकराव के माध्यम से काम करना पड़ता है। गहन विविधता वाले समाजों में लोकतंत्र का प्रमुख कार्य भिन्नताओं को समाप्त करना नहीं, बल्कि उन्हें प्रबंधित करना होता है।
India और Israel—दोनों संसदीय लोकतंत्र हैं, जो अत्यंत बहुसांस्कृतिक सामाजिक संरचनाओं के भीतर संचालित होते हैं। फिर भी, लोकतांत्रिक राजनीति की प्रकृति, उसकी सीमाएँ और अल्पसंख्यकों की स्थिति—इन दोनों देशों में काफ़ी भिन्न रूप लेती है।
यह इकाई यह विश्लेषण करती है कि बहुसांस्कृतिक परिवेश में लोकतंत्र कैसे कार्य करता है और भारत व इज़राइल इस चुनौती से किस प्रकार निपटते हैं।
लोकतंत्र और बहुसांस्कृतिकता: वैचारिक आधार
बहुसांस्कृतिक समाजों में लोकतंत्र की भूमिका द्वैध होती है।
एक ओर, यह विविध पहचानों के प्रतिनिधित्व के लिए संस्थागत माध्यम उपलब्ध कराता है—जैसे चुनाव, राजनीतिक दल और विधायिकाएँ।
दूसरी ओर, यह राजनीतिक एकता और शासन-क्षमता बनाए रखने का प्रयास करता है।
इसलिए बहुसांस्कृतिक लोकतंत्र में संतुलन साधना पड़ता है—
- नागरिकों की समानता और सांस्कृतिक भिन्नता की मान्यता के बीच
- बहुमत के शासन और अल्पसंख्यक अधिकारों के बीच
- राष्ट्रीय पहचान और बहुल सामाजिक पहचानों के बीच
इस संतुलन की सफलता केवल संवैधानिक प्रावधानों पर नहीं, बल्कि राजनीतिक संस्कृति, संस्थागत लचीलापन और समायोजन की इच्छा पर निर्भर करती है।
भारत: समायोजन और मोलभाव के रूप में लोकतंत्र
भारत एक अत्यंत बहुसांस्कृतिक समाज में लोकतंत्र के दीर्घकालिक संचालन का महत्वपूर्ण उदाहरण है। भारतीय लोकतंत्र की रचना ही इस समझ के साथ की गई थी कि यह धर्म, भाषा, जाति और क्षेत्रीय विविधता की परिस्थितियों में कार्य करेगा।
भारत में लोकतांत्रिक राजनीति समाकलन (assimilation) के बजाय समायोजन (accommodation) के सिद्धांत पर आधारित रही है। विविध समूह अपनी माँगों और पहचानों को चुनावों, राजनीतिक दलों और आंदोलनों के माध्यम से व्यक्त करते हैं। भाषायी आधार पर राज्यों का पुनर्गठन, अल्पसंख्यक अधिकारों की मान्यता और संघीय विकेंद्रीकरण इसी समायोजनकारी तर्क को दर्शाते हैं।
इस प्रकार भारत में लोकतंत्र एक संविदात्मक व्यवस्था (negotiated order) के रूप में कार्य करता है, जहाँ संघर्षों को सौदेबाज़ी, गठबंधन और संस्थागत समझौतों के माध्यम से संभाला जाता है।
भारत में प्रतिनिधित्व और पहचान-आधारित राजनीति
बहुसांस्कृतिकता ने भारत में राजनीतिक प्रतिनिधित्व को गहराई से प्रभावित किया है। जाति, धर्म, क्षेत्र और भाषा के आधार पर राजनीतिक लामबंदी ने हाशिए के समूहों को लोकतांत्रिक प्रक्रिया में शामिल किया है।
क्षेत्रीय दलों का उदय और गठबंधन सरकारों का सामान्य होना भारतीय बहुलता की अभिव्यक्ति है। अक्सर यह माना जाता है कि इससे राजनीतिक स्थिरता कम होती है, लेकिन वास्तव में इसने कई बार राजनीतिक सहभागिता और प्रतिनिधित्व को गहरा किया है।
फिर भी, पहचान-आधारित राजनीति ध्रुवीकरण और बहुसंख्यकवाद के ख़तरों को भी जन्म देती है, जिससे अल्पसंख्यक अधिकारों की सुरक्षा एक निरंतर चुनौती बनी रहती है।
इज़राइल: जातीय-राष्ट्रीय ढाँचे के भीतर लोकतंत्र
इज़राइल भी एक संसदीय लोकतंत्र है, किंतु उसकी लोकतांत्रिक राजनीति एक स्पष्ट जातीय-राष्ट्रीय पहचान के भीतर संचालित होती है। लोकतांत्रिक संस्थाएँ—चुनाव, राजनीतिक दल और संसद—सक्रिय हैं, लेकिन राज्य की आत्म-परिभाषा एक यहूदी राज्य के रूप में है।
यह ढाँचा लोकतंत्र की प्रकृति को प्रभावित करता है। यहूदी नागरिक विभिन्न वैचारिक धाराओं में पूर्ण राजनीतिक भागीदारी करते हैं, जबकि गैर-यहूदी अल्पसंख्यकों को औपचारिक अधिकार तो प्राप्त हैं, पर वे अक्सर प्रतीकात्मक और संरचनात्मक बहिष्करण का सामना करते हैं।
इस प्रकार इज़राइल में लोकतांत्रिक राजनीति बहुसांस्कृतिकता को स्वीकार तो करती है, लेकिन उसकी सीमाएँ स्पष्ट रूप से निर्धारित रहती हैं।
दल-राजनीति और गठबंधन लोकतंत्र
भारत और इज़राइल—दोनों में बहुसांस्कृतिक विविधता का प्रतिबिंब खंडित दल-प्रणालियों और गठबंधन सरकारों में दिखाई देता है।
भारत में जातीय, क्षेत्रीय और वैचारिक दल राष्ट्रीय और प्रांतीय स्तर पर प्रतिस्पर्धा और सहयोग करते हैं। गठबंधन राजनीति संघीय सौदेबाज़ी और सत्ता-साझेदारी को मज़बूत करती है।
इज़राइल में समानुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के कारण संसद अत्यधिक खंडित रहती है और गठबंधन सरकारें अनिवार्य हो जाती हैं। धार्मिक और जातीय दल सरकार-निर्माण में निर्णायक भूमिका निभाते हैं।
दोनों ही संदर्भों में गठबंधन लोकतंत्र बहुलता के प्रबंधन का एक संस्थागत उपकरण बनता है, यद्यपि इससे अस्थिरता और नीति-गतिरोध की समस्याएँ भी उत्पन्न होती हैं।
नागरिकता, समावेशन और बहिष्करण
बहुसांस्कृतिक लोकतंत्रों की केंद्रीय चुनौती नागरिकता से जुड़ी होती है—कौन शामिल है, किन शर्तों पर और किस स्तर तक।
भारत में नागरिकता औपचारिक रूप से नागरिक-आधारित और समावेशी है। संविधान किसी एक सांस्कृतिक पहचान को नागरिकता का आधार नहीं बनाता, भले ही सामाजिक असमानताएँ बनी रहती हों।
इज़राइल में नागरिकता लोकतांत्रिक होने के बावजूद भेदित है। यहूदी राष्ट्रत्व को प्राप्त विशेषाधिकार संसाधनों, प्रतीकों और सत्ता तक पहुँच को प्रभावित करते हैं, जिससे अपनत्व के विभिन्न स्तर निर्मित होते हैं।
ये दोनों मॉडल बहुसांस्कृतिक लोकतंत्र के अलग-अलग रास्तों को दर्शाते हैं।
संघर्ष, असहमति और लोकतांत्रिक प्रबंधन
बहुसांस्कृतिक समाजों में संघर्ष अपरिहार्य है। प्रश्न यह है कि क्या लोकतांत्रिक संस्थाएँ इन संघर्षों को समाहित और नियंत्रित कर पाती हैं।
भारत में संघर्षों का समाधान अक्सर चुनावों, न्यायिक हस्तक्षेप और संघीय समायोजन के माध्यम से किया गया है, हालाँकि सांप्रदायिक हिंसा और लोकतांत्रिक दबाव इसकी सीमाएँ भी दिखाते हैं।
इज़राइल में संघर्ष-प्रबंधन अक्सर सुरक्षा-केंद्रित शासन के साथ जुड़ा रहता है। सुरक्षा के नाम पर असहमति और विरोध पर सीमाएँ लगाई जाती हैं, विशेषकर अल्पसंख्यक राजनीति के संदर्भ में।
तुलनात्मक अंतर्दृष्टियाँ
तुलनात्मक दृष्टि से कुछ प्रमुख अंतर स्पष्ट होते हैं—
- भारत विविधता को वैध राजनीतिक अभिव्यक्ति का आधार मानता है; इज़राइल इस पर अधिक सीमाएँ लगाता है।
- भारत में लोकतंत्र समायोजन और विकेंद्रीकरण पर आधारित है; इज़राइल में एक प्रमुख राष्ट्रीय पहचान के इर्द-गिर्द एकता पर ज़ोर है।
- भारत में अल्पसंख्यक समावेशन संवैधानिक रूप से अधिक सुदृढ़ है; इज़राइल में यह अधिक राजनीतिक और सशर्त है।
निष्कर्ष: विविधता के प्रबंधन के रूप में लोकतंत्र
बहुसांस्कृतिक परिवेश में लोकतांत्रिक राजनीति को एक सतत प्रक्रिया के रूप में समझना चाहिए—जहाँ भिन्नताओं को संस्थाओं, प्रतिनिधित्व और संवाद के माध्यम से प्रबंधित किया जाता है। भारत और इज़राइल लोकतंत्र के दो भिन्न मार्ग प्रस्तुत करते हैं, जो अलग-अलग राष्ट्र-कल्पनाओं और नागरिकता-धारणाओं से निर्मित हैं।
भारत का अनुभव यह दर्शाता है कि लोकतंत्र बहुल सह-अस्तित्व का ढाँचा प्रदान कर सकता है, भले ही उसमें निरंतर तनाव मौजूद रहे। इज़राइल का अनुभव यह दिखाता है कि जातीय-राष्ट्रीय राज्य के भीतर लोकतंत्र को बनाए रखना किस प्रकार की चुनौतियाँ उत्पन्न करता है।
दोनों ही उदाहरण यह स्पष्ट करते हैं कि बहुसांस्कृतिक समाजों में लोकतंत्र केवल प्रक्रियाओं का प्रश्न नहीं, बल्कि समावेशन, मान्यता और सत्ता-साझेदारी की राजनीतिक नैतिकता का प्रश्न है।
संदर्भ (References)
- Kymlicka, Will. Multicultural Citizenship
- Khilnani, Sunil. The Idea of India
- Bhargava, Rajeev. Secularism and Its Critics
- Smooha, Sammy. “Ethnic Democracy: Israel as an Archetype”
- Lijphart, Arend. Patterns of Democracy