यौन तस्करी और सुरक्षा की राजनीति
यौन तस्करी और सुरक्षा की राजनीति
(Sex Trafficking and the Politics of Security)
यौन तस्करी समकालीन वैश्विक राजनीति में एक गंभीर चिंता के रूप में उभरी है और इसे प्रायः अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा की समस्या के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। सरकारें, अंतरराष्ट्रीय संगठन और नीति-निर्माता महिलाओं और बच्चों की तस्करी को सीमा-असुरक्षा, अवैध प्रवासन और संगठित अपराध से जोड़कर देखते हैं। नारीवादी विद्वानों का तर्क है कि ऐसे सुरक्षा-केंद्रित दृष्टिकोण गहरी समस्याओं से ग्रस्त हैं—वे राज्य-नियंत्रण, पुलिसिंग और सीमा-प्रबंधन को प्राथमिकता देते हैं, जबकि उन संरचनात्मक जेंडर असमानताओं को ढक देते हैं जो तस्करी को संभव बनाती हैं।
यह इकाई नारीवादी अंतरराष्ट्रीय संबंध (IR) के दृष्टिकोण से यौन तस्करी का विश्लेषण करती है—यह दिखाते हुए कि सुरक्षा-विमर्श प्रतिक्रियाओं को कैसे आकार देता है और ये प्रतिक्रियाएँ महिलाओं के जीवन, एजेंसी और अधिकारों को कैसे प्रभावित करती हैं।
वैश्विक राजनीति में यौन तस्करी की समझ
यौन तस्करी में व्यक्तियों—मुख्यतः महिलाओं और लड़कियों—की भर्ती, परिवहन और यौन शोषण शामिल है, जो ज़बरदस्ती, धोखे या असुरक्षा के दुरुपयोग के माध्यम से होता है। इसे अक्सर एक असाधारण आपराधिक गतिविधि के रूप में चित्रित किया जाता है; किंतु नारीवादी विद्वान ज़ोर देते हैं कि तस्करी वैश्विक राजनीतिक–आर्थिक संरचनाओं में अंतर्निहित है।
गरीबी, जेंडर असमानता, रोज़गार की कमी, संघर्ष, विस्थापन और कठोर प्रवासन व्यवस्थाएँ ऐसी परिस्थितियाँ बनाती हैं जिनमें महिलाओं की असुरक्षा बढ़ती है। इसलिए तस्करी केवल क़ानून-व्यवस्था का प्रश्न नहीं, बल्कि विकास, श्रम बाज़ार और वैश्विक असमानताओं से जुड़ी प्रक्रिया है। जब इसे सुरक्षा-खतरे के रूप में फ्रेम किया जाता है, तो संरचनात्मक कारणों से ध्यान हटकर निगरानी और नियंत्रण पर चला जाता है।
यौन तस्करी का ‘सिक्यूरिटाइज़ेशन’
समकालीन वैश्विक राजनीति में यौन तस्करी का सिक्यूरिटाइज़ेशन किया जा रहा है—अर्थात इसे तात्कालिक खतरे के रूप में प्रस्तुत कर असाधारण उपायों को जायज़ ठहराया जाता है। यह फ्रेमिंग तस्करी को सीमा-सुरक्षा, आतंकवाद और संगठित अपराध से जोड़ देती है।
नारीवादी IR बताता है कि इसके गंभीर परिणाम होते हैं। ‘उद्धार’ के नाम पर सैन्यीकृत पुलिसिंग, कड़े सीमा-नियंत्रण और आव्रजन कार्रवाइयाँ वैध ठहराई जाती हैं, जो अक्सर उन्हीं लोगों को नुकसान पहुँचाती हैं जिनकी रक्षा का दावा किया जाता है। हिरासत, निर्वासन और निगरानी बढ़ती है; तस्कर प्रवर्तन से बचने के लिए और ख़तरनाक मार्ग अपनाते हैं। इस तरह सुरक्षा-आधारित उपाय असुरक्षा को कम करने के बजाय और गहरा देते हैं।
जेंडर, प्रवासन और नियंत्रण
यौन तस्करी का विमर्श गहराई से जेंडरयुक्त है। महिलाओं को निष्क्रिय पीड़ित और पुरुषों को तस्कर या संरक्षक के रूप में दिखाया जाता है। नारीवादी विद्वान इस द्वैत की आलोचना करते हैं, क्योंकि यह महिलाओं की जटिल प्रेरणाओं और निर्णयों—जैसे रोज़गार हेतु प्रवासन—को नकार देता है।
Cynthia Enloe दिखाती हैं कि महिलाओं की गतिशीलता को सुरक्षा-समस्या की तरह देखा जाता है, जबकि पुरुषों की गतिशीलता सामान्य मानी जाती है। ‘संरक्षण’ के नाम पर महिलाओं की आवाजाही पर कड़े नियंत्रण पितृसत्तात्मक सत्ता को मज़बूत करते हैं। कठोर प्रवासन नीतियाँ महिलाओं को अनियमित चैनलों की ओर धकेलती हैं, जिससे दलालों पर निर्भरता और शोषण का जोखिम बढ़ता है।
पीड़ितत्व, एजेंसी और नारीवादी बहसें
नारीवादी बहस का एक केंद्रीय प्रश्न यह है कि तस्करी झेलने वाली महिलाओं का प्रतिनिधित्व कैसे किया जाए। कुछ दृष्टियाँ यौन शोषण पर ज़ोर देकर वेश्यावृत्ति के पूर्ण अपराधीकरण की वकालत करती हैं; अन्य विद्वान महिलाओं की एजेंसी को रेखांकित करते हुए सभी यौन कार्य को तस्करी में समेटने के ख़तरे से सावधान करते हैं।
सुरक्षा ढाँचे अक्सर सहायता पाने के लिए महिलाओं से ‘आदर्श पीड़ित’ का प्रदर्शन अपेक्षित करते हैं। जो महिलाएँ इस छवि में फिट नहीं बैठतीं, उन्हें अपराधीकरण या सहायता से बहिष्कार का सामना करना पड़ता है। नारीवादी IR ऐसे नैतिक द्वैतों से बचते हुए, ज़बरदस्ती और एजेंसी—दोनों को पहचानने पर बल देता है।
संघर्ष, सैन्यीकरण और यौन तस्करी
यौन तस्करी का संघर्ष और सैन्यीकरण से घनिष्ठ संबंध है। युद्ध, विस्थापन और सैन्य उपस्थिति यौन सेवाओं की मांग बढ़ाते हैं और सामाजिक सुरक्षा को कमजोर करते हैं। शांति-रक्षण अभियानों और सैन्य अड्डों के इर्द-गिर्द तस्करी और शोषण की घटनाएँ दर्ज हुई हैं—जो यह दिखाती हैं कि ‘सुरक्षा’ संस्थान भी समस्या का हिस्सा बन सकते हैं।
ये गतिशीलताएँ उस विरोधाभास को उजागर करती हैं जिसमें महिलाओं की सुरक्षा का दावा करने वाली व्यवस्थाएँ ही शोषण के बाज़ार पैदा कर देती हैं।
मानवाधिकार बनाम सुरक्षा दृष्टिकोण
नारीवादी IR, तस्करी के प्रति मानवाधिकार-आधारित दृष्टिकोण को सुरक्षा-केंद्रित मॉडलों से अलग रखता है। मानवाधिकार फ्रेमवर्क दंड और नियंत्रण के बजाय संरक्षण, सहमति, श्रम-अधिकार और सामाजिक न्याय को प्राथमिकता देता है।
जहाँ सुरक्षा दृष्टि सीमाओं और अपराध पर केंद्रित रहती है, वहीं मानवाधिकार दृष्टि आवास, स्वास्थ्य, कानूनी दर्जा और आर्थिक विकल्पों पर काम करती है। संरचनात्मक असमानताओं को संबोधित किए बिना तस्करी-रोधी प्रयास प्रभावी नहीं हो सकते—यह नारीवादी तर्क का मूल है।
वैश्विक शासन और सत्ता-असमानताएँ
अंतरराष्ट्रीय तस्करी-रोधी व्यवस्थाएँ वैश्विक सत्ता-असमानताओं को प्रतिबिंबित करती हैं। शक्तिशाली राज्यों द्वारा प्रवर्तित नीतियाँ अक्सर वैश्विक दक्षिण में क़ानूनों को आकार देती हैं, भले ही स्थानीय संदर्भ भिन्न हों। महिलाओं को ‘उद्धार’ की प्रतीक्षा करती पीड़िताओं के रूप में चित्रित करना नव-औपनिवेशिक कथाओं को मज़बूत करता है और स्थानीय एजेंसी को मिटा देता है।
इसलिए तस्करी को समझने के लिए वैश्विक राजनीतिक अर्थव्यवस्था और उत्तर–औपनिवेशिक सत्ता-संबंधों में उसे स्थित करना आवश्यक है।
सुरक्षा पर पुनर्विचार : नारीवादी दृष्टि
नारीवादी IR यौन तस्करी के संदर्भ में सुरक्षा की पुनर्कल्पना का आह्वान करता है। प्रश्न यह नहीं कि राज्य सीमाओं को कैसे नियंत्रित करें, बल्कि यह कि महिलाएँ आर्थिक सुरक्षा, देहगत स्वायत्तता और हिंसा से मुक्ति कैसे प्राप्त करें।
इसमें वैध प्रवासन मार्गों का विस्तार, श्रम-सुरक्षा का सुदृढ़ीकरण, मांग-पक्ष पर काम, और नीति-निर्माण में उत्तरजीवियों की आवाज़ को केंद्र में रखना शामिल है। यहाँ सुरक्षा का अर्थ निगरानी और दंड नहीं, बल्कि न्याय और गरिमा है।
निष्कर्ष : सुरक्षा राजनीति की सीमाएँ
यौन तस्करी राज्य-केंद्रित और सैन्यीकृत सुरक्षा दृष्टिकोणों की सीमाओं को उजागर करती है। जब तस्करी को मुख्यतः सुरक्षा-खतरे के रूप में देखा जाता है, तो नियंत्रण को देखभाल पर और दंड को संरक्षण पर वरीयता मिलती है।
नारीवादी IR दिखाता है कि तस्करी कोई अलग-थलग अपराध नहीं, बल्कि जेंडर असमानताओं, कठोर प्रवासन व्यवस्थाओं और वैश्विक आर्थिक संरचनाओं का परिणाम है। इसलिए समाधान अधिकार-आधारित, जेंडर-न्यायपूर्ण और समावेशी होने चाहिए। महिलाओं के जीवित अनुभवों और एजेंसी को केंद्र में रखकर नारीवादी दृष्टियाँ तस्करी से निपटने का अधिक प्रभावी और नैतिक ढाँचा प्रस्तुत करती हैं।
संदर्भ (References)
- एनलो, सिंथिया, Bananas, Beaches and Bases
- टिकनर, जे. ऐन, Gender in International Relations
- पीटरसन, वी. स्पाइक, Gendered States
- केम्पाडू, कमला, Trafficking and Prostitution Reconsidered
- ट्रू, जैकी, The Political Economy of Violence against Women