क्रांतियाँ और सामाजिक आंदोलन: सामाजिक आंदोलन के सिद्धांत
परिचय
सामाजिक आंदोलन क्रांतियों और व्यापक राजनीतिक परिवर्तन के अध्ययन में एक केंद्रीय भूमिका निभाते हैं। जहाँ क्रांतियाँ राजनीतिक सत्ता और सामाजिक संरचना में तीव्र तथा मूलभूत परिवर्तन को व्यक्त करती हैं, वहीं सामाजिक आंदोलन उन निरंतर सामूहिक प्रक्रियाओं को दर्शाते हैं जिनके माध्यम से असंतोष व्यक्त किया जाता है, राजनीतिक पहचान निर्मित होती है और सत्ता को चुनौती दी जाती है। सामाजिक आंदोलन के सिद्धांत इस प्रश्न का उत्तर देने का प्रयास करते हैं कि सामूहिक कार्रवाई क्यों उत्पन्न होती है, वह किस प्रकार संगठित होती है और किन परिस्थितियों में वह सफल या असफल होती है।

तुलनात्मक राजनीति के अध्ययन में सामाजिक आंदोलन के सिद्धांत क्रांतियों को केवल आकस्मिक जनविद्रोह के रूप में नहीं, बल्कि दीर्घकालिक सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक प्रक्रियाओं के परिणाम के रूप में समझने में सहायता करते हैं।
सामाजिक आंदोलन के प्रारंभिक सिद्धांत
सामाजिक आंदोलन के प्रारंभिक सिद्धांतों में सामूहिक व्यवहार को प्रायः सामाजिक अस्थिरता और अव्यवस्था का परिणाम माना गया। गुस्ताव ले बॉन की भीड़ मनोविज्ञान की अवधारणा के अनुसार भीड़ भावनात्मक, अविवेकी और नेतृत्व द्वारा आसानी से प्रभावित होने वाली होती है। इसी प्रकार प्रारंभिक समाजशास्त्रीय दृष्टिकोणों ने सामाजिक आंदोलनों को एनोमी, सामाजिक विघटन और नैतिक संकट की अभिव्यक्ति माना।
इन सिद्धांतों ने सामूहिक भावनाओं और असुरक्षा की भूमिका को रेखांकित किया, किंतु वे संगठित, अनुशासित और वैचारिक रूप से प्रेरित आंदोलनों की व्याख्या करने में असफल रहे। इस कारण क्रांतिकारी आंदोलनों की वास्तविक राजनीतिक प्रकृति को समझने में ये दृष्टिकोण सीमित सिद्ध हुए।
सापेक्ष वंचना सिद्धांत
सामाजिक आंदोलन के अध्ययन में एक महत्वपूर्ण मोड़ सापेक्ष वंचना सिद्धांत के साथ आया, जिसे टेड रॉबर्ट गर्ट से जोड़ा जाता है। इस सिद्धांत के अनुसार आंदोलन केवल गरीबी या अभाव से उत्पन्न नहीं होते, बल्कि अपेक्षाओं और वास्तविक परिस्थितियों के बीच उत्पन्न अंतर से जन्म लेते हैं। जब लोग यह अनुभव करते हैं कि उन्हें वह नहीं मिल रहा है जिसके वे अधिकारी हैं, तो असंतोष सामूहिक कार्रवाई में परिवर्तित हो सकता है।
इस दृष्टिकोण ने सामाजिक आंदोलनों में भावनाओं और मनोवैज्ञानिक कारकों की भूमिका को स्पष्ट किया। फिर भी, तुलनात्मक अध्ययनों से यह स्पष्ट हुआ कि सापेक्ष वंचना स्वयं में आंदोलन या क्रांति के लिए पर्याप्त नहीं है। कई वंचित समूह निष्क्रिय रहते हैं, जबकि अनेक आंदोलन अपेक्षाकृत संसाधन-संपन्न वर्गों द्वारा संचालित होते हैं।
संसाधन संचलन सिद्धांत
संसाधन संचलन सिद्धांत ने सामाजिक आंदोलनों को तर्कसंगत और रणनीतिक राजनीतिक अभिनेताओं के रूप में प्रस्तुत किया। जॉन मैकार्थी और मेयर ज़ाल्ड जैसे विद्वानों के अनुसार समाज में असंतोष सर्वत्र विद्यमान रहता है, किंतु आंदोलन तभी उभरते हैं जब संगठन, नेतृत्व, वित्तीय संसाधन और संचार नेटवर्क उपलब्ध हों।
इस दृष्टिकोण ने सामाजिक आंदोलनों को अव्यवस्थित भीड़ के बजाय संगठित राजनीतिक प्रयास के रूप में समझने में मदद की। क्रांति के संदर्भ में यह सिद्धांत स्पष्ट करता है कि केवल असंतोष पर्याप्त नहीं है; उसे संगठित करने की क्षमता निर्णायक होती है। हालांकि आलोचकों का तर्क है कि यह सिद्धांत विचारधारा, भावनाओं और नैतिक प्रतिबद्धता की भूमिका को कम करके आंकता है।
राजनीतिक प्रक्रिया सिद्धांत
राजनीतिक प्रक्रिया सिद्धांत सामाजिक आंदोलनों को व्यापक राजनीतिक संरचना के भीतर रखकर विश्लेषित करता है। चार्ल्स टिली, सिडनी टैरो और डग मैकएडम के अनुसार सामाजिक आंदोलन तब उभरते हैं जब राजनीतिक अवसर संरचनाएँ अनुकूल होती हैं, राज्य दमन कमजोर पड़ता है या शासक वर्ग में विभाजन उत्पन्न होता है।
यह सिद्धांत क्रांतियों को केवल जनसंगठन का परिणाम नहीं, बल्कि राज्य क्षमता और सत्ता संतुलन में परिवर्तन का परिणाम मानता है। तुलनात्मक राजनीति में यह दृष्टिकोण अत्यंत उपयोगी है क्योंकि यह स्पष्ट करता है कि समान असंतोष विभिन्न राजनीतिक प्रणालियों में भिन्न परिणाम क्यों उत्पन्न करता है। फिर भी, इसकी आलोचना इस आधार पर की जाती है कि राजनीतिक अवसरों की पहचान अक्सर घटना के बाद की जाती है।
नए सामाजिक आंदोलन सिद्धांत
नए सामाजिक आंदोलन सिद्धांत का विकास औद्योगोत्तर समाजों के संदर्भ में हुआ। एलेन तुरेन और युर्गन हैबरमास जैसे विद्वानों ने तर्क दिया कि आधुनिक आंदोलनों का केंद्र आर्थिक वर्ग संघर्ष के बजाय पहचान, संस्कृति, जीवन-शैली और आत्मनिर्णय बन गया है।
नारीवादी, पर्यावरणवादी और नागरिक अधिकार आंदोलन इस दृष्टिकोण के प्रमुख उदाहरण हैं। क्रांतियों के संदर्भ में यह सिद्धांत यह समझने में सहायक है कि समकालीन विद्रोह केवल सत्ता परिवर्तन तक सीमित नहीं रहते, बल्कि सांस्कृतिक और प्रतीकात्मक संघर्ष भी शामिल करते हैं। हालांकि, आलोचकों का मानना है कि यह दृष्टिकोण आर्थिक असमानता और संरचनात्मक शक्ति को पर्याप्त महत्व नहीं देता।
सांस्कृतिक और फ्रेमिंग दृष्टिकोण
सांस्कृतिक सिद्धांत इस बात पर बल देते हैं कि सामाजिक आंदोलन अर्थ और व्याख्या के निर्माण की प्रक्रिया हैं। फ्रेमिंग की अवधारणा यह समझाती है कि आंदोलन किस प्रकार समस्याओं को परिभाषित करते हैं, जिम्मेदारी निर्धारित करते हैं और समाधान प्रस्तुत करते हैं।
क्रांतियों में वैचारिक फ्रेमिंग विशेष रूप से महत्वपूर्ण होती है क्योंकि यह मौजूदा व्यवस्था को अवैध सिद्ध करती है और वैकल्पिक भविष्य की कल्पना प्रस्तुत करती है। हालांकि यह दृष्टिकोण सामाजिक चेतना को समझने में सहायक है, लेकिन यह कभी-कभी भौतिक संसाधनों और संस्थागत बाधाओं की भूमिका को कम आंकता है।
सामाजिक आंदोलन और क्रांतियाँ: एक तुलनात्मक दृष्टि
तुलनात्मक अध्ययन यह दर्शाते हैं कि अधिकांश क्रांतियाँ दीर्घकालिक सामाजिक आंदोलन गतिविधियों से उत्पन्न होती हैं। सामाजिक आंदोलन संगठन, नेतृत्व और वैचारिक एकता प्रदान करते हैं, जो क्रांतिकारी क्षण में निर्णायक सिद्ध होते हैं।
फिर भी, सभी सामाजिक आंदोलन क्रांति में परिवर्तित नहीं होते। आंदोलन से क्रांति की ओर संक्रमण राज्य प्रतिक्रिया, अंतरराष्ट्रीय दबाव और सामाजिक गठबंधनों पर निर्भर करता है। इसलिए सामाजिक आंदोलन सिद्धांतों को राज्य-केंद्रित विश्लेषण के साथ जोड़ना आवश्यक है।
आलोचनाएँ और समकालीन बहसें
सामाजिक आंदोलन सिद्धांतों की आलोचना उनके एकांगी दृष्टिकोण के लिए की गई है। कुछ सिद्धांत संरचना पर अत्यधिक बल देते हैं, जबकि अन्य मानवीय एजेंसी को बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत करते हैं। समकालीन बहसें डिजिटल सक्रियता, वैश्विक नेटवर्क और ट्रांसनेशनल आंदोलनों पर केंद्रित हैं।
सोशल मीडिया और ऑनलाइन नेटवर्कों ने संगठन, नेतृत्व और सहभागिता के पारंपरिक रूपों को चुनौती दी है, जिससे सामाजिक आंदोलन सिद्धांतों को नए संदर्भों में पुनः विचार करना आवश्यक हो गया है।
निष्कर्ष
सामाजिक आंदोलन के सिद्धांत क्रांतियों और राजनीतिक परिवर्तन की समझ के लिए अनिवार्य हैं। ये सिद्धांत यह स्पष्ट करते हैं कि सामूहिक कार्रवाई न तो पूर्णतः भावनात्मक होती है और न ही अनिवार्य, बल्कि यह सामाजिक संरचनाओं, राजनीतिक अवसरों, संसाधनों और सांस्कृतिक अर्थों की जटिल अंतःक्रिया से उत्पन्न होती है।
तुलनात्मक राजनीति के विद्यार्थियों के लिए सामाजिक आंदोलन सिद्धांत यह समझने का एक सशक्त उपकरण प्रदान करते हैं कि सामान्य नागरिक किस प्रकार ऐतिहासिक परिवर्तन के सक्रिय कारक बनते हैं।
संदर्भ / Suggested Readings
- Charles Tilly – From Mobilization to Revolution
- Sidney Tarrow – Power in Movement
- Doug McAdam – Political Process and the Development of Black Insurgency
- Ted Robert Gurr – Why Men Rebel
- John McCarthy & Mayer Zald – “Resource Mobilization and Social Movements”
- Alain Touraine – The Voice and the Eye
FAQs
सामाजिक आंदोलन सिद्धांत का मुख्य उद्देश्य क्या है?
सामूहिक कार्रवाई की उत्पत्ति, संगठन और प्रभाव को समझना।
क्या सभी सामाजिक आंदोलन क्रांतिकारी होते हैं?
नहीं, अधिकांश आंदोलन सुधार या पहचान की राजनीति तक सीमित रहते हैं।
क्रांतियों को समझने के लिए कौन-सा सिद्धांत सबसे उपयुक्त है?
कोई एक सिद्धांत पर्याप्त नहीं है; विभिन्न दृष्टिकोणों का संयोजन आवश्यक है।
तुलनात्मक अध्ययन क्यों महत्वपूर्ण है?
यह विभिन्न समाजों में आंदोलनों और क्रांतियों की विविधता को समझने में सहायता करता है।