मानव अधिकार – मुद्दे, चुनौतियाँ और समकालीन सरोकार:
शरणार्थी (Refugees) और विस्थापित व्यक्ति (Displaced Persons)
(भारतीय एवं अंतरराष्ट्रीय संदर्भ)
शरणार्थी और विस्थापित व्यक्ति समकालीन विश्व में मानव अधिकारों से जुड़ी सबसे गंभीर और जटिल चुनौतियों में से एक हैं। जब लोग हिंसा, उत्पीड़न, युद्ध, आंतरिक संघर्ष, पर्यावरणीय आपदाओं या विकास परियोजनाओं के कारण अपने घरों से जबरन बेदखल होते हैं, तो वे केवल भौगोलिक स्थान ही नहीं खोते, बल्कि सुरक्षा, आजीविका, पहचान और अधिकारों का पूरा तंत्र भी छिन्न-भिन्न हो जाता है।
स्वैच्छिक प्रवासन के विपरीत, विस्थापन विवशता की स्थिति है। इसलिए शरणार्थियों और विस्थापितों की समस्या मूलतः मानवीय सहायता का नहीं, बल्कि मानव अधिकारों के व्यापक उल्लंघन का प्रश्न है। भारत तथा वैश्विक स्तर पर यह मुद्दा राज्य की जिम्मेदारी, संप्रभुता, नागरिकता, मानवीय दायित्व और गरिमा से सीधे जुड़ा हुआ है।
शरणार्थी और विस्थापित व्यक्ति: अवधारणात्मक भेद
मानव अधिकार विमर्श में शरणार्थियों और विस्थापित व्यक्तियों के बीच अंतर समझना आवश्यक है—
- शरणार्थी (Refugees) वे व्यक्ति होते हैं जो नस्ल, धर्म, राष्ट्रीयता, राजनीतिक विचार या किसी विशेष सामाजिक समूह से संबंध के कारण उत्पीड़न के भय से अंतरराष्ट्रीय सीमा पार कर जाते हैं।
- विस्थापित व्यक्ति (Displaced Persons), विशेषकर आंतरिक रूप से विस्थापित व्यक्ति (IDPs), वे होते हैं जो जबरन अपने घर छोड़ने को मजबूर होते हैं, परंतु अपने ही देश की सीमाओं के भीतर रहते हैं।
यद्यपि दोनों की कानूनी स्थिति अलग होती है, परंतु दोनों ही समूह अत्यधिक मानव अधिकार वंचना का सामना करते हैं।
जबरन विस्थापन: एक मानव अधिकार समस्या
जबरन विस्थापन एक अस्थायी मानवीय संकट नहीं, बल्कि कई मानव अधिकारों का एक साथ उल्लंघन है। इसमें शामिल हैं—
- जीवन और व्यक्तिगत सुरक्षा का अधिकार
- आवास और आजीविका का अधिकार
- शिक्षा और स्वास्थ्य का अधिकार
- गरिमा और पारिवारिक जीवन का अधिकार
विस्थापन के साथ लोग अक्सर क़ानूनी पहचान, सामाजिक संरक्षण और राजनीतिक आवाज़ खो देते हैं। यह स्थिति उन्हें “अधिकारहीनता (rightlessness)” की दशा में पहुँचा देती है, जहाँ वे क़ानून और नीति—दोनों के हाशिए पर खड़े हो जाते हैं।
अंतरराष्ट्रीय मानव अधिकार क़ानून और शरणार्थी संरक्षण
शरणार्थियों के संरक्षण का आधार अंतरराष्ट्रीय मानव अधिकार और मानवीय क़ानून में निहित है, विशेषकर 1951 Refugee Convention में। यह संधि शरणार्थी की परिभाषा और राज्यों के दायित्वों को स्पष्ट करती है।
इसके प्रमुख सिद्धांत हैं—
- नॉन-रिफाउल्मेंट (खतरे की स्थिति में किसी शरणार्थी को वापस न भेजना)
- आश्रय, शिक्षा और काम जैसी मूल सुविधाओं तक पहुँच
- मनमाने निरोध और भेदभाव से संरक्षण
आंतरिक विस्थापितों के संदर्भ में भी अंतरराष्ट्रीय मानदंड यह अपेक्षा करते हैं कि राज्य विस्थापन को रोके और सुरक्षित वापसी, पुनर्वास या पुनर्स्थापन सुनिश्चित करे।
संप्रभुता बनाम मानव अधिकार
शरणार्थी संरक्षण में एक मूल तनाव राज्य की संप्रभुता और मानव अधिकारों के बीच दिखाई देता है। कई राज्य शरणार्थियों को सुरक्षा जोखिम, आर्थिक बोझ या जनसांख्यिकीय चुनौती के रूप में देखते हैं।
मानव अधिकार दृष्टिकोण यह स्पष्ट करता है कि संप्रभुता का उपयोग मूल मानवीय गरिमा से इनकार के लिए नहीं किया जा सकता। शरणार्थियों के साथ व्यवहार राज्य की नैतिक और लोकतांत्रिक प्रतिबद्धता की कसौटी बन जाता है।
विकास, विस्थापन और आंतरिक शरणार्थी
कई देशों में विस्थापन केवल संघर्ष के कारण नहीं, बल्कि विकास परियोजनाओं—जैसे बाँध, खनन, औद्योगीकरण और शहरी विस्तार—के कारण भी होता है।
विकास-जनित विस्थापन से जुड़े मानव अधिकार सरोकार हैं—
- भूमि, आजीविका और सांस्कृतिक पहचान का नुकसान
- अपर्याप्त मुआवज़ा और पुनर्वास
- दीर्घकालिक गरीबी और सामाजिक बहिष्करण
यह स्थिति विकास और मानव अधिकारों के बीच मौजूद अंतर्विरोध को उजागर करती है और अधिकार-आधारित विकास की आवश्यकता को रेखांकित करती है।
भारतीय संदर्भ में शरणार्थी और विस्थापित व्यक्ति
भारत का शरणार्थी संरक्षण का एक लंबा इतिहास रहा है, परंतु यहाँ कोई समग्र शरणार्थी क़ानून नहीं है। शरणार्थियों से संबंधित नीति अक्सर प्रशासनिक और अस्थायी उपायों पर आधारित रही है।
भारत में शरणार्थियों और विस्थापितों से जुड़े मानव अधिकार मुद्दों में शामिल हैं—
- क़ानूनी अनिश्चितता और औपचारिक दर्जे का अभाव
- रोज़गार, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं तक सीमित पहुँच
- निरोध, निर्वासन और नागरिकताहीनता का खतरा
आंतरिक विस्थापित—चाहे वे संघर्ष, सांप्रदायिक हिंसा या विकास के कारण विस्थापित हुए हों—अक्सर लंबे समय तक पुनर्वास के बिना हाशिए पर रह जाते हैं।
महिलाएँ, बच्चे और विस्थापन
विस्थापन का प्रभाव महिलाओं और बच्चों पर असमान रूप से पड़ता है। उनके सामने विशेष मानव अधिकार चुनौतियाँ होती हैं—
- लैंगिक और यौन हिंसा
- तस्करी और शोषण
- शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं में बाधा
- जीविका और देखभाल का बढ़ा हुआ बोझ
मानव अधिकार दृष्टिकोण इन अंतरविभाजित (intersectional) संवेदनशीलताओं को ध्यान में रखकर संरक्षण की माँग करता है।
शरणार्थी शिविर, गरिमा और दैनिक जीवन
शरणार्थी शिविर अस्थायी व्यवस्था के रूप में बनाए जाते हैं, परंतु अक्सर वे स्थायी बन जाते हैं। शिविर जीवन की विशेषताएँ हैं—
- आवागमन और रोज़गार पर प्रतिबंध
- सहायता पर निर्भरता
- राजनीतिक और सामाजिक सहभागिता का अभाव
ऐसी परिस्थितियाँ गरिमा, स्वायत्तता और सामान्य जीवन के अधिकार पर प्रश्न खड़े करती हैं। मानव अधिकार यह अपेक्षा करते हैं कि शरणार्थियों को निष्क्रिय लाभार्थी नहीं, बल्कि सक्रिय सामाजिक कर्ता के रूप में देखा जाए।
समकालीन चुनौतियाँ और नए सरोकार
आज विस्थापन और शरणार्थी संकट और गहराता जा रहा है—
- लंबे समय तक चलने वाले संघर्ष
- जलवायु परिवर्तन और पर्यावरणीय संकट
- विदेशियों के प्रति भय और ज़ेनोफोबिया
- अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ज़िम्मेदारी बाँटने की कमी
ये प्रवृत्तियाँ वैश्विक शरणार्थी संरक्षण व्यवस्था को कमजोर करती हैं।
वैश्विक न्याय और साझा ज़िम्मेदारी
शरणार्थी संकट यह दिखाता है कि वैश्विक असमानताएँ कितनी गहरी हैं। अनेक ऐसे देश, जिनकी वैश्विक अस्थिरता में कम भूमिका है, सबसे अधिक शरणार्थियों को आश्रय देते हैं।
मानव अधिकार दृष्टिकोण अंतरराष्ट्रीय सहयोग और साझा ज़िम्मेदारी की माँग करता है, ताकि विस्थापन को केवल किसी एक राज्य की समस्या न मानकर वैश्विक चुनौती के रूप में देखा जाए।
निष्कर्ष
शरणार्थी और विस्थापित व्यक्ति समकालीन मानव अधिकार व्यवस्था की सबसे असुरक्षित स्थिति में हैं। उनका अनुभव यह दिखाता है कि जब नागरिकता, क्षेत्र और राज्य संरक्षण टूट जाता है, तो अधिकार कितने नाज़ुक हो जाते हैं।
भारतीय और वैश्विक अनुभव यह स्पष्ट करता है कि शरणार्थियों और विस्थापितों की रक्षा कोई दया या परोपकार नहीं, बल्कि गरिमा, न्याय और साझा मानवता पर आधारित मानव अधिकार दायित्व है। विस्थापन की समस्या का समाधान क़ानूनी संरक्षण, समावेशी नीतियों, अधिकार-आधारित विकास और वैश्विक एकजुटता के बिना संभव नहीं है।
संदर्भ (References)
- Hathaway, James. The Rights of Refugees under International Law
- Chimni, B.S. International Refugee Law
- Sen, Amartya. Development as Freedom
- UNHCR. Global Trends: Forced Displacement
- 1951 Refugee Convention