राष्ट्रवाद: सिद्धांत और विमर्श
भूमिका
राष्ट्रवाद आधुनिक राजनीतिक चिंतन और तुलनात्मक राजनीतिक विश्लेषण की सबसे प्रभावशाली तथा विवादास्पद अवधारणाओं में से एक है। यह एक साथ राजनीतिक एकीकरण और बहिष्करण, मुक्ति और वर्चस्व, एकता और संघर्ष—सभी का स्रोत रहा है। आधुनिक राष्ट्र-राज्यों के निर्माण से लेकर औपनिवेशिक-विरोधी आंदोलनों और समकालीन पहचान-आधारित राजनीति तक, राष्ट्रवाद ने राजनीतिक संस्थाओं, सामूहिक पहचानों और जन-आंदोलनों को गहराई से प्रभावित किया है।

तुलनात्मक राजनीति में राष्ट्रवाद को केवल एक विचारधारा के रूप में नहीं, बल्कि एक ऐतिहासिक रूप से सशर्त सामाजिक-राजनीतिक प्रक्रिया के रूप में समझा जाता है, जो आर्थिक परिवर्तन, सामाजिक संरचनाओं और राज्य संस्थाओं के साथ अंतःक्रिया में विकसित होती है। राष्ट्रवाद के सिद्धांत और उनसे जुड़े विमर्श इसके उद्भव, स्थायित्व और विविध रूपों की व्याख्या करने का प्रयास करते हैं।
राष्ट्रवाद की संकल्पना
राष्ट्रवाद का मूल तर्क यह है कि जिन लोगों में किसी प्रकार की साझा पहचान—जैसे भाषा, संस्कृति, इतिहास, भू-क्षेत्र या राजनीतिक मूल्यों—का भाव हो, उन्हें एक संगठित राजनीतिक समुदाय, सामान्यतः एक संप्रभु राज्य, का निर्माण करना चाहिए। इस प्रकार राष्ट्रवाद ‘राष्ट्र’ और ‘राज्य’ के संयोग पर बल देता है।
यह दावा पूर्व-आधुनिक सत्ता-रूपों—जैसे राजवंशीय शासन, साम्राज्य या धार्मिक वैधता—को चुनौती देता है। इसी कारण राष्ट्रवाद को आधुनिक राजनीति, नागरिकता और जन-भागीदारी के उदय से गहराई से जुड़ा हुआ माना जाता है।
प्राचीनतावादी (Primordialist) राष्ट्रवाद सिद्धांत
प्राचीनतावादी दृष्टिकोण राष्ट्रों को प्राचीन, स्वाभाविक और गहरे सामाजिक बंधनों पर आधारित मानता है। इस मत के अनुसार राष्ट्रीय पहचान रक्त-संबंध, जातीयता, भाषा और धर्म जैसे स्थायी तत्वों से उत्पन्न होती है। राष्ट्रवाद इन पूर्व-विद्यमान सामूहिक भावनाओं की राजनीतिक अभिव्यक्ति है।
यह दृष्टिकोण राष्ट्रवाद की भावनात्मक शक्ति और उसकी दीर्घकालिक स्थायित्व की व्याख्या करता है। किंतु आलोचकों का तर्क है कि यह पहचान को स्थिर और अपरिवर्तनीय मान लेता है तथा यह स्पष्ट नहीं कर पाता कि आधुनिक काल में राष्ट्र और राष्ट्रवाद कैसे उभरे।
आधुनिकतावादी (Modernist) राष्ट्रवाद सिद्धांत
आधुनिकतावादी सिद्धांत राष्ट्रवाद को आधुनिकता की उपज मानते हैं। अर्नेस्ट गेलनर, एरिक हॉब्सबॉम और बेनेडिक्ट एंडरसन इस परंपरा के प्रमुख विचारक हैं। इनके अनुसार औद्योगिकीकरण, पूँजीवाद, शिक्षा प्रणाली और संचार माध्यमों ने राष्ट्रवाद के उदय की परिस्थितियाँ निर्मित कीं।
गेलनर का तर्क है कि औद्योगिक समाज को सांस्कृतिक समरूपता की आवश्यकता होती है, जिसे राष्ट्रवाद उपलब्ध कराता है। हॉब्सबॉम ने ‘परंपराओं के आविष्कार’ की अवधारणा प्रस्तुत की, जिसके माध्यम से आधुनिक राज्य अपनी वैधता स्थापित करते हैं।
बेनेडिक्ट एंडरसन ने राष्ट्र को एक “कल्पित समुदाय” के रूप में परिभाषित किया, जहाँ साझा कथाएँ और प्रिंट पूँजीवाद उन लोगों में एकता की भावना पैदा करते हैं जो कभी एक-दूसरे से प्रत्यक्ष नहीं मिलते।
एथ्नो-प्रतीकात्मक (Ethno-Symbolist) दृष्टिकोण
एंथनी डी. स्मिथ से जुड़ा एथ्नो-प्रतीकात्मक दृष्टिकोण प्राचीनतावाद और आधुनिकतावाद के बीच सेतु का कार्य करता है। यह स्वीकार करता है कि राष्ट्रवाद आधुनिक राजनीतिक रूप है, परंतु यह भी मानता है कि वह पूर्व-आधुनिक जातीय समुदायों, मिथकों, स्मृतियों और प्रतीकों से प्रेरणा लेता है।
इस दृष्टिकोण के अनुसार राष्ट्रवाद की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि वह ऐतिहासिक अनुभवों और सांस्कृतिक संसाधनों को कितनी प्रभावी ढंग से पुनःसक्रिय करता है।
नागरिक और जातीय राष्ट्रवाद
राष्ट्रवाद के अध्ययन में एक महत्वपूर्ण विमर्श नागरिक (civic) और जातीय (ethnic) राष्ट्रवाद के बीच भेद से संबंधित है। नागरिक राष्ट्रवाद नागरिकता, राजनीतिक मूल्यों और संवैधानिक प्रतिबद्धता पर आधारित होता है, जबकि जातीय राष्ट्रवाद वंश, संस्कृति और साझा विरासत पर आधारित होता है।
यद्यपि यह विभाजन विश्लेषणात्मक रूप से उपयोगी है, फिर भी अधिकांश विद्वान मानते हैं कि वास्तविक राजनीतिक आंदोलनों में दोनों तत्व अक्सर मिश्रित रूप में पाए जाते हैं।
राष्ट्रवाद और राज्य
राष्ट्रवाद ने आधुनिक राज्य के निर्माण और सुदृढ़ीकरण में केंद्रीय भूमिका निभाई है। यह राजनीतिक वैधता, जन-संचालन और राष्ट्रीय एकता का स्रोत रहा है। साथ ही, राष्ट्रवाद ने पृथकतावादी आंदोलनों और आत्मनिर्णय की माँगों के माध्यम से राज्यों को चुनौती भी दी है।
तुलनात्मक विश्लेषण से यह स्पष्ट होता है कि कुछ संदर्भों में राज्य राष्ट्रवाद को आकार देता है, जबकि अन्य में राष्ट्रवादी आंदोलन राज्य से पहले अस्तित्व में आते हैं।
औपनिवेशिक और उत्तर-औपनिवेशिक संदर्भों में राष्ट्रवाद
औपनिवेशिक-विरोधी राष्ट्रवाद एक विशिष्ट ऐतिहासिक अनुभव रहा है। उपनिवेशित समाजों में राष्ट्रवाद विदेशी शासन, आर्थिक शोषण और सांस्कृतिक अधीनता के विरुद्ध संघर्ष का माध्यम बना। इसमें राजनीतिक स्वतंत्रता के साथ-साथ सामाजिक और सांस्कृतिक पुनर्निर्माण की आकांक्षाएँ भी शामिल थीं।
उत्तर-औपनिवेशिक राज्यों में राष्ट्रवाद आज भी विविधता, क्षेत्रीय अस्मिताओं और बहुलता के प्रबंधन से जुड़ी चुनौतियों का सामना करता है।
राष्ट्रवाद पर आलोचनाएँ और विमर्श
राष्ट्रवाद की आलोचना इस आधार पर की गई है कि यह बहिष्करण, विदेशियों के प्रति भय और हिंसा को बढ़ावा दे सकता है। कई विद्वानों ने इसे अधिनायकवादी शासन और असहमति के दमन से भी जोड़ा है।
दूसरी ओर, इसके समर्थक तर्क देते हैं कि राष्ट्रवाद ने साम्राज्यवाद के विरुद्ध संघर्षों में सामूहिक शक्ति और राजनीतिक चेतना को जन्म दिया। इस प्रकार विमर्श इस प्रश्न के इर्द-गिर्द घूमता है कि राष्ट्रवाद स्वभावतः समस्या है या संदर्भ-निर्भर राजनीतिक शक्ति।
समकालीन प्रासंगिकता
वैश्वीकरण के बावजूद राष्ट्रवाद का क्षय नहीं हुआ है। लोकलुभावन राष्ट्रवाद, आव्रजन-विरोधी राजनीति और अधिराष्ट्रीय संस्थाओं के प्रति प्रतिरोध ने इसकी निरंतर प्रासंगिकता को रेखांकित किया है।
तुलनात्मक राजनीति में राष्ट्रवाद लोकतांत्रिक क्षरण, पहचान-आधारित राजनीति और समावेशन-बहिष्करण की प्रक्रियाओं को समझने में केंद्रीय भूमिका निभाता है।
निष्कर्ष
राष्ट्रवाद एक जटिल और बहुआयामी परिघटना है, जिसे किसी एक सिद्धांत के माध्यम से पूरी तरह नहीं समझा जा सकता। इसके सिद्धांत और विमर्श इसके ऐतिहासिक संदर्भ, वैचारिक विविधता और राजनीतिक द्वंद्वों को उजागर करते हैं।
तुलनात्मक राजनीतिक विश्लेषण के विद्यार्थियों के लिए राष्ट्रवाद राजनीतिक समुदायों के निर्माण, पहचान की राजनीति और आधुनिक राज्य की गतिशीलता को समझने का एक अनिवार्य ढाँचा प्रदान करता है।
संदर्भ / सुझाई गई पुस्तकें
- बेनेडिक्ट एंडरसन – Imagined Communities
- अर्नेस्ट गेलनर – Nations and Nationalism
- एरिक हॉब्सबॉम – Nations and Nationalism since 1780
- एंथनी डी. स्मिथ – The Ethnic Origins of Nations
- पार्थ चटर्जी – The Nation and Its Fragments
FAQs
1. राष्ट्रवाद क्या है?
राष्ट्रवाद वह विचार है जिसके अनुसार साझा पहचान वाले लोगों को एक संप्रभु राजनीतिक समुदाय का निर्माण करना चाहिए।
2. क्या राष्ट्र प्राचीन हैं या आधुनिक?
इस पर बहस है—प्राचीनतावादी उन्हें प्राचीन मानते हैं, जबकि आधुनिकतावादी उन्हें आधुनिक युग की उपज मानते हैं।
3. ‘कल्पित समुदाय’ का क्या अर्थ है?
बेनेडिक्ट एंडरसन की अवधारणा, जिसके अनुसार राष्ट्र साझा कथाओं के माध्यम से सामाजिक रूप से निर्मित होते हैं।
4. क्या राष्ट्रवाद हमेशा बहिष्करणकारी होता है?
नहीं, यह अपने राजनीतिक और वैचारिक रूप के अनुसार समावेशी या बहिष्करणकारी हो सकता है।