भारतीय चुनावों में सामाजिक विभाजनों की भूमिका: जाति, वर्ग, धर्म, जातीयता और लिंग
मतदान व्यवहार से आशय उन प्रवृत्तियों, प्रेरणाओं और सामाजिक-राजनीतिक कारकों से है, जो यह निर्धारित करते हैं कि मतदाता चुनावों में कैसे और क्यों मतदान करते हैं। भारत में मतदान व्यवहार को केवल व्यक्तिगत पसंद या तर्कसंगत चयन के आधार पर नहीं समझा जा सकता। यह गहराई से सामाजिक विभाजनों (social cleavages) से जुड़ा हुआ है, जो भारतीय समाज की ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और आर्थिक संरचना में निहित हैं।
भारतीय चुनाव इस अर्थ में विशिष्ट हैं कि वे केवल राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का क्षेत्र नहीं हैं, बल्कि लोकतंत्र और बहुलतावादी सामाजिक व्यवस्था के बीच अंतःक्रिया को भी प्रतिबिंबित करते हैं।
सामाजिक विभाजन: एक सैद्धांतिक परिप्रेक्ष्य
सामाजिक विभाजन उन स्थायी सामाजिक अंतरों को कहते हैं, जो—
- समाज में गहराई से निहित होते हैं
- राजनीतिक रूप से संगठित और अभिव्यक्त होते हैं
- सामूहिक राजनीतिक व्यवहार को प्रभावित करते हैं
भारत में जाति, वर्ग, धर्म, जातीयता और लिंग केवल सामाजिक श्रेणियाँ नहीं हैं, बल्कि वे राजनीतिक पहचान बन चुकी हैं। चुनावों के माध्यम से ये पहचानें राजनीतिक शक्ति में रूपांतरित होती हैं।
जाति और मतदान व्यवहार
जाति: भारतीय चुनावों का केंद्रीय आधार
जाति भारतीय चुनावी राजनीति में मतदान व्यवहार का सबसे प्रभावशाली निर्धारक रही है। सामाजिक पदानुक्रम में निहित जाति व्यवस्था ने लोकतंत्र के विस्तार के साथ राजनीतिक रूप धारण किया।
जाति मतदान व्यवहार को प्रभावित करती है—
- सामूहिक पहचान और एकजुटता के माध्यम से
- संरक्षक-ग्राहक (patron–client) संबंधों द्वारा
- प्रतिनिधित्व और नेतृत्व की अपेक्षाओं के जरिए
- समूह हितों की धारणा के आधार पर
अनेक मतदाताओं के लिए जाति एक सरलीकृत संकेत (cognitive shortcut) का कार्य करती है।
प्रभुत्वशाली जातियों से वंचित वर्गों की राजनीतिक उभार
स्वतंत्रता के बाद के शुरुआती वर्षों में चुनावी राजनीति पर उच्च और मध्य जातियों का वर्चस्व रहा। धीरे-धीरे लोकतांत्रिक विस्तार के साथ—
- अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC)
- अनुसूचित जातियाँ (SC)
- अनुसूचित जनजातियाँ (ST)
राजनीतिक रूप से संगठित हुईं। इससे जाति-आधारित दलों का उदय हुआ और दलीय व्यवस्था में महत्वपूर्ण परिवर्तन आए। इस प्रक्रिया ने जाति को निष्क्रिय सामाजिक संरचना से सक्रिय राजनीतिक संसाधन में बदल दिया।
वर्ग और मतदान व्यवहार
आर्थिक स्थिति और राजनीतिक पसंद
वर्ग व्यक्ति की आर्थिक स्थिति—आय, पेशा और संसाधनों तक पहुँच—से संबंधित होता है। भारत में वर्ग-आधारित मतदान पश्चिमी औद्योगिक समाजों की तरह कठोर नहीं रहा है, क्योंकि—
- जाति और वर्ग अक्सर एक-दूसरे में गुंथे हुए हैं
- अनौपचारिक और कृषि-आधारित अर्थव्यवस्था व्यापक है
फिर भी वर्ग मतदान व्यवहार को प्रभावित करता है—
- पुनर्वितरण और कल्याणकारी नीतियों के प्रति दृष्टिकोण
- महँगाई, रोजगार और विकास से जुड़ी अपेक्षाओं के माध्यम से
वर्ग, विकास और जवाबदेही
आर्थिक उदारीकरण और कल्याणकारी योजनाओं के विस्तार के बाद आर्थिक मतदान (economic voting) का महत्व बढ़ा है। मतदाता सरकारों का मूल्यांकन करने लगे हैं—
- आर्थिक प्रदर्शन
- कल्याण योजनाओं की उपलब्धता
- आजीविका और अवसरों के आधार पर
इससे वर्ग मतदान व्यवहार में मुद्दा-आधारित आयाम जुड़ गया है।
धर्म और मतदान व्यवहार
धार्मिक पहचान और राजनीतिक लामबंदी
धर्म भारतीय चुनावों में एक शक्तिशाली सामाजिक विभाजन है। यह मतदान व्यवहार को प्रभावित करता है—
- सामूहिक पहचान और सुरक्षा की भावना के माध्यम से
- प्रतीकों, मिथकों और सांस्कृतिक आख्यानों के द्वारा
- राजनीतिक प्रतिनिधित्व की आकांक्षाओं से
धार्मिक मतदान सदैव एकरूप नहीं होता, परंतु जब राजनीतिक दल धर्म को चुनावी मुद्दा बनाते हैं, तब इसका प्रभाव तीव्र हो जाता है।
धर्मनिरपेक्षता, साम्प्रदायिकता और चुनाव
भारतीय चुनावों में कभी—
- धर्म से परे मुद्दों पर मतदान
- तो कभी साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण
देखने को मिलता है। धर्म की भूमिका राजनीतिक संदर्भ पर निर्भर करती है। पहचान और खतरे की राजनीति के दौर में इसका प्रभाव बढ़ जाता है, जबकि विकास और शासन प्रमुख मुद्दे होने पर यह कम हो सकता है।
जातीयता, क्षेत्र और मतदान व्यवहार
जातीय पहचान और क्षेत्रीय राजनीति
जातीयता अक्सर भाषा, संस्कृति और क्षेत्र से जुड़ी होती है। भारत में जातीय मतदान व्यवहार स्पष्ट रूप से—
- क्षेत्रीय दलों
- स्वायत्तता और पहचान आंदोलनों
- राज्य-स्तरीय राजनीतिक प्रतिस्पर्धा
में दिखाई देता है।
जातीय पहचान मतदान को जोड़ती है—
- सांस्कृतिक मान्यता
- क्षेत्रीय विकास
- स्थानीय हितों की रक्षा
से।
संघवाद और जातीय राजनीति
भारत का संघीय ढाँचा जातीय राजनीति को लोकतांत्रिक मंच प्रदान करता है। चुनावों के माध्यम से जातीय मांगें संस्थागत प्रतिनिधित्व में बदल जाती हैं, जिससे अनेक क्षेत्रों में हिंसक संघर्ष की संभावना कम हुई है।
लिंग और मतदान व्यवहार
लिंग: एक उभरता हुआ सामाजिक विभाजन
लंबे समय तक महिलाओं का मतदान व्यवहार—
- पारिवारिक और सामुदायिक प्रभाव
- सीमित राजनीतिक भागीदारी
से निर्धारित रहा। किंतु समय के साथ यह स्थिति बदली है।
महिलाएँ: स्वतंत्र राजनीतिक इकाई के रूप में
हाल के चुनावों में—
- महिला मतदाता प्रतिशत में वृद्धि
- महिलाओं का मुद्दा-आधारित मतदान
- सुरक्षा, स्वास्थ्य, शिक्षा और कल्याण पर ध्यान
देखा गया है।
अब लिंग एक स्वतंत्र राजनीतिक श्रेणी के रूप में उभर रहा है।
सामाजिक विभाजनों का अंतःसंयोजन (Intersectionality)
भारतीय मतदान व्यवहार में सामाजिक विभाजन अलग-अलग काम नहीं करते—
- जाति और वर्ग
- धर्म और क्षेत्र
- लिंग और कल्याण
एक-दूसरे से जुड़े रहते हैं।
यही कारण है कि भारतीय मतदान व्यवहार स्थिर न होकर लचीला होता है।
विभाजन-आधारित मतदान का बदलता स्वरूप
सामाजिक विभाजन आज भी महत्वपूर्ण हैं, परंतु उनका स्वरूप बदल रहा है—
- स्थायी निष्ठाओं से लचीले गठबंधनों की ओर
- केवल पहचान से मुद्दा-आधारित राजनीति की ओर
- अभिजात वर्ग से जन-भागीदारी की ओर
शिक्षा, मीडिया और शासन प्रदर्शन ने मतदान व्यवहार को अधिक जटिल बनाया है।
सामाजिक विभाजन और लोकतांत्रिक प्रभाव
सामाजिक विभाजनों के लोकतांत्रिक प्रभाव दोहरे रहे हैं—
- प्रतिनिधित्व और समावेशन को बढ़ावा
- वंचित वर्गों को राजनीतिक शक्ति
- परंतु कभी-कभी ध्रुवीकरण और विभाजन भी
इस प्रकार सामाजिक विभाजन भारतीय लोकतंत्र की शक्ति भी हैं और चुनौती भी।
निष्कर्ष
भारत में मतदान व्यवहार जाति, वर्ग, धर्म, जातीयता और लिंग जैसे सामाजिक विभाजनों से गहराई से प्रभावित रहा है। ये विभाजन लोकतंत्र को कमजोर नहीं करते, बल्कि एक बहुलतावादी समाज में लोकतांत्रिक भागीदारी की सामाजिक नींव को प्रकट करते हैं।
भारतीय लोकतंत्र की चुनौती यह रही है कि पहचान-आधारित राजनीति को समावेशी प्रतिनिधित्व, मुद्दा-आधारित प्रतिस्पर्धा और जवाबदेह शासन में बदला जाए।
मतदान व्यवहार का अध्ययन हमें यह समझने में मदद करता है कि भारतीय लोकतंत्र किस प्रकार सामाजिक विविधता के साथ सामंजस्य स्थापित करता है।
संदर्भ (References)
- कोठारी, रजनी. Politics in India
- यादव, योगेंद्र. Understanding Indian Voters
- चिब्बर, प्रदीप. Democracy without Associations
- Dalton, Russell J. Citizen Politics
- Brass, Paul R. Ethnicity and Nationalism in South Asia