उग्रवाद (Insurgency) की राजनीतिक अर्थव्यवस्था
उग्रवाद की राजनीतिक अर्थव्यवस्था का अर्थ है—हिंसा, राजनीति और आर्थिक संरचनाओं के आपसी संबंधों का विश्लेषण। जम्मू और कश्मीर में उग्रवाद को केवल वैचारिक, धार्मिक या राजनीतिक आंदोलन के रूप में समझना अधूरा होगा। यह उग्रवाद गहराई से आर्थिक परिस्थितियों, संसाधनों के प्रवाह, संस्थागत विफलताओं और भौतिक प्रोत्साहनों से जुड़ा रहा है।
समय के साथ, उग्रवाद ने न केवल राजनीतिक लक्ष्यों को आगे बढ़ाया, बल्कि उसने एक ऐसी संघर्ष-आधारित अर्थव्यवस्था (conflict economy) भी विकसित कर ली, जिसने हिंसा को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
राजनीतिक अर्थव्यवस्था: एक विश्लेषणात्मक दृष्टि
राजनीतिक अर्थव्यवस्था इस बात का अध्ययन करती है कि—
- सत्ता और संसाधनों का वितरण कैसे होता है
- आर्थिक असमानताएँ राजनीतिक संघर्ष को कैसे जन्म देती हैं
- संस्थागत कमजोरियाँ हिंसा को कैसे सक्षम बनाती हैं
उग्रवाद के संदर्भ में यह दृष्टिकोण बताता है कि हिंसा केवल राजनीतिक असंतोष की अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि आर्थिक अवसरों और प्रोत्साहनों से भी पोषित होती है।
जम्मू और कश्मीर की संरचनात्मक आर्थिक स्थितियाँ
उग्रवाद के उभार से पहले जम्मू और कश्मीर की अर्थव्यवस्था में कई संरचनात्मक कमजोरियाँ मौजूद थीं—
- औद्योगिक विकास की सीमित संभावनाएँ
- सरकारी नौकरियों पर अत्यधिक निर्भरता
- क्षेत्रीय आर्थिक असमानताएँ
- राजनीतिक अस्थिरता के कारण निजी निवेश की कमी
ये कारक अपने आप में उग्रवाद के कारण नहीं थे, लेकिन इन्होंने ऐसी परिस्थितियाँ बनाई जहाँ राजनीतिक असंतोष और आर्थिक असुरक्षा एक-दूसरे से जुड़ गए।
बेरोज़गारी, युवा वर्ग और आर्थिक हाशियेकरण
उग्रवाद की राजनीतिक अर्थव्यवस्था में युवा बेरोज़गारी एक केंद्रीय तत्व रही है। शिक्षित युवाओं को—
- रोज़गार के सीमित अवसर
- संरक्षण और सिफारिश आधारित भर्ती
- निजी क्षेत्र की कमजोरी
का सामना करना पड़ा।
ऐसे में उग्रवादी संगठनों ने युवाओं को—
- आर्थिक सहायता
- सामाजिक पहचान
- उद्देश्य और सम्मान की भावना
प्रदान की।
इस प्रकार आर्थिक हाशियेकरण और राजनीतिक असंतोष ने मिलकर उग्रवादी mobilization को आसान बनाया।
उग्रवाद का वित्तपोषण और संसाधन प्रवाह
किसी भी उग्रवादी आंदोलन के लिए निरंतर वित्तीय संसाधन आवश्यक होते हैं। जम्मू और कश्मीर में उग्रवाद को—
- बाहरी वित्तीय सहायता
- अनौपचारिक आर्थिक नेटवर्क
- जबरन वसूली और दान
से संसाधन प्राप्त हुए।
इन संसाधनों ने उग्रवाद को एक संगठित और दीर्घकालिक गतिविधि में बदल दिया और हिंसा को लंबे समय तक बनाए रखा।
संघर्ष-आधारित अर्थव्यवस्था और हिंसा का सामान्यीकरण
समय के साथ उग्रवाद ने एक संघर्ष-आधारित अर्थव्यवस्था को जन्म दिया, जहाँ—
- छाया अर्थव्यवस्था (shadow economy) का विस्तार हुआ
- युद्धकालीन लाभ (war-time profiteering) संभव हुआ
- सुरक्षा से जुड़े खर्चों पर निर्भरता बढ़ी
कुछ समूहों और व्यक्तियों के लिए अस्थिरता आर्थिक रूप से लाभकारी बन गई, जिससे शांति के प्रोत्साहन कमज़ोर पड़ गए। इस स्थिति में हिंसा साधन से अधिक स्वयं लक्ष्य बनती चली गई।
राज्य की प्रतिक्रिया और आर्थिक प्रभाव
उग्रवाद के प्रति राज्य की प्रतिक्रिया ने भी राजनीतिक अर्थव्यवस्था को आकार दिया। लंबे समय तक चले सैन्यीकरण के कारण—
- विकास संसाधनों का बड़ा हिस्सा सुरक्षा पर खर्च हुआ
- पर्यटन, व्यापार और कृषि प्रभावित हुए
- केंद्र पर आर्थिक निर्भरता बढ़ी
हालाँकि सुरक्षा क्षेत्र में कुछ रोज़गार उत्पन्न हुए, पर इससे विकास का विकृत मॉडल बना, जिसमें आत्मनिर्भरता के बजाय निर्भरता बढ़ी।
शासन, भ्रष्टाचार और संस्थागत क्षरण
संघर्ष की स्थिति ने शासन संस्थाओं को कमजोर किया। इससे—
- भ्रष्टाचार और किराया-आधारित राजनीति (rent-seeking)
- अनौपचारिक सत्ता केंद्रों का उदय
- समानांतर नियंत्रण संरचनाएँ
विकसित हुईं।
संस्थागत जवाबदेही के अभाव ने नागरिकों का लोकतांत्रिक व्यवस्था से भरोसा और कम किया।
उग्रवाद का बाहरी राजनीतिक–आर्थिक आयाम
जम्मू और कश्मीर में उग्रवाद की राजनीतिक अर्थव्यवस्था केवल आंतरिक नहीं रही। क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय राजनीति ने—
- हथियारों और संसाधनों का प्रवाह
- प्रशिक्षण और लॉजिस्टिक समर्थन
- संघर्ष का अंतरराष्ट्रीयकरण
किया।
इस बाहरी आयाम ने स्थानीय उग्रवाद को व्यापक भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा से जोड़ दिया।
विस्थापन, आजीविका और आर्थिक विघटन
हिंसा और असुरक्षा के कारण—
- आंतरिक विस्थापन
- आजीविकाओं का नाश
- स्थानीय बाज़ारों का विघटन
हुआ।
विस्थापन ने श्रम संरचना बदली और सहायता व सरकारी समर्थन पर निर्भरता बढ़ाई, जिससे सामाजिक असमानताएँ और गहरी हुईं।
उग्रवाद एक विकासात्मक जाल (Development Trap)
राजनीतिक अर्थव्यवस्था के दृष्टिकोण से उग्रवाद ने एक विकासात्मक जाल निर्मित किया—
- अविकास ने संघर्ष को जन्म दिया
- संघर्ष ने विकास को असंभव बना दिया
यह दुष्चक्र शांति और पुनर्निर्माण की संभावनाओं को सीमित करता रहा।
केवल आर्थिक व्याख्या की सीमाएँ
हालाँकि आर्थिक कारक महत्वपूर्ण हैं, लेकिन उग्रवाद को केवल भौतिक लाभ या लालच तक सीमित करना उचित नहीं है।
पहचान, इतिहास, राजनीतिक आकांक्षाएँ और गरिमा जैसे तत्व भी केंद्रीय भूमिका निभाते हैं।
फिर भी राजनीतिक अर्थव्यवस्था यह स्पष्ट करती है कि आर्थिक संरचनाएँ हिंसा को टिकाऊ बनाती हैं, भले ही मूल राजनीतिक उद्देश्य धुंधले पड़ जाएँ।
निष्कर्ष
जम्मू और कश्मीर में उग्रवाद की राजनीतिक अर्थव्यवस्था यह दर्शाती है कि संघर्ष केवल वैचारिक या पहचान-आधारित नहीं, बल्कि आर्थिक रूप से संरचित और संस्थागत रूप से पोषित भी रहा है। उग्रवाद राजनीतिक अलगाव से उत्पन्न हुआ, लेकिन समय के साथ एक ऐसी संघर्ष-आधारित अर्थव्यवस्था में बदल गया जिसने अस्थिरता को बनाए रखा।
इसलिए उग्रवाद से निपटने के लिए केवल सुरक्षा उपाय पर्याप्त नहीं हैं। आवश्यक है—
- समावेशी आर्थिक विकास
- रोज़गार सृजन और युवाओं का सशक्तिकरण
- संस्थागत सुधार और जवाबदेही
- आजीविका को हिंसा से अलग करना
जब तक राजनीतिक अर्थव्यवस्था में परिवर्तन नहीं किया जाता, तब तक हिंसा के घटने के बावजूद उग्रवाद के पुनरुत्थान का खतरा बना रहेगा।
जम्मू और कश्मीर का अनुभव यह सिखाता है कि शांति और विकास एक-दूसरे के पूरक हैं—एक के बिना दूसरा संभव नहीं।
संदर्भ (References)
- Bose, Sumantra. Kashmir: Roots of Conflict, Paths to Peace
- Collier, Paul & Hoeffler, Anke. “Greed and Grievance in Civil War”
- Keen, David. The Economic Functions of Violence in Civil Wars
- Schofield, Victoria. Kashmir in Conflict
- World Bank – Conflict and Development Reports