आतंकवाद के कारक और शक्तियाँ
जम्मू और कश्मीर में आतंकवाद कोई आकस्मिक या एकांगी घटना नहीं है, बल्कि यह ऐतिहासिक, राजनीतिक, सामाजिक और भू-राजनीतिक कारकों की जटिल परस्पर क्रिया का परिणाम है। इस क्षेत्र में आतंकवाद को केवल बाहरी हस्तक्षेप या आंतरिक असंतोष तक सीमित कर देना वास्तविकता को अत्यधिक सरलीकृत करना होगा। वस्तुतः, आतंकवाद यहाँ राजनीतिक असंतोष, वैधता के संकट, पहचान की राजनीति और अंतरराष्ट्रीय हस्तक्षेप के सम्मिलित प्रभाव से विकसित हुआ है।
आतंकवाद और उससे जुड़ी हिंसा ने न केवल सुरक्षा और शासन को प्रभावित किया है, बल्कि समाज की संरचना, लोकतांत्रिक संस्थाओं और आंतरिक प्रवासन (Internal Migration) की प्रक्रियाओं को भी गहराई से बदल दिया है।
आतंकवाद: एक वैचारिक स्पष्टता
आतंकवाद से तात्पर्य उन हिंसक या भय उत्पन्न करने वाली कार्रवाइयों से है, जिन्हें गैर-राज्य तत्व राजनीतिक, वैचारिक या रणनीतिक उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए अपनाते हैं। इसका उद्देश्य केवल भौतिक क्षति नहीं, बल्कि—
- भय और असुरक्षा का वातावरण बनाना
- राज्य की वैधता को चुनौती देना
- सामान्य जनजीवन को बाधित करना
- राजनीतिक रियायतें प्राप्त करना
होता है।
जम्मू और कश्मीर में आतंकवाद एक प्रकार से असममित संघर्ष की रणनीति बन गया, जहाँ राज्य और गैर-राज्य शक्तियों के बीच शक्ति-संतुलन असमान था।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और आतंकवाद की जड़ें
जम्मू और कश्मीर में आतंकवाद की उत्पत्ति को क्षेत्र के राजनीतिक इतिहास से अलग नहीं किया जा सकता। लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं की असफलता, स्वायत्तता का क्षरण और बार-बार राजनीतिक हस्तक्षेप ने धीरे-धीरे राजनीतिक मोहभंग को जन्म दिया।
जब संवैधानिक और लोकतांत्रिक माध्यम लोगों की आकांक्षाओं को व्यक्त करने में असमर्थ प्रतीत हुए, तब कुछ वर्गों के लिए हिंसा एक वैकल्पिक राजनीतिक माध्यम के रूप में उभरने लगी। इस प्रकार आतंकवाद अचानक नहीं, बल्कि एक क्रमिक प्रक्रिया के रूप में विकसित हुआ।
राजनीतिक अलगाव और वैधता का संकट
आतंकवाद को बढ़ावा देने वाला सबसे महत्वपूर्ण आंतरिक कारक रहा है राजनीतिक अलगाव।
जम्मू और कश्मीर में—
- चुनावी प्रक्रियाओं पर अविश्वास
- केंद्र का अत्यधिक नियंत्रण
- स्थानीय स्वशासन की कमजोरी
ने शासन की वैधता को कमजोर किया।
जब राज्य को जन-इच्छा का प्रतिनिधि नहीं माना गया, तो आतंकवाद ने स्वयं को राजनीतिक प्रतिरोध के साधन के रूप में प्रस्तुत किया।
पहचान, विचारधारा और राजनीतिक mobilization
आतंकवादी संगठनों ने पहचान-आधारित विचारधाराओं का उपयोग कर राजनीतिक असंतोष को संगठित किया।
धर्म, इतिहास और क्षेत्रीय चेतना से जुड़े आख्यानों ने हिंसा को—
- नैतिक रूप से उचित
- राजनीतिक रूप से आवश्यक
बताने का प्रयास किया।
इस प्रक्रिया में राजनीतिक संघर्ष को नैतिक युद्ध के रूप में रूपांतरित किया गया, जिससे हिंसा और आतंकवाद के बीच की सीमाएँ धुंधली हो गईं।
बाहरी कारक और सीमा-पार हस्तक्षेप
जम्मू और कश्मीर में आतंकवाद को आकार देने में बाहरी हस्तक्षेप की भूमिका निर्णायक रही है। सीमा-पार समर्थन, प्रशिक्षण और संसाधनों ने—
- आतंकवाद को अंतरराष्ट्रीय स्वरूप दिया
- हिंसा की तीव्रता और निरंतरता बढ़ाई
- संघर्ष के समाधान को और जटिल बनाया
भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धाओं ने स्थानीय असंतोष को एक क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय संघर्ष में बदल दिया।
सैन्यीकरण और सुरक्षा वातावरण
आतंकवाद के प्रत्युत्तर में राज्य द्वारा अपनाए गए कठोर सुरक्षा उपायों और भारी सैन्य उपस्थिति ने एक सैन्यीकृत सामाजिक वातावरण निर्मित किया।
हालाँकि इसका उद्देश्य शांति बहाल करना था, परंतु इसके कुछ दुष्परिणाम भी हुए—
- नागरिक अधिकारों का क्षरण
- आम जन और राज्य के बीच अविश्वास
- हिंसा का सामान्यीकरण
इससे आतंकवाद और प्रति-आतंकवाद एक-दूसरे को पोषित करने वाली प्रक्रियाएँ बन गईं।
सामाजिक–आर्थिक कारक और युवा उग्रता
बेरोज़गारी, सीमित अवसर और सामाजिक विघटन ने युवाओं को विशेष रूप से प्रभावित किया। कुछ युवाओं के लिए आतंकवादी संगठन—
- पहचान और उद्देश्य का भाव
- आर्थिक सहायता
- सामाजिक मान्यता
प्रदान करते प्रतीत हुए।
यद्यपि गरीबी स्वयं आतंकवाद का कारण नहीं है, परंतु राजनीतिक असंतोष के साथ मिलकर यह उग्रता को तीव्र कर सकती है।
हिंसा का समाजीकरण और पीढ़ीगत प्रभाव
लंबे समय तक चले संघर्ष ने समाज को गहरे रूप से प्रभावित किया।
हिंसा के वातावरण में पली-बढ़ी पीढ़ियों ने—
- आघात और असुरक्षा
- शिक्षा और सामाजिक जीवन में बाधाएँ
- हिंसा का सामान्यीकरण
अनुभव किया।
यह स्थिति आतंकवादी संगठनों के लिए भर्ती को आसान बनाती है और संघर्ष के चक्र को बनाए रखती है।
आतंकवाद और आंतरिक प्रवासन
आतंकवाद और हिंसा का सबसे प्रत्यक्ष परिणाम आंतरिक प्रवासन रहा। भय, लक्षित हत्याएँ और सामाजिक ताने-बाने के टूटने से अनेक समुदायों को अपने घर छोड़ने पड़े।
विशेष रूप से कश्मीरी पंडितों का पलायन इस प्रक्रिया का सबसे मार्मिक उदाहरण है।
इस आंतरिक प्रवासन ने—
- जनसांख्यिकीय संरचना बदली
- पहचान-आधारित ध्रुवीकरण बढ़ाया
- दीर्घकालिक मानवीय और राजनीतिक समस्याएँ उत्पन्न कीं
बहु-कारक परिघटना के रूप में आतंकवाद
जम्मू और कश्मीर में आतंकवाद को केवल—
- धर्म
- गरीबी
- या बाहरी हस्तक्षेप
के एकल कारण से नहीं समझा जा सकता। यह एक बहु-कारक परिघटना है, जिसमें—
- राजनीतिक विफलता
- सामाजिक असंतोष
- पहचान की राजनीति
- अंतरराष्ट्रीय हस्तक्षेप
सभी सम्मिलित हैं।
निष्कर्ष
जम्मू और कश्मीर में आतंकवाद के कारक और शक्तियाँ यह दर्शाती हैं कि हिंसा केवल एक सुरक्षा समस्या नहीं, बल्कि गहरे राजनीतिक और सामाजिक संकटों की अभिव्यक्ति है। आतंकवाद ने लोकतांत्रिक असफलताओं, पहचान संघर्षों और बाहरी हस्तक्षेपों के बीच स्थान पाया।
इसलिए आतंकवाद से निपटने का समाधान केवल सैन्य या सुरक्षा उपायों में नहीं, बल्कि—
- लोकतांत्रिक विश्वास की पुनर्स्थापना
- समावेशी राजनीतिक संवाद
- अधिकारों और गरिमा की रक्षा
- सामाजिक–आर्थिक पुनर्निर्माण
में निहित है।
जम्मू और कश्मीर का अनुभव यह सिखाता है कि स्थायी शांति बल से नहीं, बल्कि वैधता, न्याय और सार्थक राजनीतिक सहभागिता से स्थापित होती है।
संदर्भ (References)
- Bose, Sumantra. Kashmir: Roots of Conflict, Paths to Peace
- Schofield, Victoria. Kashmir in Conflict
- Zutshi, Chitralekha. Languages of Belonging
- Wilkinson, Steven. Votes and Violence
- मानव अधिकार संगठनों की रिपोर्टें (जम्मू और कश्मीर)